सरल आवर्त गति (Simple Harmonic Motion)

आवर्त गति, दोलन गति, सरल आवर्त गति के नियम एवं सरल लोलक के व्यावहारिक अनुप्रयोग

1. गति के मूलभूत प्रकार (Basic Types of Motion)

  • आवर्त गति (Periodic Motion): जब कोई वस्तु एक निश्चित पथ पर गति करते हुए एक निश्चित समय-अन्तराल के पश्चात् बार-बार अपनी पूर्व गति को दोहराती है, तो इस प्रकार की गति को आवर्त गति कहते हैं।
  • दोलन या काम्पनिक गति (Oscillatory or Vibratory Motion): जब कोई पिंड अपनी साम्यस्थिति (Mean Position) के इधर-उधर (आगे-पीछे या ऊपर-नीचे) गति करता है, तो उसे दोलन या कम्पन गति कहते हैं।
  • एक दोलन या एक कम्पन: दोलन करने वाले कण का अपनी साम्य स्थिति से एक ओर जाना, फिर साम्य स्थिति में लौटकर दूसरी ओर जाना और पुनः साम्य स्थिति में वापस आना, ‘एक दोलन’ कहलाता है।

आवर्तकाल एवं आवृत्ति में संबंध

  • आवर्तकाल (Time Period – T): एक पूरा दोलन समाप्त करने में लगे समय को आवर्तकाल कहते हैं।
  • आवृत्ति (Frequency – n): कम्पन करने वाली वस्तु एक सेकेण्ड में जितने दोलन पूरे करती है, उसे उसकी आवृत्ति कहते हैं। इसका S.I. मात्रक हर्ट्ज (Hertz – Hz) होता है।
यदि आवृत्ति n तथा आवर्तकाल T हो, तो उनमें संबंध निम्नलिखित होता है:

n = 1 / T

2. सरल आवर्त गति (Simple Harmonic Motion – SHM)

यदि कोई वस्तु एक सरल रेखा पर अपनी मध्यमान स्थिति (Mean Position) के इधर-उधर इस प्रकार गति करे कि वस्तु का त्वरण (Acceleration), मध्यमान स्थिति से वस्तु के विस्थापन (Displacement) के अनुक्रमानुपाती (Directly Proportional) हो तथा त्वरण की दिशा हमेशा मध्यमान स्थिति की ओर हो, तो उसकी गति को सरल आवर्त गति कहते हैं।

कण की दो विशिष्ट स्थितियों में भौतिक परिवर्तन:

सरल आवर्त गति करने वाले कण के व्यवहार को समझने के लिए मध्यमान स्थिति और अंत बिंदुओं (Extreme Positions) की तुलना नीचे दी गई तालिका में की गई है:

भौतिक राशि / कारक मध्यमान स्थिति (Mean Position) पर अंत बिंदुओं (Extreme Positions) पर
वेग (Velocity) अधिकतम (Maximum) शून्य (Zero)
गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) अधिकतम (Maximum) शून्य (Zero)
त्वरण (Acceleration) शून्य (Zero) अधिकतम (Maximum)
प्रत्यानयन बल (Restoring Force) शून्य (कोई बल कार्य नहीं करता) अधिकतम (Maximum)
स्थितिज ऊर्जा (Potential Energy) शून्य (Zero) अधिकतम (Maximum)

3. सरल लोलक (Simple Pendulum)

यदि एक भारहीन तथा लम्बाई में न बढ़ने वाली डोरी के निचले सिरे से पदार्थ के किसी गोल परन्तु भारी कण (Bob) को लटकाकर, ऊपरी सिरे को किसी दृढ़ आधार से बांध दें, तो इस समायोजन को सरल लोलक कहते हैं। लोलक को साम्य स्थिति से थोड़ा विस्थापित करके छोड़ देने पर वह सरल आवर्त गति करने लगता है।

यदि डोरी की प्रभावी लम्बाई l एवं गुरुत्वीय त्वरण g हो, तो सरल लोलक का आवर्तकाल (T) निम्नलिखित सूत्र से ज्ञात किया जाता है:

T = 2π √(l / g)

सूत्र से निकलने वाले मुख्य निष्कर्ष एवं व्यावहारिक उदाहरण:

  1. लम्बाई का प्रभाव (T \propto \sqrt{l}): आवर्तकाल, प्रभावी लम्बाई के वर्गमूल के अनुक्रमानुपाती होता है। अर्थात् लम्बाई बढ़ने पर आवर्तकाल बढ़ जाएगा।
    व्यावहारिक उदाहरण (झूला झूलती लड़की): यदि कोई लड़की झूला झूलते-झूलते खड़ी हो जाए, तो उसका गुरुत्व केंद्र (Centre of Gravity) ऊपर उठ जाता है। इससे झूले की प्रभावी लम्बाई (l) घट जाती है, जिसके कारण झूले का आवर्तकाल (T) भी घट जाता है और झूला जल्दी-जल्दी दोलन करने लगता है।
  2. द्रव्यमान का प्रभाव: आवर्तकाल लोलक के द्रव्यमान (m) पर निर्भर नहीं करता है।
    व्यावहारिक उदाहरण: यदि झूलने वाली लड़की की बगल में कोई दूसरी लड़की आकर बैठ जाए, तो कुल द्रव्यमान बदलने के बावजूद झूले के आवर्तकाल (T) पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
  3. गुरुत्वीय त्वरण का प्रभाव (T \propto \frac{1}{\sqrt{g}}): आवर्तकाल, गुरुत्वीय त्वरण के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
    • पृथ्वी तल से ऊपर या नीचे जाने पर: चूँकि पृथ्वी की सतह से ऊपर या नीचे जाने पर g का मान कम होता है, इसलिए लोलक घड़ी का आवर्तकाल (T) बढ़ जाता है। आवर्तकाल बढ़ने का अर्थ है कि घड़ी सुस्त (Slow) हो जाती है
    • चन्द्रमा पर ले जाने पर: चन्द्रमा पर गुरुत्वीय त्वरण (g) का मान पृथ्वी के मान का केवल 1/6 गुना है। अतः वहाँ g घटने से आवर्तकाल बढ़ जाता है और घड़ी सुस्त हो जाती है।
    • कृत्रिम उपग्रह (Satellite) पर ले जाने पर: उपग्रह के अंदर भारहीनता के कारण गुरुत्वीय त्वरण g = 0 होता है। इस स्थिति में सूत्र के अनुसार घड़ी का आवर्तकाल (T) अनन्त (∞) हो जाएगा। यही कारण है कि उपग्रह में लोलक घड़ी काम नहीं करती है
  4. मौसम का प्रभाव (गर्मियों और सर्दियों में):
    • गर्मियों में: तापमान बढ़ने के कारण लोलक की प्रभावी लम्बाई (l) बढ़ जाती है, जिससे उसका आवर्तकाल (T) भी बढ़ जाता है। परिणामतः लोलक घड़ी सुस्त हो जाती है
    • सर्दियों में: ठंड के कारण लोलक की लम्बाई (l) सिकुड़ कर कम हो जाती है, जिससे आवर्तकाल (T) भी कम हो जाता है। परिणामतः लोलक घड़ी तेज (Fast) चलने लगती है

 

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