स्थिर वैद्युत् (Electrostatics)

विद्युत आवेश, कूलाम का नियम, धारिता, स्थिर विद्युत परिरक्षक और विद्युत सेल

1. स्थिर वैद्युत् एवं विद्युत आवेश

परिभाषा: पदार्थों को परस्पर रगड़ने से उस पर जो आवेश की मात्रा संचित रहती है, उसे स्थिर-विद्युत् कहते हैं। स्थिर विद्युत में आवेश हमेशा स्थिर (एक ही स्थान पर रुका हुआ) रहता है।

मूल गुण व नियम:

  • आवेश के प्रकार: प्रसिद्ध वैज्ञानिक बेंजामिन फ्रैंकलिन ने दो प्रकार के आवेशों को ‘धनात्मक आवेश’ (+) व ‘ऋणात्मक आवेश’ (-) नाम दिया।
  • आकर्षण व प्रतिकर्षण: समान प्रकार के आवेश (धन-धन या ऋण-ऋण) परस्पर प्रतिकर्षित करते हैं तथा विपरीत प्रकार के आवेश (धन-ऋण) परस्पर आकर्षित करते हैं।
  • आवेशन का कारण: किसी भी वस्तु के आवेशित होने का मुख्य कारण इलेक्ट्रॉनों का स्थानान्तरण होता है।

घर्षण विद्युत श्रृंखला (Electrostatic Series)

यदि नीचे दी गई सारणी में से किसी भी ऊपर वाली वस्तु को नीचे वाली वस्तु से रगड़ा जाए, तो ऊपर वाली वस्तु में धन आवेश (+) तथा नीचे वाली वस्तु में ऋण आवेश (-) उत्पन्न होता है। (जैसे—काँच को कागज के साथ रगड़ने पर काँच में धन आवेश एवं कागज में ऋण आवेश आएगा)।

घर्षण विद्युत अनुक्रम (ऊपर = धन आवेश | नीचे = ऋण आवेश)
1. रोआँ (Fur) 5. काँच (Glass) 9. लकड़ी (Wood) 13. अम्बर (Amber)
2. फलानेल (Flannel) 6. कागज (Paper) 10. धातु (Metals) 14. गंधक (Sulphur)
3. चपड़ा (Lac) 7. रेशम (Silk) 11. रबर (Rubber) 15. एबोनाइट (Ebonite)
4. मोम (Wax) 8. मानव शरीर (Human body) 12. रेजिन (Resin) 16. गाटा-पार्चा (Gutta-percha)

2. आवेश का पृष्ठ घनत्व एवं चालक/अचालक

  • आवेश का पृष्ठ घनत्व (Surface Density of Charge): चालक के इकाई (एकांक) क्षेत्रफल पर स्थित आवेश की कुल मात्रा को उसका पृष्ठ घनत्व कहते हैं।
    • यह चालक के आकार तथा उसके समीप स्थित अन्य चालक या विद्युत रोधी पदार्थों पर निर्भर करता है।
    • नुकीले भागों का प्रभाव: पृष्ठ घनत्व सबसे अधिक चालक के नुकीले भाग पर होता है, क्योंकि नुकीले भाग का क्षेत्रफल सबसे कम होता है।
  • चालक (Conductor): जिन पदार्थों से होकर विद्युत आवेश सरलता से प्रवाहित होता है, उन्हें चालक कहते हैं। उदाहरण: चाँदी, ताँबा, एल्युमिनियम आदि। (नोट: चाँदी विद्युत का सबसे अच्छा चालक है, दूसरे स्थान पर ताँबा आता है)।
  • अचालक (Non-conductors): जिन पदार्थों से होकर आवेश का प्रवाह नहीं हो पाता, उन्हें अचालक या विद्युत रोधी कहते हैं। उदाहरण: लकड़ी, रबर, कागज आदि।

3. स्थिर विद्युत के प्रमुख नियम एवं परिभाषाएँ

क) कूलाम का नियम (Coulomb’s Law)

दो स्थिर विद्युत आवेशों के बीच लगने वाला आकर्षण अथवा प्रतिकर्षण बल दोनों आवेशों की मात्राओं के गुणनफल के अनुक्रमानुपाती (F ∝ q1q2) एवं उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती (F ∝ 1/r2) होता है। यह बल दोनों आवेशों को मिलाने वाली रेखा के अनुदिश ही कार्य करता है।

ख) विद्युत क्षेत्र और इसकी तीव्रता

  • विद्युत क्षेत्र (Electric Field): किसी आवेश या आवेशित वस्तु के चारों ओर का वह स्थान जहाँ तक उसके प्रभाव का अनुभव किया जा सके, विद्युत क्षेत्र कहलाता है।
  • विद्युत क्षेत्र की तीव्रता (Intensity of Electric Field): विद्युत क्षेत्र में किसी बिन्दु पर स्थित एकांक धन आवेश पर कार्य करने वाले बल को विद्युत क्षेत्र की तीव्रता कहा जाता है।
खोखले चालक का विद्युत क्षेत्र (Electrostatic Shielding):
किसी भी खोखले चालक के अन्दर विद्युत क्षेत्र हमेशा शून्य होता है। यदि ऐसे चालक को आवेशित किया जाए, तो संपूर्ण आवेश उसके केवल बाहरी पृष्ठ (सतह) पर ही रहता है। अतः खोखला गोला एक उत्कृष्ट विद्युत परिरक्षक (Electrostatic shield) का कार्य करता है।व्यावहारिक उदाहरण: यही कारण है कि यदि आसमानी बिजली (तड़ित) किसी कार पर गिर जाए, तो कार के अन्दर बैठे व्यक्ति पूर्णतः सुरक्षित रहते हैं। तड़ित से प्राप्त संपूर्ण विद्युत आवेश कार की केवल बाहरी सतह पर ही फैल जाता है और अन्दर नहीं पहुँच पाता।

ग) विद्युत विभव, विभवान्तर एवं धारिता

  • विद्युत विभव (Electric Potential): किसी धनात्मक आवेश को अनन्त से विद्युत क्षेत्र के किसी बिन्दु तक लाने में किए गए कार्य (W) एवं आवेश के मान (q) के अनुपात को उस बिन्दु का विद्युत विभव कहा जाता है।
    V = W / q

    यह एक अदिश राशि है और इसका S.I. मात्रक वोल्ट (V) होता है।

  • विभवान्तर (Potential Difference): 1 कूलॉम धनात्मक आवेश को विद्युत क्षेत्र में एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक ले जाने में किए गए कार्य को उन दोनों बिन्दुओं के मध्य का विभवान्तर कहते हैं। इसका मात्रक भी वोल्ट होता है और यह एक अदिश राशि है।
  • विद्युत धारिता (Electric Capacity): किसी चालक की धारिता (C) चालक को दिए गए आवेश (Q) तथा उसके कारण चालक के विभव में होने वाले परिवर्तन (V) के अनुपात को कहते हैं (C = Q/V)। इसका SI मात्रक फैराड (F) होता है।

4. विद्युत सेल (Electric Cells)

विद्युत सेल मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं:

  1. प्राथमिक सेल (Primary Cell): इन सेलों में रासायनिक ऊर्जा को सीधे विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है। इन्हें एक बार प्रयोग कर लेने के बाद दोबारा चार्ज नहीं किया जा सकता (अर्थात ये बेकार हो जाते हैं)। उदाहरण: वोल्टीय सेल, लेक्लांशे सेल, डेनियल सेल, शुष्क सेल।
  2. द्वितीयक सेल (Secondary Cell): इन सेलों में पहले विद्युत ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में (चार्जिंग के समय) और फिर रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में (उपयोग के समय) बदला जाता है। इन्हें आवेशन (Charging) करके बार-बार प्रयोग में लाया जा सकता है

प्रमुख प्राथमिक सेलों की आंतरिक संरचना:

सेल का नाम इतिहास / विभव एनोड (धनात्मक +) कैथोड (ऋणात्मक -) विद्युत अपघट्य (Electrolyte) / मिश्रण
वोल्टीय सेल (Voltaic Cell) आविष्कार: 1799 में प्रो० अलेसांड्रो वोल्टा द्वारा। ताँबे की छड़ (Cu) जस्ते की छड़ (Zn) तनु सल्फ्यूरिक अम्ल (H2SO4) (काँच के बर्तन में)
लेक्लांशे सेल (Leclanché Cell) विद्युत वाहक बल: लगभग 1.5 वोल्ट कार्बन की छड़ (मैंगनीज डाइऑक्साइड व कार्बन मिश्रण के बीच) जस्ते की छड़ (Zn) अमोनियम क्लोराइड (NH4Cl – नौसादर) का घोल
शुष्क सेल (Dry Cell) विभव: 1.5 वोल्ट केन्द्र में स्थित कार्बन की छड़ बाहरी जस्ते का बर्तन मैंगनीज डाइऑक्साइड (MnO2), अमोनियम क्लोराइड और कार्बन का नम मिश्रण
लेक्लांशे सेल का विशेष उपयोग:
लेक्लांशे सेल का प्रयोग विशेष रूप से उन स्थानों पर किया जाता है जहाँ लगातार विद्युत धारा के बजाय रुक-रुक कर थोड़े समय के लिए विद्युत धारा की आवश्यकता होती है। उदाहरण: विद्युत घंटी (Electric Bell), टेलीफोन आदि में।

 

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