सिक्ख गुरुओं का संक्षिप्त विवरण (तालिका)
| क्रम | गुरु का नाम | समय (काल) | मुख्य कार्य/विशेषता |
|---|---|---|---|
| 1. | गुरु नानक देव | मृत्यु 1539 ई० | सिक्ख धर्म की नींव रखी। |
| 2. | गुरु अंगद | 1539 – 1552 ई० | गुरुमुखी लिपि की शुरुआत की। |
| 3. | गुरु अमरदास | 1552 – 1574 ई० | विवाह की ‘लवन’ पद्धति शुरू की। |
| 4. | गुरु रामदास | 1574 – 1581 ई० | अमृतसर नगर बसाया। |
| 5. | गुरु अर्जुन | 1581 – 1606 ई० | आदिग्रंथ की रचना की। |
| 6. | गुरु हरगोविन्द | 1606 – 1645 ई० | सिक्खों को सैनिक शक्ति बनाया। |
| 7. | गुरु हरराय | 1645 – 1661 ई० | दाराशिकोह को आशीर्वाद दिया। |
| 8. | गुरु हरकिशन | 1661 – 1664 ई० | चेचक से मृत्यु हुई। |
| 9. | गुरु तेगबहादुर | 1664 – 1675 ई० | औरंगजेब द्वारा हत्या। |
| 10. | गुरु गोविन्द सिंह | 1675 – 1708 ई० | खालसा पंथ की स्थापना की। |
विस्तृत जानकारी और सरल व्याख्या
1. गुरु नानक (प्रथम गुरु)
सिक्ख धर्म को शुरू करने का श्रेय गुरु नानक को जाता है। उनके शिष्य ही सिक्ख कहलाए।
- वे मुगल राजा बाबर और हुमायूँ के समय के थे।
- 1496 ई० की कार्तिक पूर्णिमा को उन्हें ईश्वर से जुड़ाव का नया अहसास हुआ।
- उन्होंने ‘गुरु का लंगर’ नाम से बिना पैसों के भोजन खिलाने की व्यवस्था शुरू की और कई जगहों पर ‘संगत’ (धर्मशाला) और ‘पंगत’ (लंगर) बनवाए जहाँ लोग रोज मिलते थे।
- उनकी मृत्यु 1539 ई० में करतारपुर में हुई。
2. गुरु अंगद (दूसरे गुरु)
इनका पुराना नाम लहना था।
- इन्होंने नानक द्वारा शुरू किए गए लंगर को हमेशा के लिए पक्का (स्थायी) कर दिया।
- इन्होंने गुरुमुखी लिपि (लिखने का तरीका) की शुरुआत की।
3. गुरु अमरदास (तीसरे गुरु)
इन्होंने सिक्खों को हिंदुओं से अलग दिखाने के लिए कई कार्य किए, जैसे शादी का अलग तरीका ‘लवन’ शुरू करना।
- मुगल राजा अकबर ने इनसे गोविन्दवाल जाकर मुलाकात की और इनकी बेटी बीबी भानी को कई गाँव उपहार में दिए।
- इन्होंने धर्म के प्रचार के लिए 22 गद्दियाँ बनाईं।
4. गुरु रामदास (चौथे गुरु)
ये बीबी भानी के पति थे। अकबर ने इन्हें 500 बीघा जमीन दी थी।
- इन्होंने इसी जमीन पर अमृतसर नाम का तालाब खुदवाया और अमृतसर शहर बसाया।
- इन्होंने अपने तीसरे बेटे अर्जुन को गुरु बनाया और इस तरह गुरु के पद को खानदानी (पैतृक) बना दिया।
5. गुरु अर्जुन (पाँचवें गुरु)
इन्होंने सिक्खों के पवित्र ग्रंथ ‘आदिग्रंथ’ की रचना की, जिसमें गुरु नानक की प्रार्थनाओं के साथ कबीर, नामदेव और रैदास की बातें भी शामिल हैं।
- इन्होंने अमृतसर तालाब के बीच में हरमन्दर साहब (स्वर्ण मंदिर) बनवाया।
- मुगल शहजादे खुसरो की मदद करने के कारण 1606 ई० में जहाँगीर ने इन्हें मरवा दिया।
6. गुरु हरगोविन्द (छठे गुरु)
इन्होंने सिक्खों को एक सैनिक संगठन बनाया और ‘अकाल तख्त’ (ईश्वर का सिंहासन) का निर्माण किया।
- ये दो तलवारें पहनकर गद्दी पर बैठते थे और दरबार में नगाड़ा बजवाते थे।
- इन्होंने अमृतसर शहर के चारों ओर दीवारें (किलेबंदी) बनवाईं।
7. गुरु हरराय, हरकिशन और तेगबहादुर
- गुरु हरराय: इन्होंने दाराशिकोह को आशीर्वाद दिया था।
- गुरु हरकिशन: इनकी मौत चेचक की बीमारी से हुई। इन्हें दिल्ली जाकर औरंगजेब को गुरु पद के बारे में समझाना पड़ा था।
- गुरु तेगबहादुर: इस्लाम न अपनाने के कारण औरंगजेब ने इन्हें वर्तमान शीशगंज गुरुद्वारा के पास मरवा दिया था।
8. गुरु गोविन्द सिंह (दसवें एवं अंतिम गुरु)
इनका जन्म 1666 ई० में पटना में हुआ था। इन्होंने खुद को ‘सच्चा पादशाह’ कहा।
- इन्होंने सिक्खों के लिए ‘पाँच ककार’ (केश, कंघा, कृपाण, कच्छा और कड़ा) जरूरी किए और सभी के नाम के पीछे ‘सिंह’ जोड़ना शुरू किया।
- इनका मुख्य निवास स्थान आनंदपुर साहिब था।
- इनके दो बेटों, फतह सिंह और जोरावर सिंह को सरहिंद के फौजदार वजीर खाँ ने जिंदा दीवार में चुनवा दिया था।
- 1699 ई० में वैशाखी के दिन इन्होंने ‘खालसा पंथ’ बनाया और ‘पाहुल’ प्रथा शुरू की।
- इन्होंने आदिग्रंथ को अंतिम रूप दिया और कहा कि अब से ‘गुरुवाणी’ (पवित्र वचन) ही गुरु का काम करेगी।
- 1708 ई० में नादेड़ में गुल खाँ नाम के पठान ने इनकी हत्या कर दी।
स्रोतों में दी गई जानकारी के आधार पर सिक्ख इतिहास और बंगाल के गवर्नर का सरल शब्दों में पूर्ण विवरण यहाँ दिया गया है:
बन्दा बहादुर (बन्दा सिंह बहादुर)
- जन्म और परिवार: इनका जन्म 1670 ई० में पुंछ जिले के रजौली गाँव में हुआ था। इनके बचपन का नाम लक्ष्मणदास था और इनके पिता रामदेव भारद्वाज एक राजपूत थे।
- उद्देश्य और राजधानी: इनका मुख्य लक्ष्य पंजाब में एक स्वतंत्र सिक्ख राज्य बनाना था। इसके लिए इन्होंने लौहगढ़ को अपनी राजधानी बनाया। इन्होंने गुरु नानक और गुरु गोविन्द सिंह के नाम के सिक्के भी चलवाए।
- संघर्ष और मृत्यु: इन्होंने सरहिन्द के मुगल अधिकारी वजीर खाँ को मार दिया था। मुगल सम्राट फर्रुखसियर के कहने पर 1716 ई० में इन्हें गुरुदासपुर नांगल नामक स्थान पर पकड़ लिया गया और मार दिया गया। शाहदरा को ‘कत्लगढ़ी’ के नाम से जाना जाता है क्योंकि यहाँ बन्दा बहादुर ने हजारों मुगल सैनिकों का खात्मा किया था।
- दल खालसा और मिसल: उनकी मृत्यु के बाद सिक्ख कई गुटों में बँट गए थे, लेकिन 1748 ई० में नवाब कर्पूर सिंह की कोशिशों से सभी गुट ‘दल खालसा’ में मिल गए। इसका नेतृत्व जस्सा सिंह आहलूवालिया ने किया, जिसे बाद में 12 भागों में बाँटा गया, जिन्हें ‘मिसल’ कहा गया। मिसल एक अरबी शब्द है जिसका मतलब ‘बराबर’ (समान) होता है।
महाराजा रणजीत सिंह
- जन्म और उत्थान: इनका जन्म 2 नवम्बर, 1780 ई० को गुजरांवाला में सुकरचकिया मिसल के प्रमुख महासिंह के घर हुआ था। उनके दादा चरतसिंह ने इस मिसल को काफी आगे बढ़ाया था।
- शासन: रणजीत सिंह 1798-99 ई० में लाहौर के शासक बने। 25 अप्रैल, 1809 ई० को उनके और चार्ल्स मेटकाफ के बीच अमृतसर की संधि (समझौता) हुई।
- प्रशासन: उनका राज्य चार बड़े प्रांतों (सूबों) में बँटा था— पेशावर, कश्मीर, मुल्तान और लाहौर। उनके विदेश मंत्री फकीर अजीजुद्दीन और वित्त मंत्री दीनानाथ थे। उनकी मृत्यु 7 जून, 1839 ई० को हो गई।
अंग्रेज-सिक्ख संघर्ष और संधियाँ
महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद अंग्रेजों और सिक्खों के बीच दो मुख्य युद्ध हुए:
- प्रथम आंग्ल-सिक्ख युद्ध: 1845-46 ई०।
- द्वितीय आंग्ल-सिक्ख युद्ध: 1849 ई०।
इन युद्धों के दौरान हुए समझौते और लड़ाइयाँ नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट हैं:
| घटना / संधि | तिथि / समय | विवरण |
|---|---|---|
| लाहौर की संधि | 9 मार्च, 1846 ई० | अंग्रेजों और सिक्खों के बीच समझौता। |
| भैरोंवाल की संधि | 22 दिसम्बर, 1846 ई० | राजा दलीप सिंह की रक्षा के लिए अंग्रेजी सेना का पंजाब में रहना तय हुआ। |
| महारानी जिंदा का निष्कासन | 20 अगस्त, 1847 ई० | उन्हें दलीप सिंह से अलग कर 48,000 रुपये सालाना पेंशन पर शेखपुरा भेज दिया गया। |
| चिलियानवाला की लड़ाई | द्वितीय युद्ध के दौरान | सिक्ख नेता शेर सिंह और अंग्रेज कमांडर गफ के बीच लड़ाई हुई। |
| गुजरात की लड़ाई | 21 फरवरी, 1849 ई० | चिनाब नदी के किनारे चार्ल्स नेपियर के नेतृत्व में अंग्रेजों ने सिक्खों को बुरी तरह हराया। |
पंजाब का विलय और कोहिनूर हीरा
29 मार्च, 1849 ई० को लॉर्ड डलहौजी ने घोषणा की कि पूरा पंजाब अब अंग्रेजी राज्य का हिस्सा है। महाराजा दलीप सिंह को 50,000 पौंड की सालाना पेंशन देकर पढ़ाई के लिए इंग्लैंड भेज दिया गया। सिक्ख राज्य का मशहूर कोहिनूर हीरा महारानी विक्टोरिया को भेज दिया गया।