ऊष्मा एवं ऊष्मागतिकी (Heat & Thermodynamics)
1. ऊष्मा एवं ताप: मूल अवधारणाएँ
- ऊष्मा (Heat): यह ऊर्जा का वह रूप है, जो एक वस्तु से दूसरी वस्तु में केवल तापान्तर (Temperature Difference) के कारण स्थानान्तरित होती है। किसी वस्तु में निहित ऊष्मा का कुल परिमाण उसके द्रव्यमान (Mass) पर निर्भर करता है। इसका S.I. मात्रक जूल (J) है।
- ताप (Temperature): ताप वह भौतिक कारक है, जो एक वस्तु से दूसरी वस्तु में ऊष्मीय ऊर्जा के प्रवाह की दिशा को निश्चित करता है। अर्थात्, जिस कारण से ऊर्जा स्थानान्तरण होती है, उसे ताप कहते हैं।
ऊष्मा का यांत्रिक तुल्यांक (Mechanical Equivalent of Heat)
यदि यांत्रिक कार्य W ऊष्मा Q में परिवर्तित होता है, तो कार्य और उत्पन्न ऊष्मा का अनुपात एक नियतांक होता है:
जहाँ J को ऊष्मा का यांत्रिक तुल्यांक कहते हैं। इसका मान 4.186 \text{ जूल/कैलोरी} होता है। इसका अर्थ है कि यदि 4.186 जूल का यांत्रिक कार्य किया जाए, तो 1 कैलोरी ऊष्मा उत्पन्न होगी।
ऊष्मा के अन्य मात्रक एवं पारस्परिक संबंध:
- कैलोरी (Calorie): 1 ग्राम शुद्ध जल का ताप 1^\circ\text{C} बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊष्मा की मात्रा।
- अन्तरराष्ट्रीय कैलोरी: 1 ग्राम शुद्ध जल का ताप 14.5^\circ\text{C} से 15.5^\circ\text{C} तक बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊष्मा।
- ब्रिटिश थर्मल यूनिट (B.Th.U.): 1 पौंड जल का ताप 1^\circ\text{F} बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊष्मा।
- 1 \text{ B.Th.U.} = 252 \text{ कैलोरी}
- 1 \text{ कैलोरी} = 4.186 \text{ जूल}
- 1 \text{ किलो कैलोरी} = 1000 \text{ कैलोरी} = 4186 \text{ जूल}
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2. ताप मापन और विभिन्न पैमाने
ताप मापने के लिए प्रयोग किए जाने वाले उपकरण को तापमापी (Thermometer) कहते हैं। मुख्य पैमाने निम्नलिखित हैं:
- सेल्सियस पैमाना (Celsius Scale): स्वीडन के वैज्ञानिक सेल्सियस द्वारा आविष्कृत। इसमें हिमांक (Freezing Point) को 0^\circ\text{C} तथा भाप-बिन्दु (Boiling Point) को 100^\circ\text{C} अंकित किया जाता है। इनके बीच का भाग 100 बराबर भागों में बँटा होता है। (इसे पहले सेंटीग्रेड पैमाना कहा जाता था)।
- फारेनहाइट पैमाना (Fahrenheit Scale): जर्मन वैज्ञानिक फारेनहाइट द्वारा आविष्कृत। इसका हिमांक 32^\circ\text{F} एवं भाप-बिन्दु 212^\circ\text{F} होता है। बीच की दूरी 180 बराबर भागों में विभाजित होती है।
- रोमर पैमाना (Reaumur Scale): इसका हिमांक 0^\circ\text{R} एवं भाप-बिन्दु 80^\circ\text{R} होता है। यह 80 बराबर भागों में बँटा होता है।
- केल्विन पैमाना (Kelvin Scale): इसमें हिमांक को 273 \text{ K} तथा भाप-बिन्दु को 373 \text{ K} अंकित किया जाता है। बीच की दूरी 100 बराबर भागों में बँटी होती है। ध्यान रहे, केल्विन पैमाने में डिग्री (^\circ) नहीं लिखा जाता।
(C – 0) / 100 = (F – 32) / 180 = (R – 0) / 80 = (K – 273) / 100
परम शून्य ताप (Absolute Zero Temperature): सैद्धांतिक रूप से निम्नतम ताप की एक सीमा है। किसी भी वस्तु का ताप -273.15^\circ\text{C} से कम नहीं हो सकता। इसे ही परम शून्य ताप कहते हैं। केल्विन पैमाने पर इसे 0 \text{ K} लिखा जाता है।
अर्थात्: 0 \text{ K} = -273.15^\circ\text{C} एवं 273.16 \text{ K} = 0^\circ\text{C}
विभिन्न प्रकार के तापमापी और उनकी सीमाएं:
| तापमापी का प्रकार | मापन सीमा / विशेषता | मुख्य बिंदु |
|---|---|---|
| पारा द्रव तापमापी | 30^\circ\text{C} से 350^\circ\text{C} | पारा -39^\circ\text{C} पर जम जाता है, इसलिए इससे नीचे का ताप इससे नहीं मापा जा सकता। |
| अल्कोहल तापमापी | -39^\circ\text{C} से नीचे का ताप | अल्कोहल का हिमांक बहुत कम -115^\circ\text{C} होता है, इसलिए यह अत्यंत ठंडे ताप को मापने में प्रयुक्त होता है। |
| गैस तापमापी | स्थिर आयतन पर आधारित | हाइड्रोजन गैस का प्रयोग करने पर 500^\circ\text{C} तक तथा इसके स्थान पर नाइट्रोजन गैस लेने पर 1500^\circ\text{C} तक मापन संभव है। |
| प्लेटिनम प्रतिरोध तापमापी | -200^\circ\text{C} से 1200^\circ\text{C} | धातु के प्रतिरोध परिवर्तन के सिद्धांत पर आधारित। |
| तापयुग्म तापमापी (Thermocouple) | -200^\circ\text{C} से 1600^\circ\text{C} | सीबेक प्रभाव पर आधारित विस्तृत रेंज तापमापी। |
| पूर्ण विकिरण उत्तापमापी (Pyrometer) | केवल 800^\circ\text{C} से ऊँचे ताप के लिए | यह दूर स्थित वस्तुओं (जैसे सूर्य) का ताप मापने हेतु प्रयुक्त होता है। यह स्टीफेन के नियम પર आधारित है। 800^\circ\text{C} से कम पर वस्तुएं ऊष्मीय विकिरण उत्सर्जित नहीं करतीं। |
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3. विशिष्ट ऊष्मा एवं ऊष्मीय प्रसार
विशिष्ट ऊष्मा (Specific Heat – C): किसी पदार्थ के एकांक द्रव्यमान में एकांक ताप वृद्धि करने के लिए आवश्यक ऊष्मा की मात्रा को उस पदार्थ की विशिष्ट ऊष्मा कहते हैं। इसका S.I. मात्रक \text{J kg}-1 \text{K}-1 होता है।
जल की विशिष्ट ऊष्मा धारिता 1 कैलोरी/ग्राम ^\circ\text{C} (4200 \text{ J/kg K}) होती है, जो अन्य पदार्थों की तुलना में सबसे अधिक है।
कुछ प्रमुख पदार्थों की विशिष्ट ऊष्मा धारिता (\text{J/kg K} में):
- जल: 4200
- बर्फ / केरोसीन तेल: 2100
- लोहा: 4600
- पारा: 140
- लेड (सीसा): 130
ऊष्मीय प्रसार (Thermal Expansion)
किसी वस्तु को गर्म करने पर उसकी लम्बाई, क्षेत्रफल एवं आयतन में होने वाली वृद्धि को ऊष्मीय प्रसार कहते हैं। इन्हें तीन गुणांकों द्वारा व्यक्त किया जाता है:
- रेखीय प्रसार गुणांक (\alpha): लम्बाई में वृद्धि की माप।
- क्षेत्रीय प्रसार गुणांक (\beta): क्षेत्रफल में वृद्धि की माप (\beta = 2\alpha)।
- आयतन प्रसार गुणांक (\gamma): आयतन में वृद्धि की माप (\gamma = 3\alpha)।
α : β : γ = 1 : 2 : 3
प्रायः सभी द्रवों को गर्म करने पर उनका आयतन बढ़ता है, परन्तु जल के साथ ऐसा नहीं होता। जल को 0^\circ\text{C} से 4^\circ\text{C} तक गर्म करने पर उसका आयतन घटता है तथा 4^\circ\text{C} के बाद गर्म करने पर आयतन बढ़ना शुरू होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि 4^\circ\text{C} पर जल का घनत्व (Density) अधिकतम होता है।
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4. ऊष्मा संचरण की विधियाँ एवं नियम
ऊष्मा का एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने की प्रक्रिया को ऊष्मा का संचरण कहते हैं। इसकी तीन विधियाँ हैं:
- चालन (Conduction): इसमें ऊष्मा पदार्थ के कणों के वास्तविक स्थान परिवर्तन के बिना, एक कण से दूसरे कण में स्थानांतरित होती है। ठोस पदार्थों में ऊष्मा का संचरण इसी विधि द्वारा होता है।
- Sंवहन (Convection): इसमें ऊष्मा का संचरण पदार्थ के कणों के स्वयं के स्थानान्तरण (गति) के द्वारा होता है, जिससे संवहन धाराएँ बनती हैं। गैसों एवं द्रवों में ऊष्मा का संचरण संवहन द्वारा होता है। हमारा वायुमंडल भी इसी विधि से गर्म होता है।
- विकिरण (Radiation): इस विधि में ऊष्मा, गर्म वस्तु से ठंडी वस्तु की ओर बिना किसी माध्यम की सहायता के तथा माध्यम को बिना गर्म किए, प्रकाश की चाल से सीधी रेखा में संचरित होती है।
ऊष्मा संचरण के प्रमुख नियम:
- न्यूटन का शीतलन नियम (Newton’s Law of Cooling): किसी वस्तु के ठंडे होने की दर, वस्तु तथा उसके चारों ओर के माध्यम के तापान्तर के अनुक्रमानुपाती होती है। अतः वस्तु जैसे-जैसे ठंडी होती जाएगी, उसके ठंडे होने की गति धीमी होती जाएगी।
- किरचौफ का नियम (Kirchhoff’s Law): इसके अनुसार, अच्छे अवशोषक ही अच्छे उत्सर्जक होते हैं। यदि एक अंधेरे कमरे में काली और सफेद वस्तु को समान ताप पर गर्म करके रखा जाए, तो काली वस्तु अधिक विकिरण उत्सर्जित करेगी और अधिक चमकेगी।
- स्टीफेन का नियम (Stefan’s Law): किसी वस्तु की उत्सर्जन क्षमता (E) उसके परम ताप (T) के चतुर्थ घात के अनुक्रमानुपाती होती है।
E ∝ T4 या E = σT4 (जहाँ σ स्टीफेन नियतांक है)
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5. अवस्था परिवर्तन तथा गुप्त ऊष्मा (Latent Heat)
निश्चित ताप पर पदार्थ का एक भौतिक अवस्था से दूसरी अवस्था में बदलना अवस्था परिवर्तन कहलाता है। इस प्रक्रिया में पदार्थ का तापमान स्थिर रहता है।
- त्रिक बिन्दु (Triple Point): वह विशिष्ट बिन्दु (ताप व दाब) जिस पर पदार्थ की तीनों अवस्थाएँ (ठोस, द्रव, गैस) एक साथ सह-अस्तित्व में पाई जाती हैं।
- गलनांक एवं हिमांक: निश्चित ताप पर ठोस का द्रव में बदलना गलन और द्रव का ठोस में बदलना हिमीकरण कहलाता है। सामान्यतः गलनांक और हिमांक बराबर होते हैं।
- बर्फ जैसे पदार्थ जो ठोस से द्रव में बदलने पर सिकुड़ते हैं, उनका गलनांक दाब बढ़ाने पर घटता है। जो पदार्थ पिघलने पर फैलते हैं, उनका गलनांक दाब बढ़ाने पर बढ़ता है।
- अशुद्धि (जैसे बर्फ में नमक) मिलाने से गलनांक घटता है।
- क्वथनांक एवं संघनन: निश्चित ताप पर द्रव का वाष्प में बदलना वाष्पन (क्वथनांक) और वाष्प का द्रव में बदलना संघनन कहलाता है। दाब बढ़ाने पर तथा अशुद्धि मिलाने पर द्रव का क्वथनांक बढ़ जाता है।
गुप्त ऊष्मा (Latent Heat)
नियत ताप पर पदार्थ की अवस्था बदलने के लिए आवश्यक ऊष्मा की मात्रा को गुप्त ऊष्मा कहते हैं। यदि पदार्थ का द्रव्यमान m और गुप्त ऊष्मा L हो, तो आवश्यक ऊष्मा:
(इसका SI मात्रक जूल / किग्रा है)
- गलन की गुप्त ऊष्मा (Latent Heat of Fusion): बर्फ के लिए इसका मान 80 कैलोरी/ग्राम होता है।
- वाष्पन की गुप्त ऊष्मा (Latent Heat of Vaporisation): जल के लिए इसका मान 540 कैलोरी/ग्राम होता है।
हिम मिश्रण (Freezing Mixture) और वाष्पीकरण के अनुप्रयोग:
- हिम मिश्रण: 0^\circ\text{C} पर पिघलती बर्फ में नमक या शोरा मिलाने से उसका गलनांक घटकर -22^\circ\text{C} तक कम हो जाता है। इसका उपयोग कुल्फी या आइसक्रीम बनाने में किया जाता है।
- वाष्पीकरण (Evaporation): द्रव की खुली सतह से प्रत्येक ताप पर धीरे-धीरे द्रव का वाष्प में बदलना। प्रशीतक (Refrigerator) में ताँबे की वाष्प कुण्डली में भरा द्रव फ्रीऑन तेजी से वाष्पीकृत होकर ही अंदर ठंडक (Cooling) उत्पन्न करता है।
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6. आपेक्षिक आर्द्रता एवं वातनुकूलन
- आपेक्षित आर्द्रता (Relative Humidity): किसी निश्चित ताप पर वायु के आयतन में उपस्थित जलवाष्प की वास्तविक मात्रा तथा उसी ताप पर उस वायु को पूर्णतः संतृप्त करने के लिए आवश्यक जलवाष्प की मात्रा का अनुपात। इसे प्रतिशत (%) में व्यक्त किया जाता है।
- आपेक्षित आर्द्रता मापने के लिए हाइग्रोमीटर (Hygrometer) नामक यंत्र का प्रयोग किया जाता है।
- तापमान बढ़ने पर आपेक्षिक आर्द्रता बढ़ जाती है।
वातानुकूलन (Air Conditioning) की आदर्श स्थितियाँ:
मानव स्वास्थ्य और आरामदायक जलवायु के लिए कार्यालयों या घरों में निम्नलिखित तीन परिस्थितियाँ होनी अनिवार्य हैं:
| कारक (Factor) | आदर्श मानक सीमा (Ideal Range) |
|---|---|
| तापमान (Temperature) | 23^\circ\text{C} से 25^\circ\text{C} |
| आपेक्षिक आर्द्रता (Relative Humidity) | 60\% से 65\% के बीच |
| वायु की गति (Air Velocity) | 0.75 \text{ मी/मिनट} से 2.5 \text{ मी/मिनट} तक |
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7. ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) के नियम
क) ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम (First Law)
यह नियम मुख्यतः ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत (Law of Conservation of Energy) को प्रदर्शित करता है। इसके अनुसार, जब किसी निकाय (System) को बाहर से ऊष्मा दी जाती है, तो वह दो कार्यों में खर्च होती है:
- निकाय की आंतरिक ऊर्जा (Internal Energy) में वृद्धि करने में (जिससे निकाय का तापमान बढ़ता है)।
- बाह्य वातावरण पर कार्य (External Work) करने में।
प्रक्रमों के प्रकार:
- समतापी प्रक्रम (Isothermal Process): जब निकाय में परिवर्तन इस प्रकार हो कि पूरी क्रिया के दौरान निकाय का ताप हमेशा स्थिर रहे।
- रुद्धोष्म प्रक्रम (Adiabatic Process): जब निकाय में परिवर्तन इस प्रकार हो कि निकाय और बाहरी माध्यम के बीच ऊष्मा का कोई आदान-प्रदान न हो।
उदाहरण: कार्बन डाइऑक्साइड (\text{CO}2) का अचानक तेजी से प्रसार होने पर उसका शुष्क बर्फ (Dry Ice) में बदल जाना रुद्धोष्म परिवर्तन का उदाहरण है।
ख) ऊष्मागतिकी का द्वितीय नियम (Second Law)
प्रथम नियम केवल ऊर्जा संतुलन बताता है, परन्तु यह ऊष्मा के प्रवाह की दिशा तय नहीं करता। द्वितीय नियम मुख्य रूप से ऊष्मा प्रवाहित होने की दिशा को व्यक्त करता है, जिसे दो प्रमुख कथनों द्वारा समझा जाता है:
- केल्विन का कथन: “ऐसी किसी भी मशीन का निर्माण असंभव है जो ऊष्मा को पूर्णतया (100%) कार्य में परिवर्तित कर दे।”
- क्लासियस का कथन: “ऊष्मा बिना किसी बाहरी सहायता के अपने कम ताप वाली (ठंडी) वस्तु से अधिक ताप वाली (गर्म) वस्तु की ओर स्वतः प्रवाहित नहीं हो सकती।”