1. भक्ति-आन्दोलन का सामान्य परिचय एवं विकास
-
उत्पत्ति एवं विस्तार: भक्ति आन्दोलन की शुरुआत छठी शताब्दी में तमिल क्षेत्र से हुई, जो आगे चलकर कर्नाटक और महाराष्ट्र में फैल गई।
-
संतों का योगदान: भक्ति आन्दोलन का विकास बारह अलवार वैष्णव संतों और तिरसठ नयनार शैव संतों ने किया।
-
प्रमुख घटना: शैव संत अप्पारक (अप्पर) ने पल्लव राजा महेन्द्रवर्मन को शैवधर्म स्वीकार करवाया।
-
भक्ति कवि-संतों के दो मुख्य समूह:
-
प्रथम समूह (वैष्णव संत): ये महाराष्ट्र में लोकप्रिय हुए। ये भगवान विठोबा के भक्त थे। इनके अनुयायी ‘वरकरी’ या ‘तीर्थयात्री’ पंथ कहलाते थे, क्योंकि वे हर वर्ष पंढरपुर की तीर्थयात्रा पर जाते थे।
-
दूसरा समूह: यह पंजाब एवं राजस्थान के हिन्दी भाषी क्षेत्रों में सक्रिय था और इनकी ‘निर्गुण भक्ति’ (हर विशेषता से परे भगवान की भक्ति) में आस्था थी।
-
-
उत्तर भारत में प्रवेश: भक्ति आन्दोलन को दक्षिण भारत से उत्तर भारत में रामानंद के द्वारा लाया गया।
-
बंगाल में कृष्ण भक्ति: बंगाल में कृष्ण भक्ति के प्रारंभिक प्रतिपादक विद्यापति ठाकुर और चंडीदास थे।
-
रामानंद की शिक्षाओं का प्रभाव: रामानंद की शिक्षा से दो संप्रदायों का प्रादुर्भाव हुआ—सगुण (जो पुनर्जन्म में विश्वास रखता है) और निर्गुण (जो भगवान के निराकार रूप को पूजता है)।
-
सगुण संप्रदाय के प्रमुख व्याख्याता: राम भक्त (तुलसीदास, नाभादास) और कृष्ण भक्त (निम्बार्क, वल्लभाचार्य, चैतन्य, सूरदास और मीराबाई)।
-
निर्गुण संप्रदाय के प्रतिनिधि: कबीर, जिन्हें भावी उत्तर भारतीय पंथों का आध्यात्मिक गुरु माना गया है।
2. दक्षिण में वैष्णव संतों द्वारा स्थापित चार मत (संप्रदाय)
(नोट: शंकराचार्य के अद्वैतदर्शन के विरोध में दक्षिण में वैष्णव संतों द्वारा इन चार मतों की स्थापना की गई थी।)
-
श्री संप्रदाय: रामानुजाचार्य — विशिष्टाद्वैतवाद
-
ब्रह्म-संप्रदाय: माध्वाचार्य — द्वैतवाद
-
रुद्र-संप्रदाय: विष्णुस्वामी — शुद्धद्वैतवाद
-
सनकादि संप्रदाय: निम्बार्काचार्य — द्वैताद्वैतवाद
3. भक्ति-आन्दोलन के प्रमुख संत एवं उनके जीवन से जुड़े तथ्य
रामानुजाचार्य (11वीं शताब्दी)
-
आराध्य: इन्होंने राम को अपना आराध्य माना।
-
जन्म एवं मृत्यु: इनका जन्म 1017 ईस्वी में मद्रास के निकट पेरुंबर नामक स्थान पर हुआ था तथा 1137 ईस्वी में इनकी मृत्यु हो गई।
-
शिक्षा: रामानुज ने वेदान्त में प्रशिक्षण अपने गुरु कांचीपुरम के यादव प्रकाश से प्राप्त किया था।
रामानंद
-
जन्म एवं शिक्षा: रामानंद का जन्म 1299 ईस्वी में प्रयाग में हुआ था। इनकी शिक्षा प्रयाग तथा वाराणसी में हुई।
-
मुख्य कार्य: इन्होंने अपना संप्रदाय सभी जातियों के लिए खोल दिया। रामानुज की भाँति इन्होंने भी भक्ति को मोक्ष का एकमात्र साधन स्वीकार किया। इन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम राम एवं सीता की आराधना को समाज के समक्ष रखा।
-
प्रमुख शिष्य: रैदास (हरिजन), कबीर (जुलाहा), धन्ना (जाट), सेना (नाई), पीपा (राजपूत)। (कुल बारह शिष्यों में ये प्रमुख थे)।
कबीर
-
जन्म एवं पालन-पोषण: कबीर का जन्म 1425 ईस्वी में एक विधवा ब्राह्मण के गर्भ से हुआ था। लोक-लज्जा के भय से उसने नवजात शिशु को वाराणसी में लहरतारा के पास एक तालाब के समीप छोड़ दिया। जुलाहा नीरू तथा उसकी पत्नी नीमा इस नवजात शिशु को अपने घर ले आये और इनका नाम कबीर रखा गया।
-
विचारधारा एवं उपदेश: इन्होंने राम, रहीम, हजरत, अल्लाह आदि को एक ही ईश्वर के अनेक रूप माने। इन्होंने जाति-प्रथा, धार्मिक कर्मकांड, बाह्य आडंबर, मूर्तिपूजा, जप-तप, अवतारवाद आदि का घोर विरोध करते हुए एकश्वरवाद में आस्था व्यक्त की एवं निराकार ब्रह्म की उपासना को महत्त्व दिया।
-
विशेषता: निर्गुण भक्ति धारा से जुड़े कबीर ऐसे प्रथम भक्त थे, जिन्होंने संत होने के बाद भी पूर्णतः गृहस्थ जीवन का निर्वाह किया।
-
अनुयायी एवं संकलन: इनके अनुयायी ‘कबीरपंथी’ कहलाए। कबीर के उपदेश ‘सबद’ सिखों के आदिग्रंथ में संगृहीत हैं।
गुरु नानक
-
जन्म एवं परिवार: गुरु नानक का जन्म 1469 ईस्वी अविभाजित पंजाब के तलवंडी नामक स्थान पर हुआ था, जो अब ननकाना साहिब के नाम से विख्यात है। उनकी माता का नाम तृप्ता देवी तथा पिता का नाम कालूराम था। बटाला के मूलराज खत्री की बेटी सुलक्षणी से उनका विवाह हुआ।
-
यात्राएँ एवं कार्य: इन्होंने देश का पाँच बार चक्कर लगाया, जिसे ‘उदासीस’ कहा जाता है। उन्होंने कीर्तनों के माध्यम से उपदेश दिए। अपने जीवन के अंतिम क्षणों में उन्होंने रावी नदी के किनारे करतारपुर में अपना डेरा (मठ) स्थापित किया।
-
उत्तराधिकारी एवं धर्म स्थापना: अपने जीवन काल में ही इन्होंने आध्यात्मिक आधार पर अपने पुत्रों की जगह, अपने शिष्य भाई लहना (अंगद) को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। नानक ने सिख धर्म की स्थापना की। नानक सूफी संत बाबा फरीद से प्रभावित थे।
चैतन्य स्वामी
-
जन्म एवं परिवार: चैतन्य का जन्म 1486 ईस्वी में नदिया (बंगाल) के मायापुर गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम जगन्नाथ मिश्र एवं माता का नाम शची देवी था।
-
नाम एवं संगठन: पाठशाला में चैतन्य को ‘निमाई पंडित’ कहा जाता था। इन्होंने ‘गोसाईं संघ’ की स्थापना की और साथ ही संकीर्तन प्रथा को जन्म दिया।
-
दर्शन एवं प्रवास: इनके दार्शनिक सिद्धांत को ‘अचिंत्य भेदाभेदवाद’ के नाम से जाना जाता है। सन्यासी बनने के बाद बंगाल छोड़कर पुरी (उड़ीसा) चले गये, जहाँ उन्होंने दो दशक तक भगवान जगन्नाथ की उपासना की।
श्री मद्वल्लभाचार्य (वल्लभाचार्य)
-
जन्म एवं परिवार: श्री मद्वल्लभाचार्य का जन्म 1479 ईस्वी में चम्पारण्य (वाराणसी) में हुआ था। इनके पिता का नाम लक्ष्मण भट्ट तथा माता का नाम यल्लमगरु था। इनका विवाह महालक्ष्मी के साथ हुआ।
-
संतान: इनके दो पुत्र थे—गोपीनाथ (जन्म 1511 ईस्वी) तथा विट्ठलनाथ (जन्म 1516 ईस्वी)।
-
निवास एवं मार्ग: इन्होंने गंगा-यमुना संगम के समीप अरेल नामक स्थान पर अपना निवासस्थान बनाया। वल्लभाचार्य ने भक्ति-साधना पर विशेष जोर दिया। इन्होंने भक्ति को मोक्ष का साधन बताया। इनके भक्तिमार्ग को ‘पुष्टिमार्ग’ कहते हैं।
गोस्वामी तुलसीदास
-
जन्म एवं रचना: इनका जन्म उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले में राजापुर गाँव में 1554 ईस्वी में हुआ था। इन्होंने ‘रामचरितमानस’ की रचना की।
धन्ना
-
परिचय: धन्ना का जन्म 1415 ईस्वी में एक जाट परिवार में हुआ था। राजपुताना से बनकर (बनारस) आकर ये रामानंद के शिष्य बन गए।
-
लोककथा: कहा जाता है कि इन्होंने भगवान की मूर्ति को हठात भोजन कराया था।
रैदास
-
परिचय: ये जाति से चमार थे। ये रामानंद के बारह शिष्यों में एक थे। इनके पिता का नाम रघु तथा माता का नाम घुरबिनिया था। ये जूता बनाकर जीविकोपार्जन करते थे।
-
प्रभाव एवं स्थापना: मीराबाई ने इन्हें अपना गुरु माना है। इन्होंने ‘रायदासी सम्प्रदाय’ की स्थापना की।
दादू-दयाल
-
परिचय एवं जन्म: ये कबीर के अनुयायी थे। इनका जन्म 1554 ईस्वी में अहमदाबाद में हुआ था। इनका संबंध धुनिया जाति से था।
-
कार्य एवं आंदोलन: साँभर में आकर इन्होंने ‘ब्रह्म संप्रदाय’ की स्थापना की। अकबर ने धार्मिक चर्चा के लिए इन्हें एक बार फतेहपुर सीकरी बुलाया था। इन्होंने ‘निपख’ नामक आंदोलन की शुरुआत की।
सूफी आन्दोलन
खानकाह या मठ
सूफी के आश्रमों को खानकाह या मठ कहा जाता था।
मुरीद
सूफी संतों के शिष्य को मुरीद कहा जाता था।
सूफियों के धर्मसंघ का विभाजन
सूफियों के धर्मसंघ ‘बा-शारा’ और ‘बे-शारा’ में बंटे थे।
बा-शारा
बा-शारा इस्लामी सिद्धान्त के समर्थक थे।
बे-शारा
बे-शारा इस्लामी सिद्धान्त से बंधे नहीं थे।
चिश्ती सिलसिला
भारत में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती ने चिश्ती सिलसिला की शुरुआत की। इसका केन्द्र अजमेर था। बख्तियार काकी, बाबा फरीद, निजामुद्दीन औलिया एवं शेख बुरहानुद्दीन गरीब चिश्ती सिलसिला के महत्त्वपूर्ण संत थे। बख्तियार काकी के शिष्य बाबा फरीद थे। बाबा फरीद की रचनाएँ गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल हैं। बाबा फरीद के दो शिष्य ‘निजामुद्दीन औलिया’ एवं ‘अलाउद्दीन साविर’ थे। हजरत निजामुद्दीन औलिया ने अपने जीवनकाल में दिल्ली के सात सुल्तानों का शासन देखा था। निजामुद्दीन औलिया के प्रमुख शिष्य थे— शेख सलीम चिश्ती, अमीर खुसरो, अमीर हसन देहलवी। शेख बुरहानुद्दीन गरीब ने 1340 ई० में दक्षिण भारत के क्षेत्रों में चिश्ती सम्प्रदाय की शुरुआत की और दौलताबाद को मुख्य केन्द्र बनाया।
सुहरावर्दी सिलसिला
उमर सुहरावर्दी ने सुहरावर्दी धर्मसंघ या सिलसिला की स्थापना की। शेख बदरुद्दीन जकारिया ने 1262 ई० में सुहरावर्दी धर्मसंघ संचालन शुरू किया। शेख बदरुद्दीन ने सिंध एवं मुल्तान को मुख्य केन्द्र बनाया। जलालुद्दीन तबरीजी, सैय्यद सुर्ख जोश, बुरहान सुहरावर्दी धर्मसंघ के प्रमुख संत थे। सुहरावर्दी सिलसिला ने राज्य के संरक्षण को स्वीकार किया था।
सत्तारी सिलसिला
शेख अब्दुल्ला सत्तारी ने सत्तारी सिलसिले की स्थापना की थी। इसका मुख्य केन्द्र बिहार था।
कादरी धर्मसंघ या सिलसिला
सैय्यद अबुल कादिर अल जिलानी ने बगदाद में कादरी सिलसिला की स्थापना की। मुहम्मद गौस भारत में इसके प्रवर्त्तक थे। इसके अनुयायी गाने-बजाने और शिया मत के विरुद्ध थे। शाहजहाँ का ज्येष्ठ पुत्र राजकुमार दारा कादिरी सिलसिला के मुल्लाशाह का शिष्य था।
नक्शबन्दी धर्मसंघ या सिलसिला
‘ख्वाजा उबेदुल्ला’ नक्शबन्दी सिलसिले के संस्थापक थे। ख्वाजा बकी बिल्लाह भारत में इसकी स्थापना ने की। बकी बिल्लाह के शिष्य शेख अहमद’ सरहिन्दी ने भारत में नक्शबन्दी सिलसिले का प्रचार किया। शेख अहमद’ सरहिन्दी अकबर के समकालीन था।
फिरदौसी सिलसिला
‘फिरदौसी सिलसिला’ सुहरावर्दी सिलसिला की ही एक शाखा थी। फिरदौसी सिलसिला का क्षेत्र बिहार था। इस सिलसिले को शेख शरीफउद्दीन याह्या ने लोकप्रिय बनाया। याह्या ख्वाजा निजामुद्दीन के शिष्य थे।