1. विलयन (Solution): परिभाषा एवं घटक

परिभाषा: विलयन दो या दो से अधिक पदार्थों का वह समांग (Homogeneous) मिश्रण है, जिसमें किसी निश्चित ताप पर विलेय और विलायक की आपेक्षिक मात्राएँ एक निश्चित सीमा तक निरंतर परिवर्तित हो सकती हैं। यह स्थायी और पारदर्शक होता है। विलयन में विलेय के कणों की त्रिज्या 10-8 सेमी से कम होती है, इसलिए इन्हें सूक्ष्मदर्शी से भी नहीं देखा जा सकता।

विलयन के मुख्य घटक:

  • विलायक (Solvent): विलयन में जो पदार्थ अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में होता है। जिस विलायक का डाइइलेक्ट्रिक नियतांक (Dielectric Constant) जितना अधिक होता है, वह उतना ही अच्छा विलायक माना जाता है। जल का डाइइलेक्ट्रिक नियतांक अधिक होने के कारण इसे ‘सार्वत्रिक विलायक’ (Universal Solvent) कहा जाता है।
  • विलेय (Solute): विलयन में जो पदार्थ कम मात्रा में उपस्थित रहता है।

विलायक के उपयोग:

औषधियों के निर्माण में, निर्जल धुलाई (Dry Cleaning) में (पेट्रोलियम, बेंजीन, ईथर जैसे विलायकों का), इत्र निर्माण में तथा अनेक प्रकार के पेय व खाद्य पदार्थों के निर्माण में।

2. भौतिक अवस्था के आधार पर विलयन के प्रकार (9 रूप)

क्र.सं. विलयन का प्रकार उदाहरण
1 ठोस में ठोस का विलयन मिश्रधातुएं जैसे- पीतल (ताँबा में जस्ता)
2 ठोस में द्रव का विलयन पारा में लेड का विलयन, थैलियम में पारा का विलयन
3 ठोस में गैस का विलयन कपूर में वायु का विलयन
4 द्रव में ठोस का विलयन जल में नमक या चीनी का विलयन
5 द्रव में द्रव का विलयन जल में अल्कोहल का विलयन
6 द्रव में गैस का विलयन जल में कार्बन डाइऑक्साइड का विलयन (सोडा वाटर)
7 गैस में ठोस का विलयन धुआँ, वायु में आयोडीन का विलयन
8 गैस में द्रव का विलयन कुहरा, बादल, अमोनिया गैस का जल में विलयन
9 गैस में गैस का विलयन वायु (गैसों का मिश्रण)

3. विलेयता (Solubility) एवं सांद्रण

विलेयता की परिभाषा: किसी निश्चित ताप और दाब पर 100 ग्राम विलायक में घुलने वाली विलेय की अधिकतम मात्रा को उस विलेय पदार्थ की ‘विलेयता’ कहते हैं।

सूत्र: विलेयता = (विलेय की मात्रा × 100) / विलायक की मात्रा

विलेयता पर ताप और दाब का प्रभाव:

  • ठोस पदार्थों की विलेयता: सामान्यतः ताप बढ़ाने से बढ़ती है। (अपवाद: सोडियम सल्फेट, कैल्सियम हाइड्रॉक्साइड, कैल्सियम साइट्रेट आदि की विलेयता ताप बढ़ाने से घटती है)।
  • द्रव में गैस की विलेयता: ताप बढ़ने से घटती है, लेकिन दाब बढ़ाने पर द्रव में गैस की विलेयता बढ़ती है

सांद्रण के आधार पर विलयन के प्रकार:

  • संतृप्त विलयन (Saturated Solution): निश्चित ताप पर बना ऐसा विलयन जिसमें विलेय पदार्थ की और अधिक मात्रा नहीं घुलाई जा सकती (अधिकतम मात्रा घुली हो)।
  • असंतृप्त विलयन (Unsaturated Solution): ऐसा विलयन जिसमें विलेय पदार्थ की और अधिक मात्रा घुलाई जा सकती है। (सभी तनु विलयन असंतृप्त होते हैं)।
  • अतिसंतृप्त विलयन (Super Saturated Solution): जिसमें विलेय की मात्रा, उसे संतृप्त करने के लिए आवश्यक मात्रा से भी अधिक घुली हुई हो।
  • तनु विलयन (Dilute) व सांद्र विलयन (Concentrated): जिसमें विलेय की कम मात्रा हो वह तनु है, और जिसमें विलेय की पर्याप्त मात्रा घुली हो वह सांद्र विलयन है।

4. परिक्षेपण (Dispersion) एवं कोलाइड

जब किसी पदार्थ के कण (परमाणु, अणु या आयन) दूसरे पदार्थ के कणों के इर्द-गिर्द छितरा दिए जाते हैं तो यह क्रिया परिक्षेपण कहलाती है। इसके फलस्वरूप विषमांग (Heterogeneous – निलंबन व कोलॉइड) तथा समांग (Homogeneous – वास्तविक विलयन) पदार्थ बनते हैं।

निलंबन, कोलाइड और वास्तविक विलयन में अंतर:

  • निलंबन (Suspension): कणों का आकार 10-5 सेमी से 10-4 सेमी या इससे अधिक होता है। इन्हें नग्न आँखों से देखा जा सकता है। ये अस्थायी होते हैं और छन्ना-पत्र (Filter paper) के आर-पार नहीं जा सकते। (उदाहरण: नदी का गंदा पानी, वायु में धुआँ)।
  • कोलॉइड (Colloid): कणों का आकार 10-7 सेमी और 10-5 सेमी के बीच होता है। इन्हें केवल सूक्ष्मदर्शी से देखा जा सकता है। ये छन्ना-पत्र के पार जा सकते हैं पर चर्म-पत्र (Parchment paper) से नहीं। (उदाहरण: दूध, गोंद, रक्त, स्याही)।
  • वास्तविक विलयन (True Solution): इनके कण आणविक आकार वाले (10-7 से 10-8 सेमी) होते हैं। यह सबसे स्थायी और पारदर्शक होता है और फिल्टर पेपर से आसानी से पार हो जाता है।

कोलॉइड के विभिन्न प्रकार:

  • सोल (Sol): जिसमें ठोस कण द्रव में परिक्षेपित होते हैं। (जैसे- रबर सोल, जिससे विद्युत लेपन द्वारा रबर के दस्ताने बनते हैं)। नोट: जब परिक्षेपण का माध्यम जल, अल्कोहल या बेंजीन हो, तो इन्हें क्रमशः हाइड्रोसोल, अल्कोहॉल और बेंजोसोल कहते हैं।
  • जेल (Gel): जिसमें ठोस कण द्रव में समान रूप से परिक्षेपित होते हैं पर उनमें प्रवहता (Flow) नहीं होती। (जैसे- जेली और जिलेटिन)।
  • ऐरोसोल (Aerosol): किसी गैस में द्रव या ठोस कणों का परिक्षेपण। ठोस होने पर इसे धुआँ (Smoke) और द्रव होने पर कोहरा (Fog) कहा जाता है।
  • पायस (Emulsion): जब एक द्रव के सारे कण दूसरे द्रव में परिक्षेपित होते हैं पर घुलते नहीं हैं। दूध एक प्राकृतिक पायस है, जबकि पेंट एक कृत्रिम पायस है। साबुनों और डिटर्जेंट का प्रयोग बड़े पैमाने पर पायसीकारक (Emulsifier) के रूप में कपड़ों को धोने में किया जाता है।
  • झाग (Foams): द्रव में गैस का परिक्षेपण झाग कहलाता है (जैसे- साबुन का झाग)।

5. कोलाइडल विलयन के प्रमुख गुण एवं प्रक्रम

  • अपोहन (Dialysis): कोलाइडी विलयन को वास्तविक विलयन से पृथक करके शुद्ध करने की प्रक्रिया अपोहन कहलाती है।
  • ब्राउनी गति (Brownian Movement): कोलाइडी कणों का लगातार इधर-उधर (Zig-zag) भागना। कण जितने सूक्ष्म होंगे, माध्यम की श्यानता (Viscosity) जितनी कम होगी और ताप जितना अधिक होगा, यह गति उतनी ही तेज होगी।
  • स्कन्दन (Coagulation): कोलाइडी विलयन में कोई विद्युत अपघट्य (Electrolyte) मिलाने पर कणों का आवेश उदासीन हो जाता है और वे अवक्षेपित (जमा) हो जाते हैं।
  • टिंडल प्रभाव (Tyndall Effect): कोलाइडी विलयन से तीव्र प्रकाश गुजारने पर प्रकाश के प्रकीर्णन (Scattering) के कारण कोलाइडी कणों का पिन की नोक की भाँति चमकना। वास्तविक विलयन टिंडल प्रभाव नहीं दर्शाते।

6. बफर विलयन एवं सूचक (Indicators)

बफर विलयन (Buffer Solution): वह विलयन जो अम्ल या क्षार की साधारण मात्रा मिलाने पर भी अपनी प्रभावी अम्लता या क्षारता (pH मान) में परिवर्तन नहीं होने देता। जैसे- सोडियम एसीटेट और एसिटिक अम्ल का मिश्रण।

विभिन्न सूचकों का विलयन में रंग परिवर्तन:

सूचक (Indicator) अम्लीय विलयन क्षारीय विलयन उदासीन विलयन
मिथाइल ऑरेंज (Methyl Orange) गुलाबी पीला नारंगी
लिटमस (Litmus) लाल नीला बैंगनी
फिनॉल्फथैलिन (Phenolphthalein) रंगहीन गुलाबी रंगहीन
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