🦠 1. परजीवी (Protozoa) द्वारा होने वाले रोग
| रोग का नाम | प्रभावित अंग | परजीवी (Protozoa) | वाहक (Vector) | मुख्य लक्षण |
| 1. मलेरिया | तिल्ली (Spleen) एवं RBC | प्लाज्मोडियम | मादा एनाफलीज मच्छर | ठंड के साथ तेज बुखार। |
| 2. पायरिया | मसूढ़े | एन्ट अमीबा जिन्जिवेलिस | – | मसूढ़ों से रक्त का निकलना। |
| 3. सोने की बीमारी | मस्तिष्क | ट्रिपेनोसोमा | सी-सी (Tse-Tse) मक्खी | बहुत नींद के साथ तेज बुखार। |
| 4. पेचिस | आँत | एन्ट अमीबा हिस्टोलिटिका | – | श्लेष्मा (Mucus) एवं खून के साथ दस्त। |
| 5. काला-जार | अस्थि मज्जा (Bone Marrow) | लीशमैनिया डोनावानी | बालू-मक्खी (Sand Fly) | तेज बुखार। |
🔬 मलेरिया से जुड़े महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य:
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मेक्कुलाच (1827 ई०): सर्वप्रथम ‘मलेरिया’ शब्द का प्रयोग किया।
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लेवरन (1880 ई०): मलेरिया से पीड़ित व्यक्ति के रुधिर में मलेरिया परजीवी प्लाज्मोडियम की खोज की।
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रोनाल्ड रास (1887 ई०): मलेरिया परजीवी द्वारा मलेरिया होने की पुष्टि की तथा बताया कि मच्छर इसका वाहक है।
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जाँच: मलेरिया रोग की पहचान रक्त की बूँद तथा PF मामलों के लिए आर.डी. किट्स (RDK) एवं सूक्ष्मदर्शी जाँच द्वारा की जाती है।
🧫 2. जीवाणु (Bacteria) द्वारा होने वाले रोग
| रोग का नाम | प्रभावित अंग | जीवाणु का नाम | मुख्य लक्षण |
| 1. टिटनेस | तंत्रिका तंत्र | क्लॉस्ट्रीडियम टेटेनी | तेज बुखार, शरीर में ऐंठन, जबड़ा बंद होना (Lock Jaw)। |
| 2. हैजा (Cholera) | आँत | विब्रिओ कालेरी | लगातार दस्त और उल्टियाँ होना। |
| 3. टायफायड | आँत | सालमोनेला टाइफी | तेज बुखार और सिर दर्द होना। |
| 4. क्षय रोग (T.B.) | फेफड़ा | माइकोबैक्टिरियम ट्यूबरकुलोसिस | बार-बार खाँसी के साथ कफ और रक्त निकलना। |
| 5. डिप्थीरिया | श्वास नली | कोरीनी बैक्टीरियम डिप्थीरी | साँस लेने में कठिनाई एवं दम घुटना। |
| 6. प्लेग | फेफड़ा, दोनों पैरों के बीच | पाश्चुरेला पेस्टिस | बहुत तेज बुखार और शरीर पर गिल्टियाँ बनना। |
| 7. काली खाँसी | श्वसन तंत्र | हीमोफिलस परटूसिस | लगातार खाँसी आना। |
| 8. निमोनिया | फेफड़ा | डिप्लोकोकस न्यूमोनी | तेज बुखार और फेफड़ों में सूजन। |
| 9. कोढ़ (Leprosy) | तंत्रिका तंत्र और त्वचा | माइ科बैक्टिरियम लेप्री | शरीर पर चकत्ते पड़ना और तंत्रिकाएँ प्रभावित होना। |
| 10. गोनोरिया | मूत्र मार्ग | नाइसेरिया गोनोरियाई | मूत्र मार्ग में सूजन आना। |
| 11. सिफलिस | शिश्न (Penis) | ट्रैपोनमा पैलिडम | शिश्न में घाव होना। |
📌 विशेष नोट: > * 1882 ई० में जर्मन वैज्ञानिक रॉबर्ट कोच ने कॉलरा (हैजा) एवं टी० बी० के जीवाणुओं की खोज की थी।
लुई पाश्चर ने रेबीज का टीका एवं दूध का पाश्चुराइजेशन (Pasteurization) खोजा।
बच्चों को DPT का टीका उन्हें डिप्थीरिया, काली खाँसी (Pertussis) एवं टिटनेस रोग से सुरक्षा (प्रतिरक्षीकरण) के लिए दिया जाता है।
🧬 3. विषाणु (Virus) द्वारा होने वाली बीमारियाँ
| रोग का नाम | प्रभावित अंग | विषाणु (Virus) का नाम | मुख्य लक्षण |
| 1. एड्स (AIDS) | प्रतिरक्षा प्रणाली (WBC) | HIV | रोग प्रतिरोधक क्षमता का पूरी तरह नष्ट होना। |
| 2. डेंगू ज्वर | सम्पूर्ण शरीर (सिर, आँख, जोड़) | अर्बो वायरस | आँख, पेशियों, सिर तथा जोड़ों में तेज दर्द (हड्डी तोड़ बुखार)। |
| 3. पोलियो | गला, रीढ़, नाड़ी संस्थान | पोलियो वायरस | ज्वर, बदन दर्द; रीढ़ की हड्डी और आंत की कोशिकाएं नष्ट होना। |
| 4. इन्फ्लूएंजा | सम्पूर्ण शरीर | मिक्सो वायरस | गलशोथ, छींक और बेचैनी। |
| 5. चेचक (Smallpox) | सम्पूर्ण शरीर | वैरिला वायरस | तेज बुखार और शरीर पर लाल-लाल दाने निकलना। |
| 6. छोटी माता | सम्पूर्ण शरीर | वैरिसेला वायरस | हल्का बुखार और शरीर पर पित्तिकाएँ (Pustules) बनना। |
| 7. गलसोथ (Mumps) | पैराथायराइड ग्रंथि | – | ज्वर के साथ मुँह खोलने में कठिनाई होना। |
| 8. खसरा (Measles) | सम्पूर्ण शरीर | मोर्बिली वायरस | शरीर पर लाल दाने निकलना। |
| 9. ट्रेकोमा | आँख | – | आँखें लाल होना और आँखों में दर्द। |
| 10. पीलिया / हेपेटाइटिस | यकृत (Liver) | – | पेशाब, आँखें एवं त्वचा का रंग पीला हो जाना। |
| 11. रेबीज (Hydrophobia) | तंत्रिका तंत्र | रैब्डो वायरस | रोगी का पागल हो जाना, जीभ बाहर निकालना और पानी से डरना। |
| 12. मेनिनजाइटिस | मस्तिष्क | – | बहुत तेज बुखार आना। |
| 13. हर्पीस | त्वचा | हर्पीस वायरस | त्वचा में तेज सूजन और जलन होना। |
🩺 एड्स (AIDS) से संबंधित प्रमुख जाँच प्रणालियाँ:
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एलिसा टेस्ट (ELISA): HIV वायरस की जाँच करने की प्राथमिक प्रणाली है।
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वेस्टर्न ब्लॉट टेस्ट: यह HIV संक्रमण की विशेष व पुख्ता जाँच है।
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HIV P-24 एंटीजन (PCR): इससे रोग के शुरुआती 28 दिनों के भीतर ही स्पष्ट जानकारी मिल जाती है।
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CD-4 काउंट: इस परीक्षण से रोगी की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) का आकलन किया जाता है।
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न्यूक्लिक एसिड टेस्ट (NAT): यह सीधे वायरस के जेनेटिक तत्व (RNA/DNA) का पता लगाती है। यह ब्लड डोनर के रक्त में एक सप्ताह पुराने न्यूनतम स्तर के संक्रमण को भी पकड़ सकती है।
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उपचार: एड्स के मरीजों के लिए एंटीरैट्रोवाइरल थेरेपी (ART) सेवाएँ 1 अप्रैल, 2004 से शुरू की गई थीं। वर्तमान में इसके उपचार के लिए एजिडोथाईमिडिन (AZT) औषधि का प्रयोग किया जा रहा है।
🦟 डेंगू और चिकनगुनिया से जुड़े तथ्य:
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डेंगू ज्वर: यह मादा एडीज एजिप्टी मच्छर के काटने से फैलता है। भारत में इसका पहला मामला 1963 ई० में कोलकाता में आया था।
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चिकनगुनिया: यह चिकनगुनिया वायरस से होने वाली गैर-घातक लेकिन शरीर को दुर्बल बनाने वाली बीमारी है। यह भी मादा एडीज एजिप्टी मच्छर के काटने से फैलती है। भारत में 36 वर्ष बाद 2006 में इसका पुनः प्रकोप देखा गया था। (यह बीमारी संक्रमित व्यक्ति से सीधे दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलती)।
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पोलियो वैक्सीन: इसका विकास 1952 में जोनस साल्क ने और 1962 में अल्बर्ट साबिन (ओरल वैक्सीन) ने किया। पोलियो वायरस के तीन प्रकार (Type-1, 2, 3) होते हैं, जिनमें अधिकांश मरीज टाइप-3 के होते हैं।
🪱 4. कृमि और कवक (Helminthus & Fungus) द्वारा होने वाली बीमारियाँ
क. हेल्मिन्थस (कृमि) जनित रोग:
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अतिसार (Diarrhoea): यह रोग आँत में मौजूद एस्केरिस लुम्बीकॉइडीज नामक अंतःपरजीवी के कारण होता है, जो घरेलू मक्खी द्वारा फैलता है। इसमें आँत में घाव हो जाते हैं और प्रोटीन पचाने वाला इन्जाइम ट्रिप्सिन नष्ट हो जाता है। यह बच्चों में अधिक होता है।
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फाइलेरिया (Filaria): यह फाइलेरिया बैन्क्रोफ्टाई नामक कृमि से होता है, जिसका संचारण क्यूलेक्स (Culex) मच्छरों के काटने से होता है। इस रोग में पैरों और वृषणकोषों में अत्यधिक सूजन आ जाती है, इसीलिए इसे हाथीपांव (Elephantiasis) भी कहते हैं।
ख. फफूँद (Fungus/कवक) जनित रोग:
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दमा (Asthma): ऐस्पर्जिलस फ्यूमिगेटस नामक कवक के बीजाणु फेफड़ों में पहुँचकर जाल बना लेते हैं और फेफड़ों का कार्य अवरुद्ध कर देते हैं।
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एथलीट फुट (Athlete’s Foot): यह टीनिया पेडिस नामक कवक से त्वचा के फटने, कटने और मोटे होने से होता है (पैरों का संक्रामक रोग)।
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खाज (Scabies): यह एकेरस स्केबीज नामक कवक से होता है। इसमें त्वचा में खुजली होती है और सफेद दाग पड़ जाते हैं।
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गंजापन (Baldness): यह टिनिया केपिटिस नामक कवक के कारण होता है, जिससे सिर के बाल गिर जाते हैं।
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दाद (Ringworm): यह ट्राइकोफायटान लेरूकोसम नामक कवक से फैलने वाला संक्रामक रोग है, जिसमें त्वचा पर लाल रंग के गोलाकार चकत्ते पड़ जाते हैं।
🧬 5. मनुष्यों में होने वाले आनुवंशिक रोग (Genetic Diseases)
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वर्णान्धता (Colour Blindness): * इसमें रोगी को लाल एवं हरा रंग पहचानने की क्षमता नहीं होती।
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इससे मुख्य रूप से पुरुष प्रभावित होते हैं। स्त्रियाँ इसकी वाहक (Carrier) होती हैं और वे तभी ग्रसित होती हैं जब उनके दोनों गुणसूत्र (XX) प्रभावित हों।
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हीमोफीलिया (Haemophilia):
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इस रोग में चोट लगने पर आधे घंटे से लेकर 24 घंटे तक रक्त का थक्का (Blood Clot) नहीं बनता।
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यह मुख्यतः पुरुषों में होता है और स्त्रियाँ इसकी वाहक होती हैं। वैज्ञानिक हेल्डेन के अनुसार यह रोग ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया से प्रारंभ हुआ था।
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टर्नर सिन्ड्रोम (Turner’s Syndrome):
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यह रोग केवल स्त्रियों में होता है। इनमें गुणसूत्रों (Chromosomes) की संख्या घटकर 45 रह जाती है।
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लक्षण: कद छोटा, वक्ष चपटा और जननांग अविकसित होते हैं, जिससे स्त्रियाँ बांझ (Sterile) होती हैं।
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क्लीनेफेल्टर सिन्ड्रोम (Klinefelter’s Syndrome):
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यह रोग केवल पुरुषों में होता है। इनमें गुणसूत्रों की संख्या बढ़कर 47 हो जाती है।
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लक्षण: पुरुषों का वृषण अल्पविकसित रह जाता है एवं स्तन स्त्रियों के समान विकसित हो जाते हैं, जिससे पुरुष नपुंसक होते हैं।
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डाउन्स सिन्ड्रोम (Down’s Syndrome):
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इससे ग्रसित रोगी मंदबुद्धि, आँखें टेढ़ी, जीभ मोटी और अनियमित शारीरिक ढाँचे वाला होता है। इसे मंगोलिज्म (Mongolism) भी कहते हैं।
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पटाऊ सिन्ड्रोम (Patau’s Syndrome):
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इसमें रोगी का ऊपर का होंठ बीच से कट जाता है और तालु में दरार (Cleft Palate) आ जाती है। रोगी मंदबुद्धि और नेत्ररोग से ग्रसित हो सकता है।
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🧠 6. कुछ अन्य प्रमुख रोग
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पक्षाघात या लकवा (Paralysis): शरीर के आधे भाग की तंत्रिकाएं निष्क्रिय हो जाती हैं। इसका कारण उच्च रक्तचाप (High BP) की वजह से मस्तिष्क की किसी धमनी का फट जाना या मस्तिष्क को पर्याप्त रक्त न मिलना है।
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एलर्जी (Allergy): धूल, धुआँ, रसायन, ठंड आदि के प्रति शरीर की विपरीत और संवेदनशील क्रिया। इसके लक्षणों में खुजली, फोड़ा-फुंसी, सूजन, एक्जिमा आदि शामिल हैं।
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साइजोफ्रेनिया (Schizophrenia): यह एक मानसिक रोग है जो युवाओं में होता है। रोगी कल्पना को ही सच मानता है और वास्तविकता से कट जाता है। इसके उपचार में ‘विद्युत् आक्षेप चिकित्सा’ (ECT) सहायक होती है।
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मिर्गी (Epilepsy): इसे ‘अपस्मार रोग’ भी कहते हैं जो मस्तिष्क के आंतरिक रोगों के कारण होता है। दौरे के समय मुँह से झाग निकलता है।
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डिप्लोपिया (Diplopia): यह आँख की मांसपेशियों के पक्षाघात (Paralysis) के कारण होने वाला रोग है जिसमें वस्तुएं दो-दो दिखाई देती हैं।
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कैंसर (Cancer): शरीर के किसी भी अंग में कोशिकाओं की अनियंत्रित और अनियमित वृद्धि से बने गुच्छे (Tumor) को कैंसर कहते हैं। कैंसर स्थापित होने के समय को लैटेण्ड पीरियड कहते हैं।
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कैंसर के प्रकार: 1. कार्सीनोमास: उपकला ऊतकों (Epithelial tissues) से उत्पत्ति।
2. सार्कोमास: संयोजी ऊतकों, हड्डियों, उपास्थियों एवं पेशियों का कैंसर।
3. ल्यूकीमियास: ल्यूकोसाइट्स (WBC) में असामान्य वृद्धि (ब्लड कैंसर)।
4. लिम्फोमास: लसीका गाँठों (Lymph nodes) एवं प्लीहा का कैंसर।
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नोट: रेडियोएक्टिव स्ट्रॉन्शियन-90 ($^{90}\text{Sr}$) के कारण अस्थि (हड्डी) का कैंसर हो जाता है।
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नोट: इटाई-ईटाई रोग पानी में कैडमियम ($\text{Cd}$) प्रदूषण के कारण होता है।
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🗓️ 7. प्रमुख राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रम और उनका शुरुआत वर्ष
| स्वास्थ्य कार्यक्रम का नाम | शुरुआत का वर्ष |
| राष्ट्रीय तपेदिक (T.B.) नियंत्रण कार्यक्रम | 1955 |
| राष्ट्रीय आयोडीन अल्पता विकार नियंत्रण कार्यक्रम | 1962 |
| राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण कार्यक्रम | 1975-76 |
| राष्ट्रीय दृष्टिहीनता नियंत्रण कार्यक्रम | 1976 |
| राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम | 1982 (नोट: मूल पाठ में 1992 त्रुटिवश अंकित था) |
| राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम | 1992 |
| प्रजनन एवं बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम | 1997-98 |
| पल्स पोलियो कार्यक्रम | 1997-98 |
| समन्वित रोग निगरानी परियोजना | 1997-98 |
| वन्दे मातरम् योजना | 2004 |
| जननी सुरक्षा योजना | 2003-04 |
| राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (NRHM) | 2005 |
📊 टीकाकरण कार्यक्रम (Immunization Schedule)
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जन्म के समय: BCG (बेसिलस काल्मेट्टर-ग्यूरिन) का टीका; जो तपेदिक (टीबी) से 70% तक सुरक्षा देता है। साथ ही OPV (ओरल पोलियो वैक्सीन) की जन्म खुराक।
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6, 10, 14 सप्ताह और 16-24 माह: DPT (डिप्थीरिया, पट्यूसिस/काली खाँसी, टेटनस) और OPV की खुराक (90-99% सुरक्षा)।
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9-12 माह की आयु: खसरा (Measles) का टीका (100% सुरक्षा)।
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5 वर्ष की आयु: DT (डिप्थीरिया और टेटनस टोक्सोइड) बूस्टर।
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10 वर्ष और 16 वर्ष की आयु: TT (टेटनस टोक्सोइड) का टीका।
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गर्भवती महिलाओं के लिए: TT के दो टीके (या यदि 3 वर्ष के भीतर टीका लगा हो तो केवल एक बूस्टर खुराक)।