परमाणु भौतिकी एवं इलेक्ट्रॉनिक्स (Atomic Physics)
1. परमाणु (Atom) और इसकी संरचना
परिभाषा: परमाणु वे सूक्ष्मतम कण हैं, जो रासायनिक क्रिया में भाग ले सकते हैं, परन्तु स्वतंत्र अवस्था में नहीं रह सकते।
- परमाणु मुख्यतः तीन मूल कणों—इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन व न्यूट्रॉन से मिलकर बना होता है।
- परमाणु के केन्द्र में एक नाभिक (Nucleus) होता है, जिसमें प्रोटॉन एवं न्यूट्रॉन (जिन्हें संयुक्त रूप से न्यूक्लियॉन कहते हैं) रहते हैं। इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर निश्चित कक्षाओं में चक्कर लगाते हैं।
- परमाणु में प्रोटॉन (धनावेश) एवं इलेक्ट्रॉन (ऋणावेश) की संख्या समान एवं आवेश विपरीत होते हैं, जिसके कारण परमाणु विद्युत रूप से उदासीन (Neutral) होता है।
[Image of atom structure with nucleus and electrons]
क) मुख्य मूल कणों की विशेषताएँ
| कण | द्रव्यमान (किग्रा०) | आवेश (कूलॉम) | खोजकर्ता |
|---|---|---|---|
| प्रोटॉन (Proton) | 1.672 × 10-27 | +1.6 × 10-19 | गोल्डस्टीन |
| न्यूट्रॉन (Neutron) | 1.675 × 10-27 | 0 (उदासीन) | चैडविक |
| इलेक्ट्रॉन (Electron) | 9.108 × 10-31 | -1.6 × 10-19 | जे० जे० थॉमसन |
ख) अन्य प्रमुख मूल कण (संख्या 30 से ऊपर)
| कण | द्रव्यमान (किग्रा०) | आवेश (कूलॉम) | खोजकर्ता | विशेष विवरण |
|---|---|---|---|---|
| पॉजिट्रॉन (Positron) | 9.108 × 10-31 | +1.6 × 10-19 | एण्डरसन | यह इलेक्ट्रॉन का एंटिकण (Antiparticle) है। |
| न्यूट्रिनो (Neutrino) | 0 | 0 | पाऊली | द्रव्यमान व आवेश रहित मूल कण। |
| पाई-मैसॉन (π-Meson) | इलेक्ट्रॉन का 274 गुना | धनात्मक एवं ऋणात्मक दोनों | युकावा | अस्थायी कण, जीवन काल लगभग 10-8 सेकंड। |
| फोटॉन (Photon) | 0 (विराम द्रव्यमान) | 0 | आइन्स्टीन | इसका वेग प्रकाश के वेग के बराबर होता है। ऊर्जा का बंडल। |
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2. विसर्जन नलिका की किरणें (Discharge Tube Rays)
क) कैथोड किरणें (Cathode Rays)
जब विसर्जन नलिका (Discharge Tube) के सिरों पर 20 किलो वोल्ट (20kV) का विभवान्तर लगाया जाता है और उसके भीतर का दाब 0.1 मिमी पारे के स्तम्भ के बराबर होता है, तो कैथोड से एक तीव्र इलेक्ट्रॉन पुँज निकलने लगता है। इसे ही कैथोड किरण कहते हैं।
कैथोड किरणों के प्रमुख गुण:
- ये किरणें अदृश्य होती हैं और सीधी रेखाओं में चलती हैं।
- ये ऋणात्मक होती हैं, इसलिए कैथोड से एनोड की तरफ गमन करती हैं और अपनी सतह के लंबवत् निकलती हैं।
- कैथोड किरण का वेग प्रकाश के वेग का 1/10 गुना होता है।
- यह किरण विद्युत् एवं चुम्बकीय क्षेत्र में विक्षेपित होती है।
- ये गैसों को आयनीकृत कर देती हैं एवं धातुओं पर ऊष्मीय प्रभाव दिखलाती हैं।
- इनकी वेधन क्षमता कम होती है, फिर भी ये पतली धातु की चादर को पार कर जाती हैं।
- जब ये किरणें विद्युतीय क्षेत्र से होकर लम्बवत गुजरती हैं, तो इनका मार्ग परवलयाकार (Parabolic) होता है।
- इन्हें केवल गैस का प्रयोग करके पैदा किया जा सकता है। इनके उत्पादन में प्रेरण कुंडली (Induction Coil) का प्रयोग होता है जो अन्योन्य प्रेरण (Mutual Induction) के सिद्धांत पर कार्य करती है।
ख) धनात्मक किरणें (Positive or Canal Rays)
- यदि विसर्जन नलिका में छिद्रयुक्त (Perforated) कैथोड का प्रयोग किया जाए, तो एनोड की ओर से कुछ किरणें निकलती हैं जो कैथोड के छिद्रों को पार कर दूसरी ओर निकल जाती हैं। ये एनोड से निकलने वाली धनावेशित किरणें हैं।
- इनका पता सर्वप्रथम वर्ष 1886 में गोल्डस्टीन ने लगाया था।
- गुण: ये किरणें धनावेशित होती हैं, प्रतिदीप्ति (Fluorescence) तथा स्फुरदीप्ति (Phosphorescence) उत्पन्न करती हैं, और विद्युत् व चुम्बकीय क्षेत्र में विक्षेपित हो जाती हैं।
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3. निर्वात वाल्व तकनीक (Vacuum Valves)
क) डायोड वाल्व (Diode Valve)
- निर्माण: वैज्ञानिक फ्लेमिंग द्वारा सन् 1904 ई० में निर्मित।
- संरचना: यह एक निर्वात नलिका है जिसमें केवल दो इलेक्ट्रोड—तन्तु (Filament) एवं प्लेट (Plate) होते हैं। तन्तु टंगस्टन का पतला तार होता है जिस पर बेरियम ऑक्साइड का लेप होता है। बैटरी से गर्म करने पर इससे इलेक्ट्रॉन निकलते हैं जो धनावेशित प्लेट की ओर चलते हैं, जिससे प्लेट धारा बहने लगती है।
- यह धारा ओम के नियम का पालन न करके चाइल्ड-लैंगम्यूर नियम का पालन करती है।
- उपयोग: डायोड वाल्व का उपयोग ऋजुकारी (Rectifier) के रूप में होता है, अर्थात् यह प्रत्यावर्ती धारा (A.C.) को दिष्ट धारा (D.C.) में बदलता है।
ख) ट्रायोड वाल्व (Triode Valve)
- निर्माण: वर्ष 1907 ई० में अमेरिका के ली डी फॉरेस्ट ने किया था।
- संरचना: यह तीन इलेक्ट्रोड वाली निर्वात नलिका है, जिसमें प्लेट, ग्रिड व तन्तु होते हैं।
- उपयोग: ट्रायोड वाल्व का उपयोग प्रवर्धक (Amplifier), दोलित्र (Oscillator), प्रेषी (Transmitter) एवं संसूचक (Detector) की तरह किया जाता है।
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4. अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिक्स (Semiconductors)
परिभाषा: ऐसे पदार्थ जिनकी विद्युत चालकता सामान्य ताप पर चालकों (Conductors) से कम परंतु विद्युत रोधियों (Insulators) से अधिक होती है, अर्द्धचालक कहलाते हैं। इनमें ऊष्मीय प्रभाव के कारण कहीं इलेक्ट्रॉन मुक्त हो जाता है और कहीं रिक्त स्थान या कोटर (Hole) बन जाता है। मुख्य उदाहरण: जर्मेनियम (Ge) और सिलिकॉन (Si)।
अर्द्धचालकों के प्रकार:
- निज अर्द्धचालक (Intrinsic Semiconductor): अत्यंत शुद्ध रूप वाले अर्द्धचालक जिनमें मुक्त इलेक्ट्रॉन तथा कोटर केवल ऊष्मीय प्रभाव द्वारा उत्पन्न होते हैं।
- बाह्य अर्द्धचालक (Extrinsic Semiconductor): शुद्ध अर्द्धचालक में बाहरी अपद्रव्य (Aimpurity) मिलाने से प्राप्त ठोस को बाह्य अर्द्धचालक कहते हैं। अपद्रव्य मिलाने की इस प्रक्रिया को डोपिंग (Doping) कहते हैं, इससे चालकता काफी बढ़ जाती है।
बाह्य अर्द्धचालक के उप-प्रकार:
- N-प्रकार के अर्द्धचालक (N-Type): जब शुद्ध अर्द्धचालक में पंच-संयोजी (Pentavalent) अपद्रव्य जैसे आर्सेनिक (As) मिलाया जाता है, तो मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या बढ़ जाती है। इसमें विद्युत प्रवाह इलेक्ट्रॉनों द्वारा होता है। पंच-संयोजी अपद्रव्य को दाता (Donor) कहा जाता है।
- P-प्रकार के अर्द्धचालक (P-Type): जब शुद्ध अर्द्धचालक में त्रि-संयोजी (Trivalent) अपद्रव्य जैसे एल्यूमीनियम (Al) मिलाया जाता है, तो कोटरों (Holes) का निर्माण होता है। इसमें विद्युत प्रवाह कोटरों की गति के कारण होता है। त्रि-संयोजी अपद्रव्य को ग्राही (Acceptor) कहा जाता है।
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5. अतिचालकता (Superconductivity)
- खोज: वर्ष 1911 ई० में केमरलिथ ओन्स ने की थी।
- सिद्धांत: अत्यंत निम्न ताप पर कुछ पदार्थों का विद्युत प्रतिरोध घटकर पूर्णतः शून्य (Zero) हो जाता है। इस अवस्था को अतिचालक और इस गुण को अतिचालकता कहते हैं।
- उदाहरण: 4.2 K (अर्थात -268.8°C) ताप पर पारा (Mercury) अतिचालक बन जाता है। ‘नियोबियम-टीन’ काफी ऊँचे ताप (100 K) पर भी अतिचालकता प्राप्त कर लेती है।
- विशेषता: अतिचालक पूर्णतः प्रति-चुम्बकीय (Diamagnetic) होता है। यह एक आदर्श चुम्बकीय कवच की तरह कार्य करता है, जिसे कोई चुम्बकीय बल रेखा भेदकर पार नहीं कर सकती (माइसनर प्रभाव)।
- सरकारी प्रयास: अतिचालकता के महत्व को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 1991 में ‘राष्ट्रीय अतिचालकता विज्ञान एवं तकनीकी बोर्ड’ की स्थापना की थी।