1. भारतीय अर्थव्यवस्था का संक्षिप्त परिचय
भारतीय अर्थव्यवस्था एक विकासशील (विकासमान) अर्थव्यवस्था है। स्वतंत्रता के बाद से अब तक इसमें आधारभूत संरचना और मात्रात्मक दृष्टि से उल्लेखनीय सुधार हुए हैं और देश गरीबी के दुश्चक्र से बाहर निकलने में सफल रहा है। अर्थव्यवस्था के मुख्य भाग निम्नलिखित हैं:
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भारतीय अर्थव्यवस्था की विशेषताएँ।
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राष्ट्रीय आय।
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भारत में नियोजन।
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नई आर्थिक नीति।
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वित्त व्यवस्था।
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कृषि, उद्योग तथा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार।
2. भारतीय अर्थव्यवस्था की मुख्य विशेषताएँ
(i) कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था:
देश की कुल कार्यशील जनसंख्या का लगभग 52% भाग आज भी कृषि में संलग्न है, जो यह सिद्ध करता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अभी भी ग्रामीण और कृषि पर आधारित है। सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में कृषि क्षेत्र का योगदान 14.6% है।
(ii) मिश्रित अर्थव्यवस्था:
भारत ने स्वतंत्रता के बाद निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों के सह-अस्तित्व वाली ‘मिश्रित अर्थव्यवस्था’ को अपनाया।
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सार्वजनिक क्षेत्र: नियोजन काल में सरकार ने लगभग 45% पूँजी का निवेश किया।
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निजी क्षेत्र: उत्पादन के साधनों और स्रोतों पर आज भी निजी क्षेत्र का वर्चस्व (लगभग 80%) बना हुआ है।
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वर्तमान रुझान: उदारीकरण के बाद अर्थव्यवस्था अब पूँजीवादी ढांचे की ओर अग्रसर है।
(iii) अल्पविकसित अर्थव्यवस्था की पुष्टि:
यद्यपि भारत विकसित हो रहा है, लेकिन अभी भी इसे अल्पविकसित श्रेणी में रखा जाता है, जिसके मुख्य कारक हैं:
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निम्न आय: प्रति व्यक्ति आय का स्तर काफी नीचा है (विश्व विकास रिपोर्ट 2010 के अनुसार 2007 में यह 1070 डॉलर थी)।
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निर्धनता: निर्धनता रेखा से नीचे रहने वाली जनसंख्या 23.85 करोड़ (2004-05) है, जो कुल आबादी का 21.76% है। विश्व बैंक के अनुसार, विश्व के सर्वाधिक निर्धन (1.3 अरब में से 36%) भारत में रहते हैं।
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बेरोजगारी: 2004-05 के आंकड़ों के अनुसार बेरोजगारी का स्तर 34.74 मिलियन था।
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पूँजी की कमी: सकल घरेलू बचत दर में कमी और जनसंख्या में विस्फोटक वृद्धि भी इसके अल्पविकसित होने के मुख्य कारण हैं।
3. विश्व बैंक द्वारा अर्थव्यवस्थाओं का वर्गीकरण (2005 के आंकड़ों के आधार पर)
विश्व बैंक ने प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय उत्पाद के आधार पर देशों को तीन श्रेणियों में बांटा है:
| अर्थव्यवस्था का प्रकार | प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय उत्पाद (2005) |
| न्यून आय अर्थव्यवस्था | 875 डॉलर या उससे कम |
| मध्य आय अर्थव्यवस्था | 876 डॉलर से 10,725 डॉलर के बीच |
| उच्च आय अर्थव्यवस्था | 10,726 डॉलर या उससे अधिक |
भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में ‘राष्ट्रीय आय’ और उससे संबंधित अवधारणाओं का व्यवस्थित संकलन नीचे दिया गया है:
1. राष्ट्रीय आय की गणना का इतिहास
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प्रथम प्रयास: दादा भाई नौरोजी ने 1867-68 में किया था। उन्होंने 1868 में प्रति व्यक्ति आय 20 रुपये आंकी थी।
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अन्य प्रयास: एफ. शिराज (F. Shirras) ने 1911 में प्रति व्यक्ति आय 49 रुपये बताई।
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आधिकारिक प्रयास: स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व वाणिज्य मंत्रालय (आर्थिक सलाहकार कार्यालय) ने पहली बार आधिकारिक प्रयास किया था।
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वर्तमान संस्था: भारत में केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (CSO) राष्ट्रीय आय के आकलन के लिए उत्तरदायी है, जिसमें राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन (NSSO) सहायता करता है।
2. राष्ट्रीय आय की गणना की पद्धतियाँ
राष्ट्रीय आय का आकलन करने के लिए दो प्रमुख पद्धतियों का उपयोग किया जाता है:
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उत्पाद पद्धति (मूल्य वर्धित पद्धति): इसके अंतर्गत कृषि, वानिकी, पशुपालन, खनन और उद्योग जैसे क्षेत्रों में माल और सेवाओं के ‘शुद्ध मूल्य वृद्धि’ का आकलन किया जाता है।
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आय पद्धति: इसके अंतर्गत उत्पादन के घटकों को किए गए भुगतानों का योग किया जाता है। इसका उपयोग मुख्य रूप से परिवहन, प्रशासन और व्यापार जैसे ‘सेवा क्षेत्रों’ की जीडीपी मापने में किया जाता है।
3. राष्ट्रीय आय की परिभाषा एवं आधार
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परिभाषा: एक वित्तीय वर्ष के दौरान अर्थव्यवस्था द्वारा उत्पादित अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के शुद्ध मूल्य का योग, जिसमें विदेशों से अर्जित शुद्ध आय भी शामिल होती है।
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वित्तीय वर्ष: भारत में राष्ट्रीय आय के आंकड़े 1 अप्रैल से 31 मार्च की अवधि पर आधारित होते हैं।
4. प्रमुख आर्थिक अवधारणाएँ (GNP बनाम GDP)
सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP) किसी देश के नागरिकों द्वारा एक वित्तीय वर्ष में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का कुल मौद्रिक मूल्य है।
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समीकरण:
$$GNP = GDP + (X – M)$$-
$X$: देशवासियों द्वारा विदेशों में अर्जित आय।
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$M$: विदेशियों द्वारा देश के भीतर अर्जित आय।
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विशेष स्थितियाँ:
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यदि $X = M$ (विदेशों से अर्जित आय = देश के भीतर विदेशियों की आय), तो GNP = GDP होगा।
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‘बंद अर्थव्यवस्था’ (जहाँ बाहरी व्यापार न हो) में $X – M = 0$ होता है, जिससे GNP = GDP रहता है।
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5. भारतीय अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति (विकास परिप्रेक्ष्य)
आपके द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, भारतीय अर्थव्यवस्था के अल्पविकसित/विकासशील होने के मुख्य बिंदु ये हैं:
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निर्धनता: 2004-05 में निर्धनता रेखा के नीचे 23.85 करोड़ लोग (कुल आबादी का 21.76%) थे। भारत में विश्व की सर्वाधिक (36%) निर्धन जनसंख्या रहती है।
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बेरोजगारी: 2004-05 में बेरोजगारों की संख्या 34.74 मिलियन थी।
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बचत और संसाधन: सकल घरेलू बचत की दर (2007-08 में लगभग 37.7%) रही, साथ ही संसाधनों की न्यूनता और जनसंख्या में विस्फोटक वृद्धि भी अर्थव्यवस्था के अल्पविकसित होने के सूचक हैं।
सकल घरेलू उत्पाद (GDP), शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (NNP) और राष्ट्रीय आय के आकलन से संबंधित जानकारी का व्यवस्थित विवरण नीचे दिया गया है:
1. प्रमुख आर्थिक अवधारणाएं
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सकल घरेलू उत्पाद (GDP): एक निश्चित समयावधि (सामान्यतः एक वर्ष) में देश की भौगोलिक सीमा के भीतर उत्पादित अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का कुल मौद्रिक मूल्य।
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भारत का GDP (2010 का रुझान): सेवा क्षेत्र (57.2%) > उद्योग क्षेत्र (28%) > कृषि क्षेत्र (14.6%)।
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क्षेत्रीय योगदान: भारत के GDP में सर्वाधिक योगदान महाराष्ट्र का है।
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सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP): यह देश के नागरिकों द्वारा उत्पादित कुल मूल्य है। इसमें GDP के साथ विदेशों से अर्जित शुद्ध आय को जोड़ा जाता है।
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शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (NNP): यह GNP में से ‘मूल्य ह्रास’ (Depreciation या पूँजी स्टॉक की खपत) को घटाकर प्राप्त किया जाता है।
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$$NNP = GNP – \text{मूल्य ह्रास}$$
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राष्ट्रीय आय (National Income): जब NNP का मूल्यांकन साधन लागत (Factor Cost) पर किया जाता है, तो उसे राष्ट्रीय आय कहा जाता है।
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$$राष्ट्रीय आय = \text{बाजार कीमत पर NNP} – \text{शुद्ध अप्रत्यक्ष कर} (\text{कुल अप्रत्यक्ष कर} – \text{सब्सिडी})$$
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2. वैयक्तिक आय (Personal Income)
यह वह आय है जो देश के निवासियों को वास्तव में प्राप्त होती है। इसका सूत्र है:
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वैयक्तिक आय = राष्ट्रीय आय – (निगमों का अवितरित लाभांश + निगम कर + सामाजिक सुरक्षा योजना के लिए किए गए भुगतान) + (हस्तांतरण भुगतान + सरकारी हस्तांतरण भुगतान)।
3. राष्ट्रीय आय का आकलन और सांख्यिकी
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संस्था: भारत में राष्ट्रीय आय के आंकड़े जारी करने वाली शीर्ष संस्था केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन (CSO) है, जिसकी स्थापना 1951 ई. में हुई थी।
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आर्थिक विकास का सूचक: किसी भी देश की आर्थिक विकास दर को मापने के लिए ‘प्रति व्यक्ति आय’ को सर्वश्रेष्ठ सूचक माना जाता है।
4. सारांश तालिका
| अवधारणा | मुख्य आधार |
| GDP | देश की सीमा के भीतर उत्पादन |
| GNP | देश के नागरिकों द्वारा उत्पादन |
| NNP | GNP में से मूल्य ह्रास घटाकर |
| राष्ट्रीय आय | साधन लागत पर NNP |
भारतीय अर्थव्यवस्था में ‘आर्थिक नियोजन’ (Economic Planning) से संबंधित जानकारी का व्यवस्थित संकलन नीचे दिया गया है:
1. आर्थिक नियोजन का अर्थ एवं उद्देश्य
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परिभाषा: आर्थिक नियोजन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा पूर्व-निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु देश के सीमित प्राकृतिक संसाधनों का कुशलतम उपयोग किया जाता है।
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प्रमुख उद्देश्य:
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आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) प्राप्त करना।
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आर्थिक व सामाजिक असमानता को दूर करना।
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गरीबी का निवारण करना।
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रोजगार के अवसरों में वृद्धि करना।
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2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (नियोजन के प्रयास)
भारत में आर्थिक नियोजन की मांग समय-समय पर विभिन्न स्तरों पर उठी:
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1934: एम. विश्वेश्वरैया की पुस्तक ‘प्लांड इकोनोमी फॉर इंडिया’ में सर्वप्रथम प्रस्ताव आया।
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1938: अखिल भारतीय कांग्रेस द्वारा नियोजन की मांग की गई।
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1944: उद्योगपतियों द्वारा ‘बम्बई योजना’ के तहत प्रयास किए गए।
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1947: स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में ‘आर्थिक नियोजन समिति’ का गठन किया गया।
3. योजना आयोग (Planning Commission)
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गठन: 15 मार्च, 1950 को समिति की सिफारिश पर।
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स्वरूप: यह एक गैर-सांविधिक (Non-statutory) और परामर्शदात्री (Advisory) निकाय था।
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अध्यक्षता: भारत के प्रधानमंत्री इसके पदेन (Ex-officio) अध्यक्ष होते थे।
4. पंचवर्षीय योजनाओं का क्रियान्वयन
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आरंभ: भारत की पहली पंचवर्षीय योजना 1 अप्रैल, 1951 से शुरू हुई।
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प्रगति: इस लेख के आंकड़ों के अनुसार, भारत में 10 पंचवर्षीय योजनाएं पूरी हो चुकी हैं और 1 अप्रैल, 2007 से 11वीं पंचवर्षीय योजना का शुभारंभ किया गया था।
पंचवर्षीय योजनाओं का विवरण (लक्ष्य बनाम प्राप्ति)
| योजना | अवधि | लक्ष्य वृद्धि दर (%) | वास्तविक प्राप्ति (%) |
| पहली | 1951-56 | 2.1 | 3.6 |
| दूसरी | 1956-61 | 4.5 | 4.1 |
| तीसरी | 1961-66 | 5.6 | 2.8 |
| चौथी | 1969-74 | 5.5 | 3.3 |
| पाँचवीं | 1974-78 | 4.4 | 5.0 |
| छठी | 1980-85 | 5.2 | 5.4 |
| सातवीं | 1985-90 | 5.0 | 5.8 |
| आठवीं | 1992-97 | 5.6 | 6.7 |
| नौवीं | 1997-02 | 6.5 | 5.5 |
| दसवीं | 2002-07 | 7.8 | 7.2 |
| ग्यारहवीं | 2007-12 | 8.0 (बाद में 7%) | 9.0 (अंतिम वर्ष 10%) |
महत्वपूर्ण तथ्य और घटनाक्रम
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वार्षिक योजनाएं: पंचवर्षीय योजनाओं के अतिरिक्त विकास कार्यों को गति देने के लिए 7 बार वार्षिक योजनाएं बनाई गईं:
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1966-67, 1967-68, 1968-69
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1978-79, 1979-80
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1990-91, 1991-92
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अनवरत योजना (Rolling Plan): जनता सरकार द्वारा वर्ष 1978-83 के लिए ‘अनवरत योजना’ चलाई गई थी। हालांकि, 1980 में कांग्रेस सरकार ने इसे समाप्त कर पुनः छठी पंचवर्षीय योजना की शुरुआत की।
भारतीय अर्थव्यवस्था में विकास की नींव रखने वाली पहली दो पंचवर्षीय योजनाओं का व्यवस्थित विवरण नीचे दिया गया है:
1. प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951–1956)
यह योजना अर्थव्यवस्था में संतुलित विकास की शुरुआत करने के उद्देश्य से लाई गई थी।
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मुख्य प्राथमिकता: कृषि क्षेत्र को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई।
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परिणाम: यह एक अत्यंत सफल योजना रही, जिसने अपने निर्धारित लक्ष्य से कहीं अधिक 3.6% की वार्षिक विकास दर हासिल की।
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आर्थिक प्रभाव: योजना काल के दौरान राष्ट्रीय आय में 18% और प्रति व्यक्ति आय में 11% की कुल वृद्धि दर्ज की गई।
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सार्वजनिक उद्योग: इस दौरान सार्वजनिक उद्योगों के विकास पर कम ध्यान दिया गया और कुल बजट का मात्र 6% हिस्सा ही इस मद में खर्च किया गया।
2. द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956–1961)
यह योजना पी.सी. महालनोबिस मॉडल पर आधारित थी, जिसका मुख्य उद्देश्य ‘समाजवादी समाज’ की स्थापना करना था।
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लक्ष्य: देश के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने हेतु 5 वर्षों में राष्ट्रीय आय में 25% की वृद्धि करना।
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प्राथमिकता:
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भारी उद्योग और खनिज: इन्हें उच्च प्राथमिकता दी गई, जिस पर सार्वजनिक क्षेत्र के व्यय का 24% खर्च हुआ।
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यातायात व संचार: इन्हें द्वितीय प्राथमिकता दी गई और कुल व्यय का 28% इन पर खर्च किया गया।
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प्रमुख उपलब्धियाँ: इसी योजना के दौरान देश के महत्वपूर्ण इस्पात कारखानों की स्थापना हुई:
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दुर्गापुर इस्पात कारखाना
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भिलाई इस्पात कारखाना
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राउरकेला इस्पात कारखाना
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तुलनात्मक सारांश
| बिंदु | प्रथम योजना (1951-56) | द्वितीय योजना (1956-61) |
| आधार | संतुलित विकास | महालनोबिस मॉडल |
| मुख्य जोर | कृषि | भारी उद्योग व खनिज |
| प्रमुख उपलब्धि | सफल विकास दर (3.6%) | बड़े इस्पात संयंत्रों की स्थापना |
भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास क्रम में तृतीय पंचवर्षीय योजना से लेकर पाँचवीं पंचवर्षीय योजना तक का काल अत्यंत उतार-चढ़ाव भरा रहा। इसका व्यवस्थित विवरण नीचे दिया गया है:
1. तृतीय पंचवर्षीय योजना (1961–1966)
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उद्देश्य: अर्थव्यवस्था को ‘आत्मनिर्भर’ और ‘स्वतःस्फूर्त’ अवस्था में पहुँचाना।
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प्राथमिकता: कृषि और उद्योग दोनों को समान महत्व दिया गया।
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परिणाम: यह योजना अपने लक्ष्य (5.6%) को प्राप्त करने में असफल रही और केवल 2.5% वार्षिक वृद्धि दर ही दर्ज कर सकी।
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असफलता के कारण: भारत-चीन युद्ध, भारत-पाक युद्ध और भीषण सूखा।
2. योजना अवकाश (1966–1969)
तृतीय योजना की विफलता और संसाधनों की कमी के कारण तीन वर्षों तक कोई पंचवर्षीय योजना नहीं बनी।
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गतिविधि: इस अवधि में तीन ‘वार्षिक योजनाएँ’ तैयार की गईं।
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प्राथमिकता: कृषि, संबद्ध क्षेत्र और उद्योग को समान महत्व दिया गया।
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कारण: युद्ध और सूखे के कारण संसाधनों का अभाव और कीमतों में बेतहाशा वृद्धि।
3. चतुर्थ पंचवर्षीय योजना (1969–1974)
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उद्देश्य: स्थायित्व के साथ विकास, आर्थिक आत्मनिर्भरता की प्राप्ति और ‘समाजवादी समाज’ की स्थापना।
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परिणाम: यह योजना भी असफल रही; 5.5% के लक्ष्य के विरुद्ध मात्र 3.3% वार्षिक वृद्धि दर प्राप्त हुई।
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विफलता के कारण: प्रतिकूल मौसम (सूखा) और 1971 के दौरान बांग्लादेशी शरणार्थियों का भारी आगमन।
4. पाँचवीं पंचवर्षीय योजना (1974–1978)
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मुख्य उद्देश्य: गरीबी उन्मूलन, आत्मनिर्भरता की प्राप्ति और आर्थिक स्थायित्व।
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प्रमुख कार्यक्रम: 1975 में ‘बीस सूत्री कार्यक्रम’ की शुरुआत हुई।
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विशेषता: पहली बार ‘गरीबी और बेरोजगारी’ के उन्मूलन पर विशेष ध्यान दिया गया।
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प्राथमिकता: सर्वोच्च प्राथमिकता कृषि को, तत्पश्चात उद्योग व खनिज को दी गई।
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विकास दर: लक्ष्य को संशोधित कर 4.4% किया गया था। यह योजना सामान्यतः सफल रही, किंतु गरीबी और बेरोजगारी में अपेक्षित कमी नहीं हो सकी।
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समाप्ति: जनता पार्टी सरकार ने इसे 1978 में समय से पूर्व ही समाप्त करने का निर्णय लिया।
तुलनात्मक सारांश तालिका
| योजना/अवधि | मुख्य लक्ष्य/प्राथमिकता | स्थिति/परिणाम |
| तृतीय (1961-66) | आत्मनिर्भरता | असफल (युद्ध व सूखे के कारण) |
| योजना अवकाश (66-69) | कृषि व उद्योग | संसाधनों की कमी के कारण वार्षिक योजनाएँ |
| चतुर्थ (1969-74) | स्थायित्व के साथ विकास | असफल (मौसम व शरणार्थी समस्या) |
| पाँचवीं (1974-78) | गरीबी उन्मूलन | सफल (किंतु 1978 में समाप्त) |
भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास क्रम में छठी, सातवीं और आठवीं पंचवर्षीय योजनाओं का व्यवस्थित विवरण नीचे दिया गया है:
1. छठी पंचवर्षीय योजना (1980–1985)
इस योजना की शुरुआत जनता पार्टी सरकार के ‘रोलिंग प्लान’ (1978-83) को समाप्त करके की गई।
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मुख्य उद्देश्य: गरीबी उन्मूलन और रोजगार में वृद्धि। (पहली बार गरीबी उन्मूलन पर विशेष जोर दिया गया)।
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विकास दर: 5.2% का लक्ष्य रखा गया था, जिसके विरुद्ध 5.4% की वार्षिक वृद्धि दर प्राप्त हुई। यह एक सफल योजना रही।
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प्रमुख कार्यक्रम: इस दौरान ‘समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम’ (IRDP) जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम शुरू किए गए।
2. सातवीं पंचवर्षीय योजना (1985–1990)
यह योजना सामाजिक न्याय और उत्पादकता पर केंद्रित थी।
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प्रमुख उद्देश्य:
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उत्पादकता में वृद्धि और रोजगार के अधिक अवसर जुटाना।
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साम्य और न्याय पर आधारित सामाजिक प्रणाली की स्थापना।
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सामाजिक एवं आर्थिक असमानताओं को कम करना।
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देशी तकनीकी विकास के लिए सुदृढ़ आधार तैयार करना।
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विकास दर: 5% का लक्ष्य था, जबकि वास्तविक वृद्धि दर 5.8% वार्षिक रही। प्रति व्यक्ति आय में 3.6% प्रतिवर्ष की वृद्धि हुई।
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विशेषता: योजना परिव्यय में पहली बार निजी क्षेत्र को सार्वजनिक क्षेत्र की तुलना में अधिक वरीयता दी गई।
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प्रमुख कार्यक्रम: ‘जवाहर रोजगार योजना’ इसी काल में शुरू हुई।
3. आठवीं पंचवर्षीय योजना (1992–1997)
इस योजना ने आर्थिक विकास की दिशा में मानव संसाधन को केंद्र में रखा।
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सर्वोच्च प्राथमिकता: ‘मानव संसाधन विकास’ (रोजगार, शिक्षा और जनस्वास्थ्य)।
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अन्य लक्ष्य: आधारभूत ढाँचे का सशक्तीकरण और शताब्दी के अंत तक ‘पूर्ण रोजगार’ की प्राप्ति।
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विकास दर: 5.6% का लक्ष्य था, जबकि 6.7% की वार्षिक वृद्धि दर प्राप्त हुई, जिससे यह एक सफल योजना सिद्ध हुई।
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प्रमुख कार्यक्रम: ‘प्रधानमंत्री रोजगार योजना’ (1993) की शुरुआत इसी दौरान हुई।
तुलनात्मक सारांश
| योजना | मुख्य फोकस | वास्तविक उपलब्धि | मुख्य कार्यक्रम |
| छठी | गरीबी उन्मूलन | 5.4% | समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम |
| सातवीं | उत्पादकता व सामाजिक न्याय | 5.8% | जवाहर रोजगार योजना |
| आठवीं | मानव संसाधन विकास | 6.7% | प्रधानमंत्री रोजगार योजना |
भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास क्रम में नौवीं और दसवीं पंचवर्षीय योजनाओं का विस्तृत और व्यवस्थित विवरण नीचे दिया गया है:
1. नौवीं पंचवर्षीय योजना (1997–2002)
यह योजना सामाजिक न्याय और समानता पर केंद्रित थी, परंतु अंतरराष्ट्रीय कारणों से अपने लक्ष्यों को पूर्णतः प्राप्त नहीं कर सकी।
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सर्वोच्च प्राथमिकता: ‘न्यायपूर्ण वितरण एवं समानता के साथ विकास’।
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विकास दर: 6.5% के लक्ष्य के विरुद्ध केवल 5.5% वार्षिक वृद्धि दर प्राप्त हुई, जिससे यह योजना ‘असफल’ मानी गई।
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असफलता का कारण: अंतरराष्ट्रीय मंदी।
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आत्मनिर्भरता के प्रमुख स्तंभ:
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भुगतान संतुलन सुनिश्चित करना।
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विदेशी ऋणभार में कमी लाना।
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खाद्यान्नों में आत्मनिर्भरता।
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प्रौद्योगिकीय आत्मनिर्भरता।
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प्राकृतिक संसाधनों (जड़ी-बूटी, औषधीय पौधे) का संरक्षण एवं उचित उपयोग।
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विशेष मुद्दा: इस योजना में ‘क्षेत्रीय संतुलन’ पर विशेष बल दिया गया।
2. दसवीं पंचवर्षीय योजना (2002–2007)
यह योजना अब तक की सबसे सफल पंचवर्षीय योजनाओं में से एक मानी जाती है, जिसने विकास की तीव्र गति प्रदर्शित की।
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प्रमुख लक्ष्य:
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गरीबी और बेरोजगारी का उन्मूलन।
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अगले 10 वर्षों में प्रति व्यक्ति आय को दुगुना करना।
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GDP में वार्षिक 8% की वृद्धि।
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प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI): प्रतिवर्ष 7.5 अरब डॉलर का लक्ष्य।
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रोजगार सृजन: 5 करोड़ नए अवसर।
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सामाजिक लक्ष्य (2007 तक):
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साक्षरता दर: 75%।
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शिशु मृत्यु दर: 45 प्रति हजार से कम।
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वनाच्छादन: 25%।
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योजना का मूल्यांकन (सफलता की कुंजी)
31 मार्च, 2007 को समाप्त हुई इस योजना ने 7.80% की औसत वार्षिक वृद्धि दर हासिल की, जो उस समय तक की ‘सर्वोच्च वृद्धि दर’ थी।
| क्षेत्र | लक्ष्य वृद्धि (%) | वास्तविक प्राप्ति (%) |
| कृषि | 4.00 | 3.42 |
| उद्योग | 8.90 | 8.74 |
| सेवा | 9.40 | 9.30 |
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निवेश एवं बचत:
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निवेश दर: 28.10% (लक्ष्य 28.41%)।
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सकल घरेलू बचत: 26.62% (लक्ष्य 23.31% से अधिक)।
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मुद्रास्फीति: औसत दर 5.02% रही (लक्ष्य 5%)।
ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना (2007-2012) और गरीबी व बेरोजगारी उन्मूलन से जुड़ी प्रमुख योजनाओं का व्यवस्थित विवरण नीचे दिया गया है:
1. ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना (2007–2012)
इस योजना का मुख्य ध्येय “तीव्रतम एवं समावेशी विकास” (Faster and More Inclusive Growth) था। इसके प्रमुख लक्ष्य और बिंदु निम्नलिखित थे:
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आर्थिक विकास दर: 9% की औसत वार्षिक वृद्धि दर का लक्ष्य, जिसमें अंतिम वर्ष (2011-12) के लिए 10% का लक्ष्य रखा गया था।
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क्षेत्रीय विकास लक्ष्य:
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कृषि: 4% वार्षिक वृद्धि।
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उद्योग एवं सेवा: 9 से 11% वार्षिक वृद्धि।
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रोजगार एवं मजदूरी:
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70 मिलियन (7 करोड़) नए रोजगार के अवसरों का सृजन।
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शैक्षिक बेरोजगारी को 5% से नीचे लाना।
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अकुशल श्रमिकों की वास्तविक मजदूरी दर में 20% तक की वृद्धि।
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बुनियादी ढांचा एवं सामाजिक लक्ष्य:
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देश के सभी ग्रामों का विद्युतीकरण।
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7 वर्ष से अधिक आयु वर्ग में साक्षरता दर को बढ़ाकर 85% करना।
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प्राथमिक शिक्षा में विद्यालय छोड़ने वाले (Dropout) बच्चों की दर को 52.2% से घटाकर न्यूनतम स्तर पर लाना।
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दीर्घकालिक लक्ष्य: वर्ष 2016-17 तक प्रति व्यक्ति आय को दोगुना करने के लिए GDP विकास दर को 8% से बढ़ाकर 10-12% के स्तर पर बनाए रखना।
2. गरीबी एवं बेरोजगारी उन्मूलन से संबंधित प्रमुख योजनाएँ
भारत में गरीबी और बेरोजगारी को कम करने के लिए समय-समय पर विभिन्न कल्याणकारी कार्यक्रम शुरू किए गए। इन प्रमुख योजनाओं और उनके प्रारंभ होने के वर्षों का विवरण नीचे दिया गया है:
| योजना का नाम | प्रारंभ वर्ष |
| मरुभूमि विकास कार्यक्रम (Desert Development Programme) | 1977-78 |
| काम के बदले अनाज कार्यक्रम (Food for Work Programme) | 1977-78 |
| अन्त्योदय योजना (Antyodaya Yojana) | 1977-78 |
| ट्राईसेम (TRYSEM) (ग्रामीण युवाओं के लिए स्वरोजगार प्रशिक्षण) | 1979 |
1. प्रमुख कल्याणकारी योजनाएँ और प्रारंभ वर्ष
| योजना का नाम | प्रारंभ वर्ष | योजना का नाम | प्रारंभ वर्ष |
| मरुभूमि विकास कार्यक्रम | 1977-78 | जवाहर रोजगार योजना | 1989 |
| काम के बदले अनाज कार्यक्रम | 1977-78 | नेहरू रोजगार योजना | 1989 |
| अन्त्योदय योजना | 1977-78 | दस लाख कुआँ योजना | 1988-89 |
| ट्रायसेम (TRYSEM) | 1979 | इंदिरा आवास योजना | 1985-86 |
| एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम | 1980 | प्रधानमंत्री रोजगार योजना | 1993 |
| ड्वाकरा (DWCRA) | 1982 | रोजगार आश्वासन योजना | 1993 |
| स्वर्ण जयंती शहरी रोजगार योजना | 1997 | स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना | 1999 |
| जवाहर ग्राम समृद्धि योजना | 1999 | प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना | 2000-01 |
| अन्नपूर्णा योजना | 2000 | जनश्री बीमा योजना | 2000-01 |
| अन्त्योदय अन्न योजना | 2000 | आश्रय बीमा योजना | 2001-02 |
| जे.पी. रोजगार गारंटी योजना | 2002-03 | भारत निर्माण कार्यक्रम | 2005-06 |
| नरेगा (MGNREGA) | 2006 | – | – |
2. विशेष फोकस: मनरेगा (MGNREGA)
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प्रारंभ: 2 फरवरी, 2006 (अनंतपुर, आंध्र प्रदेश)।
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मूल नाम: राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (नरेगा)। 2 अक्टूबर 2009 को ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना’ किया गया।
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मुख्य विशेषताएं:
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रोजगार: प्रति परिवार 1 वर्ष में 100 दिन का रोजगार (कानूनी अधिकार)।
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भागीदारी: 33% महिलाओं की भागीदारी अनिवार्य।
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वित्तीय अनुपात: केंद्र और राज्य के बीच 90:10 का अनुपात।
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अन्य प्रावधान: 15 दिन में रोजगार न मिलने पर बेरोजगारी भत्ता, कार्यस्थल घर से 5 किमी के भीतर, 7 घंटे की कार्य अवधि।
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3. ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के सामाजिक एवं आधारभूत लक्ष्य
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साक्षरता: 7 वर्ष से अधिक आयु वर्ग में 85% साक्षरता।
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स्वास्थ्य: शिशु मृत्यु दर 28 और मातृ मृत्यु दर घटाना। प्रजनन दर 2.1 तक लाना।
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बुनियादी ढांचा: 2009 तक सभी गांवों में बिजली और सभी मौसमों के लिए पक्की सड़कें। 2012 तक ब्रॉडबैंड सुविधा।
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पर्यावरण: वनाच्छादन में 5% की वृद्धि और शहरी कचरे का उपचार।
4. नियोजन संस्थाएं एवं अन्य तथ्य
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योजना आयोग: नियोजन हेतु केंद्रीय निकाय (अध्यक्ष: प्रधानमंत्री)।
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राष्ट्रीय विकास परिषद (NDC): स्थापना 6 अगस्त 1952। यह योजनाओं का अंतिम अनुमोदन करती है। इसमें राज्यों के मुख्यमंत्री और योजना आयोग के सदस्य शामिल होते हैं।
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मॉडल: प्रथम पंचवर्षीय योजना ‘हैरॉड-डोमर मॉडल’ पर आधारित थी।
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दीर्घकालिक योजना: 15-20 वर्षों के लिए बनाई जाती है।
5. गरीबी का आकलन
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मापदंड: ऊर्जा उपभोग (कैलोरी) के आधार पर।
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ग्रामीण क्षेत्र: 2,400 कैलोरी/प्रतिदिन।
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शहरी क्षेत्र: 2,100 कैलोरी/प्रतिदिन।
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सांख्यिकीय स्थिति:
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निर्धनों की ‘निरपेक्ष संख्या’ में उत्तर प्रदेश प्रथम है।
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निर्धनता ‘अनुपात’ (प्रतिशत) में ओडिशा (46.4%) सर्वोच्च स्थान पर है।
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1. नई आर्थिक नीति का विकासक्रम
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प्रथम चरण (1985): राजीव गांधी के कार्यकाल में आर्थिक सुधारों की रूपरेखा तैयार की गई।
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द्वितीय चरण (1991): पी.वी. नरसिंह राव सरकार के दौरान ‘नई आर्थिक सुधार नीति’ लागू की गई। इसके मुख्य कारण खाड़ी युद्ध और भुगतान संतुलन (Balance of Payments) की गंभीर समस्या थी।
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तीन मुख्य आयाम: उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण।
2. 1991 की नीति के प्रमुख स्तंभ
1991 की नीति के तहत अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक सुधार किए गए:
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राजकोषीय नीति: सार्वजनिक व्यय पर नियंत्रण, कर राजस्व में वृद्धि, राजकोषीय अनुशासन और सब्सिडी में कटौती।
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औद्योगिक सुधार: 18 उद्योगों को छोड़कर बाकी सभी से लाइसेंसिंग अनिवार्य शर्त हटा दी गई। MRTP कंपनियों को विनियोग के लिए आयोग की अनुमति की अनिवार्यता से मुक्त किया गया।
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विदेशी विनियोग (FDI): उच्च प्राथमिकता वाले उद्योगों में तकनीकी संधियों और 51% तक विदेशी पूंजी निवेश के लिए स्वतः स्वीकृति दी गई।
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सार्वजनिक क्षेत्र नीति: आरक्षित उद्योगों की संख्या घटाकर सीमित की गई। रुग्ण इकाइयों के लिए औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड को कार्य सौंपा गया और श्रमिकों के लिए ‘स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजनाएं’ (VRS) शुरू की गईं।
3. महत्वपूर्ण संस्थागत एवं नीतिगत सुधार
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विनिवेश (Disinvestment): सरकारी भागीदारी घटाने की नीति 1991-92 में अपनाई गई। 1996 में विनिवेश कमीशन का गठन किया गया, जिसके पहले अध्यक्ष जी.वी. रामकृष्ण थे।
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राष्ट्रीय नवीकरण निधि (1992): रुग्ण इकाइयों के कारण विस्थापित हुए श्रमिकों की सहायता हेतु स्थापित।
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नवरत्न कंपनियां: विश्वस्तरीय क्षमता वाली सार्वजनिक कंपनियों को पूर्ण स्वायत्तता प्रदान की गई (कुल 20 कंपनियों की पहचान की गई थी)।
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आरक्षित उद्योग (वर्तमान स्थिति): अब केवल 3 क्षेत्र सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित हैं:
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परमाणु ऊर्जा
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रेल परिवहन
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परमाणु ऊर्जा की अनुसूची में निर्दिष्ट खनिज
(नोट: सुरक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र को रक्षा मंत्रालय के लाइसेंस के साथ प्रवेश की अनुमति है।)
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4. विदेशी निवेश की सीमा (2009 के आंकड़ों के अनुसार)
| क्षेत्र | FDI सीमा |
| 100% विदेशी निवेश | गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां, बन्दरगाह निर्माण, पर्यटन, दूरसंचार, लघु उद्योग, पेट्रोलियम (रिफाइनिंग), दवा उद्योग, कोयला खनन |
| 74% | निजी बैंकिंग क्षेत्र, नागरिक उड्डयन |
| 49% | सार्वजनिक बैंकिंग क्षेत्र, बीमा क्षेत्र |
| 26% | कोयला खनन |
5. अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
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निर्यात: 100% निर्यात मूलक इकाइयों में 100% विदेशी पूंजी निवेश की अनुमति दी गई है।
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द्वितीय चरण के सुधार: इनका मुख्य लक्ष्य 7-8% की वृद्धि दर, रोजगार सृजन और गरीबी उन्मूलन है।