भारतीय संविधान: आपातकालीन प्रावधान
संविधान में मुख्य रूप से तीन प्रकार के आपातकाल की व्यवस्था है:
1. राष्ट्रीय आपात (अनुच्छेद 352)
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आधार: युद्ध, बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह।
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घोषणा प्रक्रिया: राष्ट्रपति द्वारा मंत्रिमंडल की लिखित सिफारिश पर। इसे न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।
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अवधि:
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संसद के अनुमोदन के बिना: 1 माह।
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संसद के दो-तिहाई विशेष बहुमत से अनुमोदन के बाद: 6 माह (इसे पुनः 6-6 माह के लिए बढ़ाया जा सकता है)।
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यदि लोकसभा विघटित हो, तो प्रथम बैठक के 30 दिनों के भीतर अनुमोदन आवश्यक है।
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विशेष सत्र: यदि लोकसभा की कुल सदस्य संख्या का 1/10 भाग अध्यक्ष या राष्ट्रपति को लिखित सूचना दे, तो 14 दिनों के भीतर विशेष अधिवेशन आहूत किया जा सकता है।
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प्रभाव:
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राज्य की कार्यपालिका संघीय नियंत्रण में आ जाती है।
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संसद की विधायी शक्ति राज्य सूची के विषयों तक विस्तृत हो जाती है।
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अनुच्छेद 19 की स्वतंत्रताएं स्थगित हो जाती हैं।
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राष्ट्रपति अनुच्छेद 20-21 के क्रियान्वयन हेतु न्यायालय की शरण लेने के अधिकार को स्थगित कर सकते हैं।
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ऐतिहासिक संदर्भ:
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1962 (चीनी आक्रमण): पहली बार।
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1971 (पाकिस्तान युद्ध): दूसरी बार।
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1975 (आंतरिक गड़बड़ी): तीसरी बार। (1971 और 1975 की उद्घोषणाएं 1977 में वापस ली गईं)।
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2. राज्य में राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356)
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आधार: राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता या संघ के कार्यकारी निर्देशों का पालन करने में असमर्थता।
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प्रशासन: राष्ट्रपति शासन के दौरान संघ राज्य का प्रशासन (न्यायिक कार्यों को छोड़कर) अपने हाथ में ले लेता है।
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अवधि:
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संसद के बिना: 2 माह।
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संसद के अनुमोदन के बाद: 6 माह। अधिकतम सीमा 3 वर्ष है, इसके बाद संवैधानिक संशोधन आवश्यक है।
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प्रमुख तथ्य: इसका सर्वप्रथम प्रयोग 1951 में पंजाब में हुआ था। पंजाब में ही इसका प्रयोग सर्वाधिक लंबी अवधि (1987-1992) तक हुआ।
3. वित्तीय आपात (अनुच्छेद 360)
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आधार: भारत की वित्तीय स्थिरता या साख को खतरा।
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घोषणा प्रक्रिया: राष्ट्रपति द्वारा। इसे दो माह के भीतर संसद के दोनों सदनों से स्वीकृति प्राप्त करना अनिवार्य है।
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लोकसभा विघटन की स्थिति: राज्यसभा की स्वीकृति के बाद, नवनिर्वाचित लोकसभा की पहली बैठक से 30 दिनों के भीतर इसे स्वीकृति मिलना आवश्यक है।
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प्रभाव:
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न्यायाधीशों एवं केंद्र/राज्य के अधिकारियों के वेतन में कमी की जा सकती है।
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राज्य सरकारों को वित्तीय निर्देश दिए जा सकते हैं।
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राज्य के धन विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए आरक्षित किए जा सकते हैं।
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केंद्र और राज्यों के बीच धन वितरण संबंधी प्रावधानों में संशोधन किया जा सकता है।
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