🌍 पृथ्वी की आंतरिक एवं बाह्य संरचना: एक विस्तृत अध्ययन

1. पृथ्वी की आंतरिक संरचना (Internal Structure of Earth)

पृथ्वी के आंतरिक भाग के संबंध में वैज्ञानिकों में मतभेद हैं। परतों की मोटाई, घनत्व, तापमान, भार और पदार्थों की प्रकृति पर पूर्ण सहमति न होने के बावजूद तापमान, दबाव, घनत्व, उल्काओं एवं भूकंपीय तरंगों के आधार पर जानकारी जुटाकर आंतरिक हिस्से को तीन मुख्य भागों में विभाजित किया गया है:

A. भू-पर्पटी (Crust)

  • परिभाषा: यह पृथ्वी का सबसे ऊपरी भाग है, जो अंदर की तरफ 34 किमी तक विस्तृत है।

  • चट्टानें: यह मुख्यतः बेसाल्ट चट्टानों से बना है।

  • उप-भाग: इसके दो भाग हैं:

    1. सियाल (SIAL): इसमें सिलिकन (SI) एवं एलुमिना (AL) की बहुलता होती है।

    2. सीमा (SIMA): इसमें सिलिकन (SI) एवं मैग्नेशियम (MA) की बहुलता होती है।

  • घनत्व एवं आयतन: इसका औसत घनत्व 2.7 ग्राम/सेमी³ है और यह पृथ्वी के कुल आयतन का 0.5% भाग घेरता है।

  • भूपटल की रचना-सामग्री (तत्वों का प्रतिशत):

    • ऑक्सीजन: 46.80% (सर्वाधिक)

    • सिलिकन: 27.72% (दूसरे स्थान पर)

    • एल्युमीनियम: 8.13% (तीसरे स्थान पर)

B. मेंटल (Mantle)

  • विस्तार: यह 2,900 किमी मोटा क्षेत्र है, जो मुख्यतः बेसाल्ट पत्थरों के समूह की चट्टानों से बना है।

  • विशेषता: मेंटल के इसी हिस्से में मैग्मा चैम्बर पाए जाते हैं।

  • घनत्व एवं आयतन: इसका औसत घनत्व 3.5 ग्राम/सेमी³ से 5.5 ग्राम/सेमी³ तक है। यह पृथ्वी के कुल आयतन का सर्वाधिक 83% भाग घेरता है।

C. केन्द्रीय भाग (Core / क्रोड)

  • परिभाषा: यह पृथ्वी के केंद्र का क्षेत्र है।

  • संरचना: यह निकेल (Ni) व फेरस/लोहा (Fe) का बना है (जिसे ‘निफे’ भी कहते हैं)।

  • अवस्था: पृथ्वी का केंद्रीय भाग संभवतः द्रव अथवा प्लास्टिक अवस्था में है।

  • घनत्व एवं आयतन: इसका औसत घनत्व 13 gram/cm³ है और यह पृथ्वी के कुल आयतन का 16% भाग घेरता है।

🔍 पृथ्वी की विभिन्न असंबद्धताएँ (Discontinuities)

पृथ्वी की विभिन्न परतों और उप-परतों के बीच के सीमा क्षेत्रों (ट्रांजिशन ज़ोन) को असंबद्धता कहा जाता है:

  • कोनराड असंबद्धता: ऊपरी क्रस्ट एवं निचले क्रस्ट के बीच का सीमा क्षेत्र।

  • मोहसिविक-डिसकन्टीन्यूटी (Mohorovicic Discontinuity): क्रस्ट एवं मेंटल के बीच का सीमा क्षेत्र।

  • रेपेटी असंबद्धता: ऊपरी मेंटल एवं निचले मेंटल के बीच का सीमा क्षेत्र।

  • गुटेनबर्ग-विशार्ट असंबद्धता: निचले मेंटल तथा ऊपरी क्रोड (Core) का सीमा क्षेत्र।

  • लैहमेन असंबद्धता: बाह्य क्रोड तथा आंतरिक क्रोड के बीच का सीमा क्षेत्र।

📈 आंतरिक भाग के अन्य महत्वपूर्ण तथ्य

  • औसत घनत्व: पूरी पृथ्वी का औसत घनत्व 5.5 ग्राम/सेमी³ है।

  • औसत त्रिज्या: पृथ्वी की औसत त्रिज्या लगभग 6,370 किमी है।

  • तापमान वृद्धि: पृथ्वी के नीचे जाने पर प्रति 32 मीटर की गहराई पर तापमान 1°C बढ़ जाता है

  • जॉर्डन का मृत सागर (Dead Sea): पृथ्वी के स्थलीय क्षेत्र पर सबसे नीचा क्षेत्र है, जो समुद्र तल से औसतन 400 मीटर नीचा है।

  • पृथ्वी के आकार से संबंधित विचार:

    • पाइथागोरस: सबसे पहले बताया कि पृथ्वी गोल है और आकाश में स्वतंत्र रूप से लटकी हुई है।

    • सर आइजक न्यूटन: साबित किया कि पृथ्वी नारंगी के समान है।

    • जेम्स जीन: इसे नारंगी के बजाय नाशपाती के समान बतलाया।

2. पृथ्वी की बाह्य सतह एवं स्थलमंडल (Lithosphere)

पृथ्वी की बाह्य सतह को मुख्यतः 4 भागों में बाँटा जा सकता है:

  1. स्थलमंडल (Lithosphere)

  2. जलमंडल (Hydrosphere)

  3. वायुमंडल (Atmosphere)

  4. जैवमंडल (Biosphere)

🗺️ स्थलमंडल के मुख्य तथ्य

  • परिभाषा: पृथ्वी की सम्पूर्ण बाह्य परत, जिस पर महाद्वीप एवं महासागर स्थित हैं, स्थलमंडल कहलाती है।

  • स्थल बनाम जल: पृथ्वी के कुल 29% भाग पर स्थल तथा 71% भाग पर जल है।

  • गोलार्द्धों में जल का वितरण:

    • उत्तरी गोलार्द्ध के 61% क्षेत्रफल पर जल है।

    • दक्षिणी गोलार्द्ध के 81% क्षेत्रफल पर जल का साम्राज्य है।

  • ऊँचाई एवं गहराई का चरम: पृथ्वी पर अधिकतम ऊँचाई माउंट एवरेस्ट (8,850 मी०) की तथा अधिकतम गहराई प्रशांत महासागर के मेरियाना गर्त (11,033 मी०) की है। इन दोनों के बीच लगभग 20 किमी का अंतर है।

  • परत की मोटाई: स्थलमंडल महाद्वीपीय क्षेत्रों में अधिक मोटी (40 किमी) और महासागरीय क्षेत्रों में अपेक्षाकृत पतली (12 से 20 किमी) होती है।

3. चट्टानें (Rocks)

पृथ्वी की सतह के कठोर भाग को चट्टान कहते हैं, जो पृथ्वी की बाहरी परत की मूलभूत संरचनात्मक इकाइयाँ हैं। उत्पत्ति के आधार पर ये तीन प्रकार की होती हैं:

(i) आग्नेय चट्टान (Igneous Rock)

  • निर्माण: यह मैग्मा या लावा के ठंडे होकर जमने से बनती है।

  • उदाहरण: ग्रेनाइट, बेसाल्ट, पेग्माटाइट, डायोराइट, गैब्रो आदि।

  • विशेषताएं: ये चट्टानें स्थूल, परत-रहित, कठोर, सघन एवं जीवाश्म-रहित (no fossils) होती हैं।

  • आर्थिक महत्व: आर्थिक रूप से यह बहुत समृद्ध चट्टान है। इसमें चुंबकीय लोहा, निकेल, ताँबा, सीसा, जस्ता, क्रोमाइट, मैग्नीज, सोना तथा प्लैटिनम पाए जाते हैं।

  • बेसाल्ट: इसमें लोहे की मात्रा सर्वाधिक होती है। बेसाल्ट चट्टान के क्षरण (टूटने) से काली मिट्टी (Black Soil) का निर्माण होता है।

  • पेग्माटाइट: कोडरमा (झारखंड) में पाया जाने वाला अभ्रक (Mica) इन्हीं शैलों में मिलता है।

🌋 आग्नेय चट्टानी पिंड (Igneous Rock Bodies)

अंतर्वेधी (भूपर्पटी के अंदर) मैग्मा के ठंडा होने से विभिन्न प्रकार के पिंड बनते हैं:

  1. बैथोलिथ (Batholith): यह सबसे बड़ा आग्नेय चट्टानी पिंड है। यह एक पातालीय, खड़े किनारों वाला और विषम ऊपरी तल वाला बड़ा गुम्बद होता है। यह मूलतः ग्रेनाइट से बनता है। (उदा. USA का इदाहो बैथोलिथ – 40,000 वर्ग किमी से अधिक; कनाडा का कोस्ट रेंज बैथोलिथ इससे भी बड़ा है)।

  2. स्टॉक (Stock): छोटे आकार के बैथोलिथ को स्टॉक कहते हैं। इसका ऊपरी भाग गोलाकार गुम्बदनुमा होता है और विस्तार 100 वर्ग किमी से कम होता है।

  3. लैकोलिथ (Lacolith): जब मैग्मा ऊपर की परत को जोर से ढकेलता है और ऊपर उठकर छतरीनुमा या गुम्बदाकार रूप में जम जाता है। यह बहिर्वेधी ज्वालामुखी पर्वत का अंतर्वेधी प्रतिरूप है। उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी भाग में इसके कई उदाहरण हैं।

  4. लैपोलिथ (Lapolith): जब मैग्मा जमकर तश्तरीनुमा (Saucer-shaped) आकार ग्रहण कर लेता है। यह मुख्य रूप से दक्षिण अमेरिका में मिलते हैं।

  5. फैकोलिथ (Phacolith): जब मैग्मा लहरदार आकृति (अपनति और अभिनति) में जमता है।

  6. सिल (Sill): जब मैग्मा भूपृष्ठ के समानांतर परतों में फैलकर जमता है। इसकी मोटाई 1 मीटर से सैकड़ों मीटर तक होती है (छत्तीसगढ़ तथा झारखंड में प्राप्य)। 1 मीटर से कम मोटाई वाले सिल को शीट (Sheet) कहते हैं।

  7. डाइक (Dyke): जब मैग्मा किसी लम्बवत (Vertical) दरार में जमता है (उदा. झारखंड के सिंहभूम जिले में अनेक डाइक हैं)।

(ii) अवसादी चट्टान (Sedimentary Rock)

  • निर्माण: प्रकृति के कारकों (नदी, हवा आदि) द्वारा निर्मित छोटे-छोटे कण जब किसी स्थान पर जमा होते हैं और कालांतर में दबाव या रासायनिक प्रतिक्रिया से परतदार ठोस रूप ले लेते हैं।

  • उदाहरण: बलुआ पत्थर, चूना पत्थर, स्लेट, कांग्लोमरेट, नमक की चट्टान एवं खड़िया/शैलखड़ी।

  • विशेषताएं: ये चट्टानें परतदार होती हैं और इनमें वनस्पति एवं जीव-जन्तुओं के जीवाश्म (Fossils) पाए जाते हैं।

  • खनिज एवं आर्थिक महत्व: इनमें लौह अयस्क, फॉस्फेट, कोयला और सीमेंट बनाने के पत्थर पाए जाते हैं।

    • खनिज तेल: अवसादी चट्टानों में ही खनिज तेल पाया जाता है (विशेषकर जब दो अप्रवेश्य चट्टानों की परतों के बीच एक प्रवेश्य शैल की परत आ जाए)।

    • कोयला भंडार: दामोदर, महानदी तथा गोदावरी नदी बेसिनों की अवसादी चट्टानों में कोयला पाया जाता है।

    • ऐतिहासिक इमारतें: आगरा का किला तथा दिल्ली का लाल किला बलुआ पत्थर नामक अवसादी चट्टान से ही बने हैं।

(iii) कायान्तरित / रूपांतरित चट्टान (Metamorphic Rock)

  • निर्माण: अत्यधिक ताप, दाब एवं रासायनिक क्रियाओं के कारण आग्नेय एवं अवसादी चट्टानों के मूल रूप में परिवर्तन (रूपांतरण) होने से इनका निर्माण होता है।

🔄 चट्टानों के रूपांतरण की सारणी:

मूल चट्टान का प्रकार मूल चट्टान (Original Rock) रूपांतरित चट्टान (Metamorphic Rock)
आग्नेय से रूपांतरित ग्रेनाइट नीस (Gneiss)
आग्नेय से रूपांतरित साइनाइट साइनाइट नीस
आग्नेय से रूपांतरित गैब्रो सरपेंटाइन
आग्नेय से रूपांतरित बेसाल्ट सिस्ट
अवसादी से रूपांतरित सपिंड (Conglomerate) सपिंड सिस्ट
अवसादी से रूपांतरित बलुआ पत्थर क्वार्टजाइट
अवसादी से रूपांतरित शेल स्लेट
अवसादी से रूपांतरित चूना पत्थर संगमरमर (Marble)
अवसादी से रूपांतरित बिटुमिनस कोयला ग्रेफाइट
रूपांतरित से पुनः रूपांतरित स्लेट फाइलाइट
रूपांतरित से पुनः रूपांतरित फाइलाइट सिस्ट
कोयला रूपांतरण लिग्नाइट कोयला एंथ्रोसाइट कोयला

4. ज्वालामुखी (Volcanoes)

भूपटल पर वह प्राकृतिक छेद या दरार जिससे होकर पृथ्वी का पिघला पदार्थ (लावा), राख, भाप तथा अन्य गैसें बाहर निकलती हैं, ज्वालामुखी कहलाता है।

  • सिंडर: बाहर हवा में उड़ा हुआ लावा जब शीघ्र ही ठंडा होकर छोटे ठोस टुकड़ों में बदल जाता है, तो उसे सिंडर कहते हैं।

  • गैसें: ज्वालामुखी उद्गार में निकलने वाली गैसों में जलवाष्प (Water Vapor) का प्रतिशत सर्वाधिक होता है।

🕒 उद्गार की अवधि के अनुसार प्रकार:

  1. सक्रिय ज्वालामुखी (Active Volcano): इसमें अक्सर उद्गार होता रहता है। वर्तमान में विश्व में इनकी संख्या लगभग 500 है।

    • प्रमुख उदाहरण: इटली का एटना तथा स्ट्राम्बोली। मेक्सिको का कोलिमा ज्वालामुखी बहुत सक्रिय है (40 से अधिक बार उद्गार)।

    • भूमध्य सागर का प्रकाश स्तंभ: स्ट्राम्बोली ज्वालामुखी भूमध्य सागर में सिसली के उत्तर में लिपारी द्वीप पर है। इससे सदा प्रज्वलित गैसें निकलने के कारण आस-पास का भाग प्रकाशित रहता है।

  2. प्रसुप्त ज्वालामुखी (Dormant Volcano): जिसमें निकट अतीत में उद्गार नहीं हुआ है, लेकिन कभी भी अचानक उद्गार हो सकता है।

    • प्रमुख उदाहरण: विसुवियस (भूमध्य सागर), क्राकाटोवा (सुंडा जलडमरूमध्य), फ्यूजीयामा (जापान), मेयन (फिलीपीन्स)।

  3. शान्त / मृत ज्वालामुखी (Extinct Volcano): जिसमें ऐतिहासिक काल से कोई उद्गार नहीं हुआ है और पुनः उद्गार होने की संभावना नहीं है।

    • प्रमुख उदाहरण: कोह सुल्तान एवं देमवन्द (ईरान), पोपा (म्यान्मार), किलीमंजारो (अफ्रीका), चिम्बराजो (दक्षिण अमेरिका)।

🌋 ज्वालामुखी से जुड़े अन्य विशिष्ट तथ्य

  • अग्नि वलय (Ring of Fire): कुल सक्रिय ज्वालामुखियों का अधिकांश भाग प्रशांत महासागर के तटीय भाग में पाया जाता है, इसलिए प्रशांत महासागर की इस परिमेखला को ‘अग्नि वलय’ कहते हैं। सबसे अधिक सक्रिय ज्वालामुखी अमेरिका और एशिया महाद्वीप के तटों पर हैं।

  • अपवाद: ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप में एक भी ज्वालामुखी नहीं है।

  • गेसर (Geyser): ज्वालामुखी क्षेत्रों में दरारों से कुछ ऊँचाई तक गर्म जल और वाष्प का वेग से निकलना। (उदा. USA के येलोस्टोन पार्क का ‘ओल्ड फेथफुल गेसर’, जिसमें प्रत्येक मिनट उद्गार होता है)।

  • ऊँचाई के रिकॉर्ड:

    • विश्व का सबसे ऊँचा ज्वालामुखी पर्वत: कोटोपैक्सी (इक्वेडोर) – ऊँचाई 19,613 फीट।

    • विश्व का सबसे ऊँचाई पर स्थित सक्रिय ज्वालामुखी: ओजस डेल सालाडो (6,885 मी०), एंडीज पर्वतमाला पर अर्जेंटीना-चिली सीमा पर।

    • विश्व का सबसे ऊँचाई पर स्थित शांत ज्वालामुखी: एकांकागुआ (6,960 मी०), एंडीज पर्वतमाला पर।

5. भूकंप (Earthquakes)

  • सिस्मोलॉजी (Seismology): भूगर्भशास्त्र की वह विशेष शाखा जिसमें भूकंपों का अध्ययन किया जाता है।

  • रिक्टर पैमाना (Richter Scale): भूकंप की तीव्रता मापने का स्केल, जिसका विकास अमेरिकी वैज्ञानिक चार्ल्स रिक्टर द्वारा 1935 में किया गया था।

    • तीव्रता का प्रभाव: 2.0 या 3.0 की तीव्रता हल्की होती है, जबकि 6.2 या अधिक की तीव्रता शक्तिशाली भूकंप दर्शाती है।

  • सिस्मोग्राफ (Seismograph): भूकंपीय तरंगों को रेखांकित (Record) करने वाला यंत्र।

〰️ भूकंपीय कंपनों (तरंगों) के प्रकार:

  1. प्राथमिक तरंग (Primary / P-Wave): यह तरंग पृथ्वी के अंदर प्रत्येक माध्यम (ठोस, द्रव, गैस) से गुजर सकती है। इसका औसत वेग 8 किमी/सेकंड होता है (सर्वाधिक गति), इसलिए यह धरातल पर सबसे पहले पहुँचती है।

  2. द्वितीय तरंग (Secondary / S-Wave): इन्हें अनुप्रस्थ (Transverse) तरंगें भी कहते हैं। यह तरंग केवल ठोस माध्यम से गुजर सकती है (द्रव में लुप्त हो जाती है)। इसका औसत वेग 4 किमी/सेकंड होता है।

  3. एल तरंगें (Long / L-Wave): इन्हें धरातलीय या लम्बी तरंगें कहते हैं। इनकी खोज H. D. Love ने की थी, इसलिए इन्हें ‘Love Waves’ या ‘R-Waves’ (Rayleigh Waves) भी कहा जाता है। ये मुख्यतः धरातल तक सीमित रहती हैं और ठोस, तरल व गैस तीनों माध्यमों से गुजर सकती हैं। इनका औसत वेग सबसे कम (1.5 से 3 किमी/सेकंड) होता है, परंतु ये सबसे विनाशकारी होती हैं।

📊 भूकंपीय तरंगों का व्यवहार और छाया क्षेत्र

  • तरंगों का वेग अधिक घनत्व वाले पदार्थों में बढ़ जाता है और कम घनत्व वाले पदार्थों में घट जाता है।

  • विभिन्न माध्यमों में तरंगें परावर्तित (Reflect) तथा अपवर्तित (Refracted) होती हैं।

  • केन्द्र (Focus): भू-गर्भ का वह स्थान जहाँ भूकंप का उद्भव होता है। यहाँ P, S और L तीनों तरंगें पहुँचती हैं। अंदर ये तरंगें अवतल (Concave) मार्ग पर यात्रा करती हैं।

  • छाया क्षेत्र (Shadow Zone): भूकंप केंद्र से धरातल पर 11,000 किमी की दूरी तक P और S तरंगें पहुँचती हैं। इसके बाद केंद्रीय भाग (Core) में पहुँचने पर S-तरंगें लुप्त हो जाती हैं और P-तरंगें अपवर्तित हो जाती हैं। इस कारण भूकंप केंद्र से 11,000 किमी के बाद अगले लगभग 5,000 किमी तक कोई भी तरंग नहीं पहुँचती, इस क्षेत्र को ‘छाया क्षेत्र’ कहा जाता है।

  • अधिकेन्द्र (Epicentre): भूकंप के केंद्र के ठीक ऊपर पृथ्वी की सतह (धरातल) पर स्थित बिंदु।

  • सुनामी (Tsunami): अंतःसागरीय (समुद्र के अंदर) भूकंपों द्वारा उत्पन्न विनाशकारी लहरों को जापान में ‘सुनामी’ कहा जाता है।

6. विभिन्न स्थलाकृतियाँ, वन एवं घास के मैदान

निर्माण के आधार पर स्थलाकृतियाँ मुख्यतः तीन प्रकार की होती हैं— 1. पर्वत, 2. पठार तथा 3. मैदान।

A. पर्वत (Mountains)

उत्पत्ति के अनुसार पर्वत चार प्रकार के होते हैं:

  • (a) ब्लॉक पर्वत (Block Mountain): चट्टानों में भ्रंश (Fault) के कारण मध्य भाग नीचे धँस जाता है और अगल-बगल के भाग ऊँचे उठे प्रतीत होते हैं। बीच के धँसे भाग को रिफ्ट घाटी (Rift Valley) कहते हैं। इनके शीर्ष समतल और किनारे तीव्र ढाल वाले होते हैं।

    • उदाहरण: वॉस्जेस (फ्रांस), ब्लैक फॉरेस्ट (जर्मनी), साल्ट रेंज (पाकिस्तान)।

    • विशेष तथ्य: विश्व की सबसे लंबी रिफ्ट घाटी जॉर्डन नदी की घाटी है, जो लाल सागर की बेसिन से होती हुई जाम्बेजी नदी तक 4,800 किमी लंबी है।

  • (b) अवशिष्ट पर्वत (Residual Mountain): ये चट्टानों के निरंतर अपरदन (Erosion) के फलस्वरूप निर्मित होते हैं।

    • उदाहरण: विंध्याचल, सतपुड़ा, नीलगिरी, पारसनाथ, राजमहल की पहाड़ियाँ (भारत), सीयरा (स्पेन), गैसा एवं बूटे (अमेरिका)।

  • (c) संचित पर्वत (Accumulated Mountain): भूपटल पर मिट्टी, बालू, कंकड़, पत्थर या लावा के एक स्थान पर धीरे-धीरे जमा होने से बनते हैं (जैसे- रेगिस्तान के बालू के स्तूप)।

  • (d) वलित पर्वत (Fold Mountain): ये पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों द्वारा चट्टानों में मोड़ या वलन पड़ने से बनते हैं। ये लहरदार पर्वत होते हैं जिनमें अनेक अपनतियाँ (Anticlines) और अभिनतियाँ (Synclines) होती हैं।

    • उदाहरण: हिमालय, आल्प्स, यूराल, रॉकीज, एंडीज आदि।

📐 पर्वत निर्माण के प्रमुख सिद्धांत:

सिद्धांत का नाम प्रतिपादक / वैज्ञानिक
भू-सन्तति का सिद्धांत कोबर
तापीय संकुचन सिद्धांत जेफ्रीज
महाद्वीपीय फिसलन सिद्धांत डेली
महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत वेगनर
संवहन तरंग सिद्धांत होम्स
रेडियो एक्टिविटी सिद्धांत जोली
प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत (Plate Tectonics) हैरी हेस, मैंकेजी, पार्कर, मोर्गन आदि
  • हिमालय का निर्माण: आधुनिक प्लेट टेक्टॉनिक सिद्धांत के अनुसार, जहाँ आज हिमालय है, वहाँ पहले टेथिस सागर नामक एक विशाल भू-अभिनति (Geosyncline) थी। दक्षिणी पठार के उत्तर की ओर खिसकने के कारण टेथिस सागर के मलबे में वलन (मोड़) पड़ गए और वह ऊपर उठकर विश्व का सबसे ऊँचा पर्वत बन गया।

  • अरावली पर्वत: भारत का अरावली पर्वत विश्व के सबसे पुराने वलित पर्वतों में से है। इसकी सबसे ऊँची चोटी माउंट आबू के निकट गुरुशिखर (1,722 मी०) है। कुछ विद्वान इसे अब अवशिष्ट पर्वत भी मानते हैं।

B. पठार (Plateaus)

धरातल का वह विशिष्ट रूप जो आस-पास के धरातल से पर्याप्त ऊँचा हो परंतु उसका शीर्ष भाग चौड़ा और सपाट हो। सामान्यतः ऊँचाई 300 से 500 फीट होती है, पर कुछ बहुत ऊँचे पठार भी हैं (जैसे- तिब्बत का पठार: 16,000 फीट, बोलीविया का पठार: 12,000 फीट, कोलम्बिया का पठार: 7,800 फीट)।

  • पठारों के प्रकार:

    • (a) अन्तर्पवतीय पठार: चारों ओर से पर्वतमालाओं के बीच घिरे पठार।

    • (b) पर्वतपदीय पठार: ऊंचे पर्वत के पाद (तल) और मैदान के बीच का समतल उठा भाग।

    • (c) महाद्वीपीय पठार: जब पृथ्वी के भीतर जमा लैकोलिथ पिंड ऊपरी अपरदन के कारण सतह पर उभर आते हैं (जैसे- दक्षिण/दक्कन का पठार)।

    • (d) तटीय पठार: समुद्र के तटीय भागों में स्थित पठार।

    • (e) गुम्बदाकार पठार: पृथ्वी के पटल पर वलन या चलन क्रिया के कारण निर्मित (जैसे- भारत का रामगढ़ गुम्बद)।

C. मैदान (Plains)

भूपृष्ठ के 500 फीट से कम ऊँचाई वाले समतल भागों को मैदान कहते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं:

  1. अपरदनात्मक मैदान (Erosional Plains): नदी, हिमानी, पवन आदि शक्तियों के अपरदन से बनते हैं।

    • लोएस मैदान: हवा द्वारा उड़ाकर लाई गई बारीक मिट्टी और बालू के कणों से निर्मित।

    • कार्सट मैदान: चूना पत्थर की चट्टानों के जल में घुलने से निर्मित मैदान।

    • समप्राय मैदान (Peneplain): समुद्र तल के निकट स्थित मैदान, जो नदियों के अंतिम चरण के अपरदन से बनते हैं।

    • ग्लेशियल मैदान: हिम के जमाव के कारण निर्मित दलदली मैदान, जहाँ केवल वन पाए जाते हैं।

    • रेगिस्तानी मैदान: वर्षा या यदा-कदा बहने वाली नदियों के बहाव व अपरदन के फलस्वरूप निर्मित।

  2. निक्षेपात्मक मैदान (Depositional Plains): नदियों द्वारा लाए गए अवसादों के निक्षेप (जमाव) से बनते हैं। (उदा. गंगा, सतलज, मिसीसिपी एवं ह्वांगहो के मैदान)। इनमें जलोढ़ का मैदान और डेल्टा का मैदान प्रमुख हैं।

💧 विभिन्न कारकों द्वारा निर्मित विशिष्ट स्थलाकृतियाँ (Geomorphological Landscapes)

  1. भूमिगत जल (Groundwater) द्वारा: उत्स्रुत कुआँ (Artesian Well – सर्वाधिक ऑस्ट्रेलिया में पाए जाते हैं), गीजर, घोल रंध्र, डोलाइन, कार्सट झील, युवाला, पोलिए, कंदरा (गुफा), स्टेलेक्टाइट, स्टेलेग्माइट, लैपीज।

  2. सागरीय जल (Marine Water) द्वारा: सर्फ, वेलांचली, तंगरिका, पुलिन (Beach), हुक, लूप, टोम्बोलो।

  3. हिमनद (Glacier) द्वारा: सर्क, टार्न, अरेट, हॉर्न, नुनाटक, फियोर्ड, ड्रमलिन, केम आदि।

  4. पवन (Wind) द्वारा: ज्युगेन, यारडंग, इनसेलवर्ग, छत्रक (Mushroom Rock), प्लेया, लैगून, बरखान, लोएस।

  5. समुद्री तरंग (Sea Waves) द्वारा: समुद्री भृगु (Cliff), भुजिह्वा, लैगून झील, रिया तट (भारत का पश्चिमी तट इसका उदाहरण है), स्टैक, डाल्मेशियन तट (युगोस्लाविया का तट)।

🌲 वनों के प्रकार (Types of Forests)

  • (a) उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार वन (Tropical Evergreen Rain Forest): विषुवतीय और उष्णकटिबंधीय प्रदेशों में जहाँ 200 सेमी से अधिक वर्षा होती है। यहाँ के पेड़ों की पत्तियाँ चौड़ी होती हैं।

  • (b) उष्ण कटिबन्धीय अर्ध-पतझड़ वन (Tropical Semi-Deciduous Forest): जहाँ 150 सेमी से कम वर्षा होती है। यहाँ साल, सागवान (Teak) एवं बाँस आदि मुख्य रूप से पाए जाते हैं।

  • (c) विषुवतीय वन / भूमध्यसागरीय वन: वृक्ष और झाड़ियों का मिश्रण होता है; जैतून, कॉर्क तथा ओक यहाँ के मुख्य वृक्ष हैं।

  • (d) टैगा वन (Taiga Forest): ये सदाबहार वन हैं, जिनके वृक्षों की पत्तियाँ नुकीली (Coniferous) होती हैं।

  • (e) टुण्ड्रा वन (Tundra Forest): यह क्षेत्र वर्षभर बर्फ से ढँका रहता है। केवल गर्मी के कुछ समय में यहाँ मॉस (Moss) तथा लाइकेन उगते हैं।

  • (f) पर्वतीय वन: यहाँ चौड़ी पत्ती वाले शंकुधारी (Coniferous) वृक्ष ऊंचाई पर पाए जाते हैं।

🌾 घास के मैदान (Grasslands)

विश्व की घास-भूमियों को जलवायु के आधार पर दो मुख्य वर्गों में विभाजित किया गया है:

(a) उष्ण कटिबंधीय घास-भूमियाँ (Tropical Grasslands)

यह भूमध्य रेखा के आस-पास गर्म क्षेत्रों में पाई जाती हैं। विभिन्न देशों में इनके नाम:

  • सवाना (Savanna): अफ्रीका

  • कम्पोज (Campos): ब्राजील

  • लानोस (Llanos): वेनेजुएला व कोलम्बिया

(b) शीतोष्ण कटिबंधीय घास-भूमियाँ (Temperate Grasslands)

यह ठंडे और मध्यम तापमान वाले क्षेत्रों में पाई जाती हैं। विभिन्न देशों में इनके नाम:

  • प्रेयरी (Prairie): संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) व कनाडा

  • पम्पास (Pampas): अर्जेंटीना

  • वेल्ड (Veld): दक्षिण अफ्रीका

  • डाउन्स (Downs): ऑस्ट्रेलिया

  • स्टेपी (Steppe): एशिया, यूक्रेन, रूस, तथा चीन का मंचूरिया प्रदेश

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