गुलाम वंश (1206 ई0 से 1290 ई0)

 

कुतुबुद्दीन ऐबक (गुलाम वंश)

गुलाम वंश की स्थापना 1206 ई० में कुतुबुद्दीन ऐबक ने किया था। वह गौरी का गुलाम था। कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपना राज्याभिषेक 24 जून, 1206 ई० को किया था। कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपनी राजधानी लाहौर में बनायी थी । कुतुबमीनार की नींव कुतबुद्दीन ऐबक ने डाली थी । दिल्ली का कुवत-उल-इस्लाम मस्जिद एवं अजमेर का ढाई दिन का झोपड़ा नामक मस्जिद का निर्माण ऐबक ने करवाया था । कुतुबुद्दीन ऐबक को लाख बख्श (लाखों का दान देनेवाला) भी कहा जाता था। प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय को ध्वस्त करने वाला ऐबक का सहायक सेनानायक बख्तियार खिलजी था ।ऐबक की मृत्यु 1210 ई० में चौगान खेलते समय घोड़े से गिरकर हो गयी। इसे लाहौर में दफनाया गया। ऐबक का उत्तराधिकारी आरामशाह हुआ जिसने सिर्फ आठ महीनों तक शासन किया। आरामशाह की हत्या करके इल्तुतमिश 1211 ई० में दिल्ली की गद्दी पर बैठा । इल्तुतमिश तुर्किस्तान का इल्बरी तुर्क था, जो ऐबक का गुलाम एवं दामाद था। ऐबक की वह बदायूँ का गवर्नर था। मृत्यु के समय इल्तुतमिश लाहौर से राजधानी को स्थानान्तरित करके दिल्ली लाया। इल्तुतमिश पहला शासक था, जिसने 1229 ई० में बगदाद के खलीफा से सुल्तान पद की वैधानिक स्वीकृति प्राप्त की।  इल्तुतमिश की मृत्यु अप्रैल, 1236 ई० में हो गयी। इल्तुतमिश द्वारा किए गए महत्त्वपूर्ण कार्य निम्न हैं-

  • कुतुबमीनार के निर्माण को पूर्ण करवाया।
  • सबसे पहले शुद्ध अरबी सिक्के जारी किए। (चाँदी का टंका एवं ताँबा का जीतल)
  • इक्ता प्रणाली चलाई।
  • चालीस गुलाम सरदारों का संगठन बनाया, जो तुर्कान-ए-चिहलगानी के नाम से जाना गया ।
  • सर्वप्रथम दिल्ली के अमीरों का दमन किया ।

 

रुकनुद्दीन फिरोज (गुलाम वंश)

इल्तुतमिश के बाद उसका पुत्र रुकनुद्दीन फिरोज गद्दी पर बैठा, वह एक अयोग्य शासक था। इसके अल्पकालीन शासन पर उसकी माँ शाह तुरकान छाई रही। शाह तुरकान के अवांछित प्रभाव से परेशान होकर तुर्की अमीरों ने रुकनुद्दीन को हटाकर रज़िया को सिंहासन पर आसीन किया। इस प्रकार रजिया बेगम प्रथम मुस्लिम महिला थी. जिसने शासन की बागडोर संभाली।

 

रजिया बेगम (गुलाम वंश)

रजिया ने पर्दाप्रथा का त्यागकर तथा पुरुषों की तरह चोगा (काया) एवं कुलाह (टोपी) पहनकर राजदरबार में खुले मुँह से जाने लगी। रजिया ने मलिक जमालुद्दीन याकूत को अमीर-ए-अखूर (घोड़े का सरदार) नियुक्त किया। गैर तुकों को सामंत बनाने के रजिया बेगम के प्रयासों से तुर्की के अमीर विरुद्ध हो गए और उसे बंदी बनाकर दिल्ली की गद्दी पर मुईजुद्दीन बहरामशाह को बैठा दिया। रजिया बेगम की शादी अल्तुनिया के साथ हुई। रजिया की हत्या 13 अक्टूबर, 1240 ई० को डाकुओं के द्वारा कैथल के पास कर दी गई ।

 

बहराम शाह (गुलाम वंश)

बहराम शाह को बंदी बनाकर उसकी हत्या मई 1242 ई० में कर दी गई।

 

अलाउद्दीन मसूद (गुलाम वंश)

बहराम शाह के बाद दिल्ली का सुल्तान अलाउद्दीन मसूद शाह 1242 ई0 में बना। बलबन ने षड्यंत्र के द्वारा 1246 ई० में अलाउद्दीन मसूद शाह को सुल्तान के पद से हटा दिया और नासिरुद्दीन महमूद का सुल्तान बनाया।

 

नासिरुद्दीन महमूद (गुलाम वंश)

नासिरुद्दीन महमूद टोपी सीकर अपनी आजीविका कमाता था। बलबन ने नासिरुद्दीन महमूद के साथ अपनी का विवाह किया था।

 

बलबन (गुलाम वंश)

इसका वास्तविका नाम बहाउद्दीन था। वह इल्तुतमिश का गुलाम था। बलबन ने तुर्कान-ए-चिहलगानी का विनाश किया था। 1266 ई0 में बलबन गियासुद्दीन बलबन के नाम से दिल्ली का शासक बना। इसके दरबार में सिजदा और पैबोस प्रथाओं की शुरुआत हुई। नवरोज उत्सव भी इसी ने शुरू किया। अपनी विरोधियों को दबाने के लिए इसने ‘लौह एवं रक्त’ नीति का पालन किया। इसे उलूंग खाँ की उपाधि इसके दामाद नासिरुद्दीन महमूद ने दी। इसके दरबार में फारसी के कवि अमीर खुसरो और अमीर हसन थे।

 

शम्मुद्दीन कैमुर्स (गुलाम वंश)

शम्मुद्दीन कैमुर्स गुलाम वंश का अंतिम शासक था।

 

खिलजी वंश (1290 ई0 से 1320 ई0)

 

जलालुद्दीन फिरोज खिलजी (खिलजी वंश)

जलालुद्दीन फिरोज खिलजी ने 13 जून 1290 ई0 को खिलजी वंश की स्थापना की। इसकी राजधानी किलोखेरी थी। 1296 ई0 इसकी हत्या इसके भतीजे व दामाद अलाउद्दीन खिलजी ने कड़ामानिकपुर (इलाहाबाद) में की।

 

अलाउद्दीन खिलजी (खिलजी वंश)

22 अक्तूबर 1296 को अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली का सुल्तान बना। अलाउद्दीन खिलजी का मूल नाम अली और गुरशास्प था। अलाउद्दीन खिलजी ने सेना को नकद वेतन और स्थायी सेना बनाने की नींव रखी। अलाउद्दीन खिलजी ने ही घोडा दागने और सेनिकों का हुलिया लिखने की प्रथा की शुरुआत की। अलाउद्दीन खिलजी ने भू-राजस्व उपज का 1/2 भाग कर दिया। अलाउद्दीन खिलजी ने लूट के धन (खम्स) में सुल्तान का हिस्सा 3/4 भाग कर दिया। इसने कम तौलने वाले व्यक्ति के शरीर से मांस काटने का आदेश दिया और मूल्य नियंत्रण प्रणाली की कठोरता से लागू किया। अलाउद्दीन खिलजी ने दक्षिण भारत पर विजय पाने के लिए ‘मलिक काफ़ूर’ को भेजा। अलाउद्दीन खिलजी ने इक्ता प्रथा को समाप्त किया था। इसने जमैयत खाना मस्जिद, सीरी का किला, अलाई दरवाजा, हजार खंबा महल का निर्माण कराया। इसने दैवी अधिकार सिद्धांत चलाया। इसने सिकंदर-ए-सानी की उपाधि ली। इसने मलिक याक़ूब को दीवान-ए-रियासत बनाया। इसके काल में परावना-नवीस नामक अधिकारी वस्तुओं का परमिट जारी करता था। इसके काल में खाद्यानों को बिक्री हेतु शहना-ए-मंडी में लाया जाता था। इसने काल में वस्त्र, शक्कर, मेवा, दीपक का तेल, जड़ी-बूटी को सराए-ए-अदल में बिक्री हेतु लाया जाता था। जियाउद्दीन बरनी की कृति ‘तारीखे फिरोजशाही’ में अलाउद्दीन खिलजी की आर्थिक नीतियों का विवरण मिलता है। अलाउद्दीन खिलजी ने खजाइनुल-फ़तूह-अमीर खुसरो, रिहला-इबनबतूता और फुतुहस्सलातीन-इसामी नामक कृतियाँ लिखी। इसके काल में मुहतसिब (सेंसर) और नाजिर (नाप-तौल अधिकारी) की मूल्य नियंत्रण करने में महत्वपूर्ण भूमिका थी। अलाउद्दीन खिलजी ने राजस्व सुधार हेतु मिल्क, वक्फ, इनाम की भूमि को वापस लेकर खालसा भूमि में बदल दिया। क्षेत्रफल के आधार पर लगान का निर्धारण करने वाले पद ‘मसाहत’ की शुरुआत अलाउद्दीन ने की। अलाउद्दीन खिलजी ने दुधारू पशुओं पर चराई कर और घरों व झोपड़ी पर गढ़ी कर लगाया। इसकी मृत्यु 5 जनवरी 1316 ई0 को हुई। अलाउद्दीन खिलजी द्वारा निर्मित पद हैं-

  • दीवान-ए-रियासत : व्यापरियों पर नियंत्रण व बाजार नियंत्रण।
  • शहना-ए-मंडी : बाजार का अधीक्षक।
  • बरीद : बाजार में घूमकर बाजार का निरक्षण।
  • मुनहीयान व गुप्तचर : गुप्त सूचना प्राप्त करना।

 

कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी (खिलजी वंश)

कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी 1316 ई० को दिल्ली के सिंहासन पर बैठा। इसे नग्न स्त्री, पुरुष की संगत पसन्द थी। मुबारक खिलजी कभी-कभी राजदरबार में स्त्रियों का वस्त्र पहनकर आ जाता था। बरनी के अनुसार मुबारक कभी-कभी नग्न होकर दरबारियों के बीच दौड़ा करता था । मुबारक खाँ ने खलीफा की उपाधि धारण की थी। मुबारक के वजीर खुशरों खाँ ने 15 अप्रैल, 1320 ई० को इसकी हत्या कर दी और स्वयं दिल्ली के सिंहासन पर बैठा। खुशरों खाँ ने पैगम्बर के सेनापति की उपाधि धारण की।

 

तुगलक वंश (1320-1398 ई०)

 

गयासुद्दीन तुगलक (तुगलक वंश)

5 सितम्बर, 1320 ई० को खुशरों खाँ को हरा कर गाजी मलिक या तुगलक गाजी गयासुद्दीन तुगलक के नाम से 8 सितम्बर, 1320 ई० को दिल्ली की गद्दी पर बैठा। इसने लगभग 29 बार मंगोल आक्रमण को विफल किया। गयासुद्दीन ने अलाउद्दीन के समय में लिए गए अमीरों की भूमि को पुनः लौटा दिया ।  नहरों का निर्माण करने वाला गयासुद्दीन प्रथम शासक था। इसने सिंचाई के लिए कुएँ एवं नहरों का निर्माण करवाया। इसने दिल्ली के पास तुगलकाबाद नाम का नया नगर स्थापित किया। यह नगर रोमन शैली में निर्मित था। इसके दुर्ग को छप्पनकोट के नाम से भी जाना जाता है। बंगाल के अभियान से लौटते समय 1325 ई० में गयासुदीन तुगलक की मृत्यु  जूना खाँ द्वारा निर्मित लकड़ी के महल में दबकर हो गयी।

 

मुहम्मद बिन तुगलक (तुगलक वंश)

गयासुद्दीन के बाद मुहम्मद बिन तुगलक के नाम से दिल्ली के सिंहासन पर बैठा। मुहम्मद बिन तुगलक का वास्तविक नाम जूना खाँ  था। यह मध्यकालीन सभी सुल्तानों में सर्वाधिक विद्वान एवं योग्य था। इसको स्वप्नशील, पागल एवं रक्तपिपासु कहा गया क्योंकि इसकी सनक भरी योजनाएँ, क्रूर कृत्य प्रजा को कष्ट देते थे। इसने कृषि-विकास के लिए ‘अमीर-ए-कोही’ नामक विभाग की स्थापना की। इसने अपनी राजधानी दिल्ली से देवगिरि में स्थानान्तरित की और उसका नाम दौलताबाद रखा। मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा क्रियान्वित चार योजनाएँ हैं-

  •  दोआब क्षेत्र में कर वृद्धि, (1326-1327 ई०)
  • राजधानी – परिवर्तन (1326-27 ई० )
  • सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन (1329-30 ई०)
  • खुरासन एवं कराचिल का अभियान

इसने सांकेतिक मुद्रा के अन्तर्गत पीतल (फरिश्ता के अनुसार), ताँबा (बरनी के अनुसार) धातुओं के सिक्के चलवाए, जिनका मूल्य चाँदी के रुपए टंका के बराबर होता था। सन् 1333 ई० के आसपास अफ्रीकी यात्री इब्नबतूता भारत आया और मुहम्मद बिन तुगलक ने इसे दिल्ली का काजी नियुक्त किया। सन्  1342 ई० में मुहम्मद बिन तुगलक ने इब्नबतूता को राजदूत बनाकर चीन भेजा। ‘रेहला’ इब्नबतूता द्वारा लिखित पुस्तक है। ‘रेहला’ में मुहम्मद तुगलक के समय की घटनाओं का वर्णन है। 20 मार्च, 1351 ई० को सिन्ध जाते समय थट्टा के निकट गोडाल में मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु  हो गयी। इसके शासनकाल में दक्षिण में हरिहर एवं बुक्का नामक दो भाइयों ने 1336 ई० में स्वतंत्र राज्य विजयनगर की स्थापना की और महाराष्ट्र में अलाउद्दीन बहमन शाह ने 1347 ई० में स्वतंत्र बहमनी राज्य की स्थापना की। मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु होने पर इतिहासकार ‘बरनी’ ने लिखा है, “अंततः लोगों को उससे मुक्ति मिली और उसे लोगों से “। मुहम्मद बिन तुगलक का गुरु शेख अलाउद्दीन था। मुहम्मद बिन तुगलक सल्तनत का पहला शासक था, जो अजमेर में शेख मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह और बहराइच में सालार मसूद गाजी के मकबरे में गया। इसने बदायूँ में ‘मीरन मुलहीम’, दिल्ली में ‘शेख निज़ामुद्दीन औलिया’, मुल्तान में ‘शेख रुकनुद्दीन’, अजुधन में ‘शेख मुल्तान’ आदि संतों की कब्र पर मकबरे बनवाए।

 

फिरोज तुगलक (तुगलक वंश)

20 मार्च, 1351 ई० को फिरोज तुगलक को सुल्तान की गद्दी मिली। इस राज्याभिषेक थट्टा के नजदीक हुआ। फिरोज तुगलक का फिर से राज्याभिषेक दिल्ली में अगस्त, 1351 ई० को हुआ। खलीफा ने इसे ‘कासिम अमीर उल मोममीन’ की उपाधि दी। फिरोज तुगलक ने अपने शासनकाल में 24 कष्टदायक करों को समाप्त कर केवल चार कर—खराज (लगान), खुम्स (युद्ध में लूट का माल), जजिया एवं जकात को वसूल करने का आदेश दिया। ब्राह्मणों पर जज़िया लागू करने वाला पहला मुसलमान शासक फिरोज तुगलक ही था। फिरोज तुगलक ने उपज का 1/10 भाग सिंचाई कर भी लगाया। इसने पाँच बड़ी नहरों का निर्माण करवाया। इसने 300 नये नगरों की स्थापना की। इनमें हिसार, फिरोजाबाद (दिल्ली), फतेहाबाद, जौनपुर, फिरोजपुर प्रमुख हैं। फिरोज तुगलक के शासनकाल में खिज्राबाद [टोपरा गाँव] एवं मेरठ से अशोक के दो स्तम्भों को लाकर दिल्ली में स्थापित किया गया। सुल्तान फिरोज तुगलक ने विभाग ‘दीवान-ए-खैरात’ की स्थापना की। जिसका उद्देश्य अनाथ मुस्लिम महिलाओं, विधवाओं एवं लड़कियों की सहायता के लिए करना था। इसके समय में ही सबसे अधिक दासों की संख्या (लगभग एक लाख अस्सी हजार) थी। फिरोज तुगलक ने दासों की देखभाल के लिए ‘दीवान-ए बंदगान’ विभाग की स्थापना की। फिरोज तुगलक ने सैन्य पदों को वंशानुगत बना दिया। फिरोज तुगलक ने अपनी आत्मकथा ‘फतूहात ए-फिरोजशाही’ की रचना की। फिरोज तुगलक ने ‘जियाउद्दीन बरनी’ एवं ‘शम्स-ए-शिराज अफीफ’ को  संरक्षण दिया। इसने ज्वालामुखी मंदिर के पुस्तकालय को लूटा और वहाँ के तेरह सौ ग्रंथों में से कुछ का फारसी अनुवाद अपाउद्दीन द्वारा ‘दलायते – फिरोजशाही’ नाम से  करवाया। फिरोज तुगलक ने चाँदी एवं ताँबे के मिश्रण से निर्मित सिक्के भारी संख्या में जारी करवाए, जिसे अद्धा एवं विख कहा जाता था। इसने तेलंगानी में ‘खान-ए-जहाँ’ मकबरा बनवाया जिसकी तुलना जेरुसलम की ‘उमर की मस्जिद’ से होती है। दिल्ली के ‘कोटला फिरोजशाह दुर्ग’ का निर्माण फिरोज तुगलक ने  करवाया। इक्ता प्रथा की दुबारा शुरुआत फिरोज तुगलक ने की थी। सितम्बर 1388 ई० में इसकी मृत्यु हो गयी।

 

नासिरुद्दीन महमूद तुगलक

तुगलक वंश का अंतिम शासक नासिरुद्दीन महमूद तुगलक था। इसका शासन दिल्ली से पालम तक ही रह गया था। इसके समय में एक हिजड़ा मलिक सरवर ने मलिकुशर्शक (पूर्वाधिपति) की उपाधि धारण की और स्वतंत्र राज्य जौनपुर बनाया। नासिरुद्दीन महमूद तुगलक के समय 1398 में तैमूरलंग ने दिल्ली पर आक्रमण किया।

 

सैय्यद वंश (1414 से 1451 ई०)

 

खिज्र खाँ

खिज्र खाँ सैय्यद वंश का संस्थापक था। इसने सुल्तान की उपाधि के स्थान पर  ‘रैयत ए-आला’ की उपाधि धारण की। यह तैमूरलंग का सेनापति था। भारत से लौटते समय तैमूरलंग ने खिज्र खाँ को मुल्तान, लाहौर एवं दिपालपुर का शासक नियुक्त किया। यह तैमूरलंग के पुत्र शाहरुख को ‘कर’ भेजता था। 20 मई, 1421 ई० को खिज्र खाँ की मृत्यु हुई।

 

मुबारक खाँ

खिज्र खाँ की मृत्यु के बाद इसके पुत्र मुबारक खाँ ने ‘शाह’ की उपाधि धारण की। मुबारक शाह ने ‘याहिया बिन अहमद सरहिन्दी’ को  ‘संरक्षण दिया। इसकी पुस्तक तारीख-ए-मुबारक शाही में सैय्यद वंश के विषय में जानकारी मिलती है। मुबारक शाह ने यमुना नदी के किनारे ‘मुबारकाबाद’ की स्थापना  की थी।

 

अलाउद्दीन आलम शाह

अलाउद्दीन आलम शाह सैय्यद वंश का अंतिम था। सैय्यद वंश का शासन लगभग 37 वर्षों तक रहा।

 

लोदी वंश (1451 से 1526 ई०)

 

बहलोल लोदी

‘बहलोल लोदी’ लोदी वंश का संस्थापक था। 19 अप्रैल, 1451 ई० को बहलोल लोदी ‘बहलोल शाहगाजी’ की उपाधि धारण कर दिल्ली की गद्दी पर बैठा। बहलोल लोदी ने ही दिल्ली पर प्रथम अफगान राज्य की स्थापना की। इसने ‘बहलोल सिक्के’ का प्रचलन करवाया। बहलोल लोदी अपने सरदारों को ‘मकसद-ए-अली’ कहता था। बहलोल लोदी अपने सरदारों के खड़े रहने पर खुद भी खड़ा रहता था।

 

निजाम खाँ

17 जुलाई, 1489 ई० में बहलोल लोदी का पुत्र निजाम खाँ दिल्ली के सिंहासन पर बैठा। इसने ‘सुल्तान सिकन्दर शाह’ की उपाधि धारण की।

 

सिकन्दर लोदी

सिकन्दर लोदी ने 1504 ई० में आगरा शहर की स्थापना की। इसने भूमि मापन हेतु प्रामाणिक पैमाना ‘गजे सिकन्दरी’ चलाया। सिकन्दर लोदी ने ‘गुलरुखी’ शीर्षक से फारसी कविताएँ लिखी। इसने आगरा को अपनी नई राजधानी बनाया। इसने संस्कृत के आयुर्वेद ग्रंथ का फारसी में ‘फरहंगे सिकन्दरी’ नाम से अनुवाद कराया। इसने नगरकोट के ज्वालामुखी मंदिर की मूर्ति को तोड़ा था और उस मूर्ति के टुकड़ों को कसाइयों को मांस तौलने के लिए दे दिया था। सिकन्दर लोदी ने मुसलमानों को ताजिया निकालने एवं मुस्लिम स्त्रियों के पीरों-संतों के मजार पर जाने पर रोक लगा दी। सिकन्दर लोदी के वजीर ने मोठ की मस्जिद का निर्माण कराया था।सिकन्दर लोदी की मृत्यु 21 नवम्बर, 1517 ई० को गले की बीमारी के कारण हुई।

 

इब्राहिम लोदी

सिकन्दर लोदी का पुत्र इब्राहिम ‘शाह’ की उपाधि धारण कर आगरा की गद्दी पर बैठा। बाबर ने 21 अप्रैल, 1526 ई० को पानीपत के प्रथम युद्ध में इब्राहिम लोदी को हराया। पानीपत के प्रथम युद्ध में ही इब्राहिम लोदी मारा गया। इब्राहिम लोदी के चाचा आलम खाँ और पंजाब के शासक दौलत खाँ लोदी ने बाबर को भारत पर आक्रमण का निमंत्रण दिया था।

 

सल्तनतकालीन शासन व्यवस्था 

‘सुल्तान’ केन्द्रीय प्रशासन का मुखिया होता था। मंत्रिपरिषद को मजलिस-ए-खलवत कहा गया। मजलिस-ए-खास में मजलिस-ए-खलवत की बैठक होती थी। बार-ए-खास में सुल्तान सभी दरबारियों, खानों, अमीरों, मालिकों और अन्य रईसों को बुलाता था। बार-ए-आजम सुल्तान राजकीय कार्यों का अधिकांश भाग पूरा करता था। बलबन एवं अलाउद्दीन के समय अमीर प्रभावहीन हो गए। लोदी वंश के शासनकाल में अमीरों का महत्त्व चरमोत्कर्ष पर था। दिल्ली सल्तनत अनेक प्रांतों में विभक्त थी जिसे ‘इक्ता’ या ‘सुबा’ कहते थे। ‘इक्ता’ या ‘सुबा’ का शासन ‘नायब’ या ‘वली’ या ‘मुक्ति’ द्वारा संचालित होता था। इक्ताओं को शिको (जिलों) में बाँटा गया था। इक्ताओं के प्रमुख को ‘शिकदार’ कहते थे। शिकों को परगनों में विभाजित किया गया था। परगने का मुख्य अधिकारी ‘आमिल’ था और लगान को निश्चित करने वाला अधिकारी ‘मुशरिफ’ था। अमीर-ए-सदा नामक अधिकारी एक शहर या 100 गाँवों के शासन की देख-रेख  करता था। ग्राम प्रशासन की सबसे छोटी इकाई होता था। सुल्तान की स्थायी सेना को खासखेल नाम दिया गया था। सैन्य व्यवस्था का आधार मंगोल सेना के वर्गीकरण की दशमलव प्रणाली को बनाया गया था।

 

सल्तनतकालीन मंत्री-पद और उससे संबंधित विभाग

पद बनाने वाला राजा कार्य
वजीर (प्रधानमंत्री) राजस्व विभाग का प्रमुख
मुशरिफ-ए-मुमालिक (महालेखाकार) प्रांतों एवं अन्य विभागों से प्राप्त आय एवं व्यय का लेखा-जोखा।
मजमुआदर उधार दिए गए धन का हिसाब रखना
खजीन कोषाध्यक्ष
सद्र-उस- सुदूर धर्म विभाग एवं दान विभाग का प्रमुख
आरिज-ए-मुमालिक दीवान-ए-अर्ज अथवा सैन्य विभाग का प्रमुख
वरीद-ए-मुमालिक गुप्तचर विभाग का प्रमुख अधिकारी
काजी-उल्-कजात सुल्तान के बाद न्याय का सर्वोच्च अधिकारी
दीवान-ए-खैरात फिरोजशाह तुगलक दान विभाग
दीवान-ए-बंदगान फिरोजशाह तुगलक दास विभाग
दीवान – ए – इस्तिहाक फिरोजशाह तुगलक पेंशन विभाग
वकील-ए-दर सुल्तान की व्यक्तिगत सेवाओं की देखभाल करता था
दीवान ए-मुस्तखराज (वित्त विभाग) अलाउद्दीन खिलजी  
दीवान-ए-कोही (कृषि विभाग) मुहम्मद बिन तुगलक  
दीवान-ए-अर्ज (सैन्यविभाग ) बलबन  

 

सल्तनतकालीन राजस्व (कर) व्यवस्था

कर का नाम किससे, कितना लिया जाता था?
उश्र मुसलमानों से लिया जाने वाला भूमि कर।
खराज गैर मुसलमानों से लिया जाने वाला भूमि कर
जकात मुसलमानों पर धार्मिक कर (सम्पत्ति का 40वाँ हिस्सा)
जजिया गैर मुसलमानों पर धार्मिक कर।
खम्स लूटे हुए धन, खानों अथवा भूमि में गढ़े हुए खजानों से प्राप्त सम्पत्ति का 1/5 भाग था जिस पर सुल्तान का अधिकार था तथा शेष 4/5 भाग पर उसके सैनिकों अथवा खजाने को प्राप्त करने वाले व्यक्ति का अधिकार होता था। फिरोज तुगलक को छोड़कर अन्य सभी शासकों ने 4/5 हिस्सा स्वयं अपने लिए रखा। सुल्तान सिकन्दर लोदी ने गढ़े हुए खजानों में से कोई हिस्सा नहीं लिया।

 

सल्तनतकालीन सैन्य व्यवस्था

दस अश्वारोही 1 सर-ए-खेल
दस सर-ए-खेल 1 सिपहसाला
दस सिपहसालार 1 अमीर
दस अमीर 1 मलिक
दस मलिक 1 खान

बारूद की सहायता से गोला फेंकने वाली मशीन को ‘मंगलीक’ तथा ‘अर्राद’ कहा जाता था। तुर्की, अरब और रूस से अच्छी नस्ल के घोड़े मँगाए जाते थे। हाथी मुख्यतः बंगाल से मँगाए जाते थे। कानून ‘शरीयत’, ‘कुरान’ एवं ‘हदीस’ पर आधारित था। मुस्लिम कानून के चार महत्त्वपूर्ण स्रोत थे- ‘कुरान’, ‘हदीस’, ‘इजमा’ एवं ‘कयास’। हफ्ते में दो बार सुल्तान दरबार में न्याय करने के लिए उपस्थित आता था। लगान निर्धारित करने की मिश्रित प्रणाली को ‘मुक्ताई’ कहा गया। भूमि की नाप-जोख करने के बाद क्षेत्रफल के आधार पर लगान का निर्धारण ‘मसाहत’ कहलाता था। पूर्ण रूप से केन्द्र के नियंत्रण में रहने वाली भूमि को खालसा भूमि कहते थे। ‘देवल’ अन्तरराष्ट्रीय बन्दरगाह के रूप में प्रसिद्ध था।

 

सल्तनतकालीन प्रसिद्ध स्थान

स्थान प्रसिद्धी के कारण
आगरा नील उत्पादन
सतगाँव रेशमी रजाइयाँ
अन्हिवाड़ा व्यापारियों का तीर्थ
बनारस सोने-चाँदी एवं जड़ी काम
सरसुती अच्छी किस्म के चावल

 

 

 

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