दिए गए पाठ्य-सामग्री (Lucent General Knowledge) के आधार पर मानव शरीर के प्रमुख तंत्रों और उनकी संपूर्ण कार्यप्रणाली की सुव्यवस्थित एवं विस्तृत प्रस्तुति नीचे दी गई है:

मानव शरीर के प्रमुख तंत्र (Human Body Systems)

1. पाचन-तंत्र (Digestive System)

भोजन के पाचन की संपूर्ण प्रक्रिया पाँच अवस्थाओं से गुजरती है:

  1. अन्तर्ग्रहण (Ingestion): भोजन को शरीर के भीतर ले जाना।

  2. पाचन (Digestion): जटिल भोज्य पदार्थों को सरल रूपों में तोड़ना।

  3. अवशोषण (Absorption): पचे हुए भोजन का रुधिर (रक्त) में पहुँचना। यह छोटी आँत की रचना उद्धर्घ (Villi) के द्वारा होता है।

  4. स्वांगीकरण (Assimilation): अवशोषित भोजन का शरीर के उपयोग में लाया जाना।

  5. मल परित्याग (Defecation): अपच भोजन बड़ी आँत में पहुँचता है जहाँ जीवाणु इसे मल में बदल देते हैं, जिसे गुदा (Anus) द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है।

A. विभिन्न अंगों में पाचन की प्रक्रिया

  • अमाशय (Stomach) में पाचन:

    • भोजन अमाशय में लगभग 4 घंटे तक रहता है।

    • भोजन पहुँचने पर पाइलोरिक ग्रंथियों से जठर रस (Gastric juice) निकलता है, जो हल्के पीले रंग का अम्लीय द्रव होता है।

    • अमाशय की ऑक्सिन्टिक कोशिकाओं से हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl) निकलता है। यह जीवाणुओं को नष्ट करता है, एन्जाइम की क्रिया को तीव्र करता है और माध्यम को अम्लीय बनाता है (जिससे लार की टायलिन क्रिया समाप्त हो जाती है)।

  • पक्वाशय (Duodenum) में पाचन:

    • यहाँ सर्वप्रथम यकृत से आने वाला पित्तरस (Bile) मिलता है। पित्त क्षारीय होता है और भोजन को अम्लीय से क्षारीय बनाता है।

    • यहाँ अग्न्याशय से अग्न्याशयी रस आकर मिलता है, जिसे पूर्ण पाचक रस कहा जाता है क्योंकि इसमें तीनों मुख्य भोज्य पदार्थों को पचाने वाले एन्जाइम होते हैं।

  • छोटी आँत (Small Intestine) में पाचन:

    • यहाँ भोजन के पाचन की क्रिया पूर्ण होती है और पचे भोजन का अवशोषण होता है। इसकी दीवारों से क्षारीय आंत्रिक रस निकलता है (स्वस्थ मनुष्य में प्रतिदिन लगभग 2 लीटर)।

B. पाचन कार्य में भाग लेने वाले प्रमुख अंग

  • यकृत (Liver):

    • यह मानव शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है (वजन: 1.5 – 2 kg)।

    • पित्त (Bile) का स्राव करता है। विषैली अमोनिया को यूरिया में बदलता है।

    • रक्त के अतिरिक्त ग्लूकोज को ग्लाइकोजिन में बदलकर संचित रखता है (ब्लड शुगर नियमित करना)।

    • रक्त का थक्का बनाने वाले फाइब्रिनोजेन और शरीर के अंदर रक्त को जमने से रोकने वाले हिपैरीन प्रोटीन का उत्पादन करता है।

    • मृत RBC को नष्ट करता है तथा लोहा, ताँबा और विटामिन्स संचित रखता है। जहर देकर मारे गए व्यक्ति की जाँच में यकृत एक महत्त्वपूर्ण सुराग होता है।

  • पित्ताशय (Gall-bladder):

    • नाशपाती के आकार की थैली जिसमें यकृत से निकला पित्त जमा रहता है।

    • पित्त का pH मान 7.7 (क्षारीय) होता है। इसमें 85% जल और 12% पित्त वर्णक होते हैं। यह वसा का इमाल्सीकरण (Emulsification) करता है।

    • पित्तवाहिनी में अवरोध होने पर पीलिया (Jaundice) रोग हो जाता है।

  • अग्न्याशय (Pancreas):

    • यह मानव शरीर की दूसरी सबसे बड़ी ग्रंथि है। यह एक साथ अन्तःस्रावी और वहिःस्रावी दोनों प्रकार की ग्रंथि है। इसका pH मान 7.5 – 8.3 होता है।

    • लैंगर हैंस की द्वीपिका (Islets of Langerhans): अग्न्याशय का भाग है। इसकी $\beta$-कोशिका से इन्सुलिन, $\alpha$-कोशिका से ग्लूकॉन और $\gamma$-कोशिका से सोमेटोस्टेटिन हार्मोन निकलता है।

    • इन्सुलिन की खोज: बैटिंग एवं वेस्ट ने 1921 में की। इसकी कमी से मधुमेह (डाइबीटिज) और अतिस्रवण से हाइपोग्लाइसीमिया (जनन क्षमता व दृष्टि कम होना) रोग होता है।

C. पाचन का सारांश (प्रमुख पाचक रस और एन्जाइम)

ग्रंथि/रस एन्जाइम क्रिया (किस पर) परिणाम (प्रतिक्रिया के बाद)
1. लार

(i) टायलिन


(ii) माल्टेस

माँड (श्वेत सार)


माल्टोस

माल्टोस


ग्लूकोस

2. जठर रस

(i) पेप्सिन


(ii) रेनिन

प्रोटीन


केसीन (दूध प्रोटीन)

पेप्टोन्स


कैल्शियम पैराकैसीनेट

3. अग्न्याशयी रस

(i) ट्रिप्सिन


(ii) एमाइलेज


(iii) लाइपेज

प्रोटीन एवं पेप्टोन


माँड (Starch)


वसा

पॉलीपेप्टाइड्स व अमीनो अम्ल


शर्करा


वसा अम्ल एवं ग्लिसरॉल

4. आन्त्रीय रस

(i) इरेप्सिन


(ii) माल्टेस


(iii) लैक्टेस


(iv) सुक्रेस


(v) लाइपेज

शेष प्रोटीन व पेप्टोन


माल्टोस


लैक्टोस


सुक्रोस


वसा

अमीनो अम्ल


ग्लूकोज


ग्लूकोज एवं गैलेक्टोस


ग्लूकोज एवं फ्रुक्टोज


वसीय अम्ल एवं ग्लिसरॉल

2. परिसंचरण तंत्र (Circulatory System)

  • रक्त परिसंचरण की खोज सन् 1628 ई० में विलियम हार्वे ने की थी। इसके चार मुख्य भाग हैं: हृदय, धमनियाँ, शिराएँ और रुधिर।

A. हृदय (Heart)

  • यह ह्रदयावरण (Pericardium) नामक थैली में सुरक्षित रहता है। वजन लगभग 300 ग्राम होता है।

  • मनुष्य का हृदय चार कोष्ठों (Chambers) का बना होता है: दो आलिंद (ऊपरी भाग) और दो निलय (निचला भाग)।

  • दाएँ आलिंद और दाएँ निलय के बीच त्रिवलनी कपाट (Tricuspid valve) तथा बाएँ आलिंद और बाएँ निलय के बीच द्विवलनी कपाट (Bicuspid valve) होता है।

  • हृदय के दाहिने भाग में अशुद्ध ($\text{CO}_2$ युक्त) और बाएँ भाग में शुद्ध ($\text{O}_2$ युक्त) रक्त रहता है।

  • हृदय की मांसपेशियों को रक्त पहुँचाने वाली वाहिनी को कोरोनरी धमनी कहते हैं, जिसमें रुकावट आने पर हृदयाघात (Heart Attack) होता है।

B. धमनी और शिरा में अंतर

  • शिरा (Vein): शरीर से हृदय की ओर रक्त ले जाती है। इसमें अशुद्ध रक्त होता है। (अपवाद: पल्मोनरी शिरा, जो फेफड़े से बाएँ आलिंद में शुद्ध रक्त लाती है)

  • धमनी (Artery): हृदय से शरीर की ओर रक्त ले जाती है। इसमें शुद्ध रक्त होता है। (अपवाद: पल्मोनरी धमनी, जो दाहिने निलय से फेफड़े में अशुद्ध रक्त ले जाती है)

C. हृदय में रुधिर का मार्ग

$$\text{बाँया आलिंद} \rightarrow \text{बाँया निलय} \rightarrow \text{दैहिक महाधमनी} \rightarrow \text{विभिन्न धमनियाँ} \rightarrow \text{छोटी धमनियाँ (Arteriole)} \rightarrow \text{कोशिकाएँ} \rightarrow \text{अंग} \rightarrow \text{अग्र एवं पश्च महाशिरा} \rightarrow \text{दाहिना आलिंद} \rightarrow \text{दाहिन निलय} \rightarrow \text{पल्मोनरी धमनी} \rightarrow \text{फेफड़ा} \rightarrow \text{पल्मोनरी शिरा} \rightarrow \text{बायें आलिंद (शुद्ध रुधिर)}$$

D. प्रमुख तथ्य

  • हृदय के संकुचन (Systole) एवं शिथिलन (Diastole) को मिलाकर हृदय की धड़कन कहते हैं। सामान्य मनुष्य का हृदय 1 मिनट में 72 बार (भ्रूण में 150 बार) धड़कता है और एक धड़कन में 70 मिली० रक्त पम्प करता है।

  • धड़कन की तरंग दाहिने आलिंद में स्थित साइनो-ऑरिकुलर नोड (SAN) से प्रारंभ होती है।

  • सामान्य मनुष्य का रक्त दाब 120/80 mmHg होता है (सिस्टोलिक-120, डायस्टोलिक-80)। इसे स्फिग्मोमेनोमीटर से मापा जाता है।

  • रुधिर में $\text{CO}_2$ बढ़ने से (अम्लीयता बढ़ने से) हृदय की गति बढ़ती है और क्षारीयता से कम होती है।

3. लसिका परिसंचरण तंत्र (Lymph Circulatory System)

  • ऊतकों और कोशिकाओं के बीच स्थित अंतराकोशिकीय अवकाशों में पाए जाने वाले हल्के पीले द्रव को लसीका (Lymph) कहते हैं। यह केवल एक ही दिशा में (ऊतक से हृदय की ओर) बहता है।

  • इसमें पाई जाने वाली कणिकाएँ लिम्फोसाइट्स (WBC) कहलाती हैं, जो हानिकारक जीवाणुओं का भक्षण करके रोगों की रोकथाम करती हैं और घाव भरने में सहायता करती हैं।

  • लिम्फ नोड शरीर में छन्ने का कार्य करते हैं, जहाँ धूल के कण, जीवाणु और कैंसर कोशिकाएँ फँस जाती हैं।

4. उत्सर्जन तंत्र (Excretory System)

  • शरीर से उपापचयी प्रक्रमों में बने विषैले नाइट्रोजनी अपशिष्ट पदार्थों (जैसे यूरिया, अमोनिया, यूरिक अम्ल) को बाहर निकालना उत्सर्जन कहलाता है।

  • मनुष्य के प्रमुख उत्सर्जी अंग: वृक्क (मुख्य), त्वचा (सीबम व पसीना), यकृत (अमोनिया को यूरिया में बदलना), फेफड़ा ($\text{CO}_2$ व जलवाष्प का उत्सर्जन)।

A. वृक्क (Kidneys)

  • एक जोड़ा वृक्क होता है, जिसका वजन 140 ग्राम होता है। इसके दो भाग होते हैं: बाहरी भाग कोर्टेक्स (Cortex) और भीतरी भाग मेडुला (Medulla)

  • प्रत्येक वृक्क लगभग 1.3 करोड़ वृक्क नलिकाओं से बना है, जिन्हें नेफ्रॉन (Nephron) कहते हैं। नेफ्रॉन ही वृक्क की कार्यात्मक इकाई है।

  • नेफ्रॉन में एक प्यालीनुमा रचना बोमेन सम्पुट (Bowman’s capsule) होती है, जिसमें कोशिकाओं का गुच्छ ग्लोमेरुलस (Glomerulus) पाया जाता है। यहाँ परानिस्पंदन (Ultrafiltration) की क्रिया होती है।

  • वृक्क में प्रति मिनट औसतन 125 मिली (दिन भर में 180 लीटर) रक्त निस्पंद होता है, जिसमें से प्रतिदिन 1.45 लीटर मूत्र बनता है, बाकी रक्त में पुनः अवशोषित हो जाता है।

  • मूत्र की विशेषताएँ: सामान्य मूत्र में 95% जल, 2% लवण, 2.7% यूरिया और 0.3% यूरिक अम्ल होता है। इसका हल्का पीला रंग हीमोग्लोबिन के विखंडन से बने यूरोक्रोम (Urochrome) के कारण होता है। मूत्र अम्लीय होता है (pH मान = 6)।

  • वृक्क में बनने वाली पथरी कैल्शियम ऑक्जलेट की बनी होती है।

B. विभिन्न जन्तु एवं उनके उत्सर्जी अंग

  • एक कोशिकीय जन्तु: विसरण द्वारा

  • पोरीफेरा संघ: विशिष्ट नलिकातंत्र द्वारा

  • सीलेन्ट्रेट्स: सीधे कोशिकाओं द्वारा

  • चपटे कृमि: ज्वाला कोशिकाओं (Flame cells) द्वारा

  • एनेलिडा संघ: वृक्क (Nephridia) द्वारा

  • आर्थोपोड्स: मैल्पीधियन नलिकाओं द्वारा

  • मोलस्का: मूत्र अंग द्वारा

  • कशेरुकी (Vertebrates): मुख्यतया वृक्क (Kidney) द्वारा

5. तंत्रिका तंत्र (Nervous System)

तंत्रिका तंत्र वातावरणीय परिवर्तनों की सूचनाएँ विद्युत आवेगों (Electrical impulses) के रूप में प्रसारित करता है। मनुष्य का तंत्रिका तंत्र तीन भागों में विभक्त होता है:

1. केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र (Central Nervous System – CNS)

यह संपूर्ण शरीर और स्वयं तंत्रिका तंत्र पर नियंत्रण रखता है। इसके दो भाग हैं:

  • (i) मस्तिष्क (Brain): यह क्रेनियम (Cranial cavity) में बन्द रहता है और इसका वजन 1400 ग्राम होता है। इसके विभिन्न भागों के कार्य निम्न हैं:

    • सेरीब्रम (Cerebrum): मस्तिष्क का सबसे विकसित भाग; बुद्धिमत्ता, स्मृति, इच्छा-शक्ति, ऐच्छिक गतियों और चिन्तन का केन्द्र।

    • थैलमस (Thalamus): दर्द, ठण्डा तथा गरम पहचानने का कार्य।

    • हाइपोथैलमस (Hypothalamus): अन्तःस्रावी ग्रंथियों के हार्मोन का नियंत्रण; भूख, प्यास, ताप नियंत्रण, प्यार, घृणा, रक्तदाब, पसीना और गुस्से का केन्द्र। (नोट: मस्तिष्क की जाँच के लिए EEG का प्रयोग होता है)

    • कारपोरा क्वार्डिजेमिना: दृष्टि एवं श्रवण शक्ति (देखने-सुनने) पर नियंत्रण।

    • सेरीब्रल पेन्डकल (करा सेरीब्री): मस्तिष्क के अन्य भागों को मेरुरज्जू से जोड़ता है।

    • सेरीबेलम (Cerebellum): शरीर का सन्तुलन बनाए रखना एवं ऐच्छिक पेशियों के संकुचन पर नियंत्रण।

    • मेड्यूला ऑब्लोंगेटा: मस्तिष्क का सबसे पिछला भाग; उपापचय, रक्तदाब, आहारनाल के क्रमाकुंचन और हृदय की धड़कन का नियंत्रण।

  • (ii) मेरुरज्जू (Spinal Cord): मेड्यूला ऑब्लोंगेटा का पिछला भाग ही मेरुरज्जू बनता है। यह प्रतिवर्ती क्रियाओं (Reflex Actions) का नियंत्रण एवं समन्वय करता है। (प्रतिवर्ती क्रियाओं का पता सर्वप्रथम मार्शल हाल ने लगाया था)

2. परिधीय तंत्रिका तंत्र (Peripheral Nervous System)

यह मस्तिष्क और मेरुरज्जू से निकलने वाली तंत्रिकाओं से बनता है। मनुष्य में 12 जोड़ी कपाल तंत्रिकाएँ (Cranial nerves) और 31 जोड़ी मेरुरज्जू तंत्रिकाएँ (Spinal nerves) पाई जाती हैं। तंत्रिका ऊतक की इकाई को न्यूरॉन (Neuron) कहते हैं। नॉर एड्रिनलिन एक न्यूरोट्रांसमिटर पदार्थ है।

3. स्वायत्त तंत्रिका तंत्र (Autonomic Nervous System)

इसकी अवधारणा सबसे पहले लैंगली ने 1921 ई० में दी। इसके दो भाग हैं:

  • (i) अनुकम्पी तंत्रिका तंत्र (Sympathetic): यह संकटकालीन परिस्थितियों में सक्रिय होता है। इसके कार्य: त्वचा की रुधिर वाहिनियों को सिकोड़ना, बाल खड़े करना, लार स्राव कम करना, हृदय स्पंदन व श्वसन दर तेज करना, आँख की पुतली फैलाना, रक्त दाब और ब्लड शुगर बढ़ाना। यह भय, पीड़ा तथा क्रोध के समय सामूहिक प्रभाव दिखाता है।

  • (ii) परानुकम्पी तंत्रिका तंत्र (Parasympathetic): इसका कार्य अनुकम्पी के विपरीत होता है और यह आराम व सुख की स्थितियाँ उत्पन्न करता है। इसके कार्य: लार व पाचक रसों में वृद्धि, नेत्र की पुतली का संकुचन, रुधिर वाहिनियों की गुहा को चौड़ा करना।

6. कंकाल तंत्र (Skeleton System)

मनुष्य का कंकाल तंत्र दो भागों का बना होता है:

A. अक्षीय कंकाल (Axial Skeleton)

शरीर का मुख्य अक्ष बनाने वाला कंकाल। इसके अंतर्गत आती हैं:

  • खोपड़ी (Skull): कुल 29 अस्थियाँ होती हैं। (कपाल/Cranium में 8, चेहरे/Facial में 14, कान में 6, और 1 हॉयड अस्थि)।

  • कशेरुक दण्ड (Vertebral Column): यह 33 कशेरुकाओं से मिलकर बना है। इसका पहला कशेरुक एटलस कशेरुक (Atlas vertebra) खोपड़ी को साधे रहता है। यह मेरुरज्जू को सुरक्षा देता है और धड़ को लचक प्रदान करता है।

कशेरुक दण्ड का विभाजन:

गर्दन (Cervical): 7 | वक्ष (Thoracic): 12 | कटि (Lumbar): 5 | त्रिक (Sacral): 5 | पुच्छ (Caudal): 4 = योग: 33

B. उपांगीय कंकाल (Appendicular Skeleton)

इसमें पाद अस्थियाँ (दोनों हाथ-पैर मिलाकर कुल 118 अस्थियाँ) और मेखलाएँ (अंश मेखला और श्रेणी मेखला) आती हैं जो हाथ-पैर को अक्षीय कंकाल से जोड़ती हैं।

कंकाल तंत्र से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य

  • मनुष्य के शरीर में कुल हड्डियों की संख्या 206 होती है (बाल्यावस्था में 208)।

  • रीढ़ की कुल हड्डियों की संख्या प्रारंभ में 33 होती है, जो विकसित होने पर 26 रह जाती हैं। पसलियों की कुल संख्या 24 है।

  • शरीर की सबसे बड़ी हड्डी फीमर (जांघ की हड्डी) और सबसे छोटी हड्डी स्टेप्स (कान की हड्डी) है।

  • जोड़ (Joints): मांसपेशी और अस्थि के जोड़ को टेण्डन (Tendon) तथा अस्थि से अस्थि के जोड़ को लिगामेंट्स (Ligaments) कहते हैं।

विशेष स्थानों की अस्थियों की संख्या:

कान (मैलियस-2, इन्कस-2, स्टेप्स-2) = 6 | ऊपरी बाहु (ह्यूमरस) = 2 | अग्रबाहु (रेडियो अलना) = 2 | कलाई (कार्पल्स) = 16 | हथेली (मेटाकार्पल्स) = 10 | अंगुलियाँ (फैलेन्जेज) = 28 | जांघ (फीमर) = 2 | पिंडली (टिबियो फिबुला) = 4 | घुटना (पटेला) = 2 | टखना (टार्सल) = 14 | तलवा (मेटाटार्सल्स) = 10।

7. अन्तःस्रावी तंत्र (Endocrine System)

ग्रंथियाँ मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं:

  • (a) बहिःस्रावी ग्रंथियाँ (Exocrine): नलिकायुक्त होती हैं और इनसे एन्जाइम का स्राव होता है (जैसे: दुग्ध, स्वेद, अश्रु, लार ग्रंथि)।

  • (b) अन्तःस्रावी ग्रंथियाँ (Endocrine): नलिकाविहीन होती हैं और इनसे हार्मोन का स्राव होता है जो रक्त प्लाज्मा द्वारा शरीर में पहुँचता है।

प्रमुख अन्तःस्रावी ग्रंथियाँ और उनके हार्मोन

  1. पीयूष ग्रंथि (Pituitary Gland):

    • यह कपाल की स्फेनाइड हड्डी के गड्ढे (सेल टर्सिका) में स्थित होती है। भार 0.6 ग्राम होता है। इसे मास्टर ग्रंथि भी कहते हैं।

    • प्रमुख हार्मोन: STH (हड्डियों की वृद्धि नियंत्रण; अधिकता से भीमकायत्व और कमी से बौनापन); TSH (थाइरॉइड को प्रेरित करना); ACTH; GTH (FSH और LH – जनन अंगों का नियंत्रण); LTH (स्तनों में दुग्ध स्राव); ADH (जल संतुलन व रक्तदाब नियंत्रण)।

  2. अवटु ग्रंथि (Thyroid Gland):

    • गले में ट्रेकिया के दोनों ओर होती है। इससे थाइरॉक्सिन हार्मोन निकलता है जिसमें आयोडीन अधिक होता है।

    • कमी से रोग: जड़मानवता (बच्चों में मानसिक-शारीरिक विकास रुकना), मिक्सिडीमा, हाइपोथाइरॉयडिज्म, और घेघा (Goitre – आयोडीन की कमी से)

    • अधिकता से रोग: टॉक्सिक ग्वाइटर (हृदय गति बढ़ना) और एक्सौफ्थैलमिया (आँखें नेत्रकोटर से बाहर आना)।

  3. पराअवटु ग्रंथि (Parathyroid Gland):

    • थाइरॉइड के ठीक पीछे होती है। इससे निकलने वाले हार्मोन (पैराथाइरॉइड हार्मोन और कैल्सिटोनिन) रुधिर में कैल्शियम की मात्रा को नियंत्रित करते हैं।

  4. अधिवृक्क ग्रंथि (Adrenal Gland):

    • इसके दो भाग हैं: कॉर्टेक्स (इसके विकृत होने पर एडीसन रोग होता है, यह जीवन के लिए नितांत आवश्यक है) और मेडुला

    • मेडुला से एपिनेफ्रीन और नॉरएपिनेफ्रीन निकलते हैं जो रक्तचाप और हृदय की उत्तेजना बढ़ाते हैं। इसे “लड़ो एवं उड़ो” (Fight and Flight) हार्मोन भी कहा जाता है, जो क्रोध, भय और खतरे के समय अधिक उत्सर्जित होता है।

  5. जनन ग्रंथि (Gonads):

    • अंडाशय (Ovary – मादा): एस्ट्रोजेन (अंडवाहिनी विकास), प्रोजेस्टेरॉन (स्तन वृद्धि में सहायक), और रिलैक्सिन (गर्भावस्था में गर्भाशय ग्रीवा को चौड़ा करता है ताकि बच्चा आसानी से पैदा हो सके)।

    • वृषण (Testes – नर): टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन (पुरुषोचित लैंगिक लक्षणों व यौन आचरण को प्रेरित करना)।

8. श्वसन तंत्र (Respiratory System)

  • मनुष्य के श्वसन तंत्र का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग फेफड़ा (Lungs) होता है, जहाँ गैसों का आदान-प्रदान होता है। इसे फुफ्फुसीय श्वसन भी कहते हैं।

A. श्वसन मार्ग के प्रमुख अंग

  • नासामार्ग (Nasal Passage): सूँघने का कार्य। इसकी म्यूकस कला प्रतिदिन 1/2 लीटर म्यूकस स्रावित करती है, जो धूल कणों और जीवाणुओं को रोकती है और वायु को नम व शरीर के तापमान के बराबर बनाती है।

  • ग्रसनी (Pharynx): नासागुहा के ठीक पीछे स्थित।

  • लैरिंक्स या स्वर यंत्र (Larynx): ग्रसनी को ट्रेकिया से जोड़ता है और ध्वनि उत्पादन करता है। इसके प्रवेश द्वार पर एक पतला कपाट इपिग्लॉटिस (Epiglottis) होता है, जो भोजन निगलते समय श्वास नली को बन्द कर देता है।

  • ट्रेकिया (Trachea) और फेफड़े (Lungs): वक्ष गुहा में एक जोड़ी स्पंज समान लाल फेफड़े होते हैं (दायाँ फेफड़ा बाएँ से बड़ा होता है)। फेफड़े प्लूरल मेम्ब्रेन झिल्ली से घिरे रहते हैं। यहाँ रक्त कोशिकाओं का जाल होता है जहाँ $\text{O}_2$ रुधिर में जाती है और $\text{CO}_2$ बाहर आती है।

B. श्वसन की प्रक्रिया के भाग

श्वसन की प्रक्रिया चार भागों में बँटी है: (1) बाह्य श्वसन, (2) गैसों का परिवहन, (3) आंतरिक श्वसन, और (4) कोशिकीय श्वसन।

  • बाह्य श्वसन के अंतर्गत श्वासोच्छ्वास (Breathing) की क्रियाविधि:

    1. निश्वसन (Inspiration): वातावरण की वायु का फेफड़ों में प्रवेश करना जिससे वक्ष गुहा का आयतन बढ़ जाता है और फेफड़ों में निम्न दाब बनता है।

    2. उच्छ्वसन (Expiration): श्वसन के पश्चात् फेफड़ों की वायु का वापस उसी मार्ग से वातावरण में लौट जाना।

 

दिए गए पाठ्य-सामग्री (Lucent General Knowledge) के आधार पर श्वसन तंत्र के शेष भागों, गैसों के विनिमय, परिवहन और कोशिकीय श्वसन की सुव्यवस्थित एवं विस्तृत प्रस्तुति नीचे दी गई है:

श्वसन प्रक्रिया, गैसों का परिवहन एवं कोशिकीय श्वसन

1. श्वासोच्छ्वास में वायु का संगठन (Composition of Air)

साँस लेने (अन्दर खींचने) और साँस छोड़ने (बाहर निकालने) के दौरान हवा में विभिन्न गैसों का प्रतिशत इस प्रकार होता है:

गैस का नाम अन्दर ली गयी वायु (Inscribed Air) बाहर निकाली गई वायु (Expired Air)
नाइट्रोजन ($\text{N}_2$) 78.09% 78.09%
ऑक्सीजन ($\text{O}_2$) 21% 17%
कार्बन-डाई-ऑक्साइड ($\text{CO}_2$) 0.03% 4%

विशेष नोट: साँस द्वारा प्रतिदिन हमारे शरीर से लगभग 400 ml पानी बाहर निकलता है।

2. गैसों का विनिमय (Exchange of Gases)

  • गैसों का विनिमय फेफड़े के अन्दर होता है।

  • यह प्रक्रिया घुली हुई अवस्था में या विसरण प्रवणता (Diffusion gradient) के आधार पर साधारण विसरण (Simple Diffusion) द्वारा होती है।

  • फेफड़े में $\text{O}_2$ तथा $\text{CO}_2$ गैसों का विनिमय उनके दाबों के अन्तर (Pressure Difference) के कारण होता है और दोनों गैसों के विसरण की दिशा एक-दूसरे के विपरीत होती है।

3. गैसों का परिवहन (Transportation of Gases)

गैसों ($\text{O}_2$ एवं $\text{CO}_2$) का फेफड़े से शरीर की कोशिकाओं तक पहुँचना तथा पुनः फेफड़े तक वापस आने की क्रिया को गैसों का परिवहन कहते हैं।

  • ऑक्सीजन ($\text{O}_2$) का परिवहन: रुधिर में पाए जाने वाले लाल-वर्णक हीमोग्लोबिन (Hb) के द्वारा होता है।

  • कार्बन डाई ऑक्साइड ($\text{CO}_2$) का परिवहन: कोशिकाओं से फेफड़े तक हीमोग्लोबिन के द्वारा केवल 10% से 20% तक ही हो पाता है। बाकी का परिवहन रक्त परिसंचरण के माध्यम से निम्न प्रकार से होता है:

    1. प्लाज्मा में घुलकर: $\text{CO}_2$ प्लाज्मा में घुलकर कार्बोनिक अम्ल बनाती है। इस रूप में 7% $\text{CO}_2$ का परिवहन होता है।

    2. बाइकार्बोनेट्स के रूप में: $\text{CO}_2$ का लगभग 70% भाग इसी रूप में प्रवाहित होता है। यह रुधिर के पोटैशियम एवं सोडियम के साथ मिलकर पोटैशियम बाइकार्बोनेट (${\text{KHCO}_3}$) एवं सोडियम बाइकार्बोनेट (${\text{NaHCO}_3}$) का निर्माण करता है।

4. आन्तरिक श्वसन (Internal Respiration)

  • शरीर के अन्दर रुधिर (रक्त) एवं ऊतक द्रव्य (Tissue fluid) के बीच होने वाले गैसीय विनिमय को आन्तरिक श्वसन कहते हैं।

  • (फेफड़ों में होने वाले गैसीय विनिमय को बाह्य श्वसन कहते हैं)

  • जब रुधिर (ऑक्सीहीमोग्लोबिन) कोशिकाओं में पहुँचता है, तो ऑक्सीजन विमुक्त होती है एवं खाद्य पदार्थों का ऑक्सीकरण होता है, जिससे ऊर्जा प्राप्त होती है।

5. कोशिकीय श्वसन (Cellular Respiration)

खाद्य पदार्थों के पाचन के फलस्वरूप प्राप्त ग्लूकोज का कोशिका में ऑक्सीजन द्वारा ऑक्सीकरण किया जाना कोशिकीय श्वसन कहलाता है। यह दो प्रकार का होता है:

A. अनॉक्सी श्वसन (Anaerobic Respiration)

  • यह श्वसन ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है।

  • इसमें ग्लूकोज बिना ऑक्सीजन के टूटता है:

    • मांसपेशियों में: लैक्टिक अम्ल (Lactic acid) में बदल जाता है।

    • बैक्टीरिया एवं यीस्ट कोशिकाओं में: इथाइल अल्कोहल में विघटित हो जाता है (इसे शर्करा किण्वन / Sugar Fermentation भी कहते हैं)।

  • अनॉक्सी श्वसन के अन्त में पाइरुविक अम्ल (Pyruvic acid) बनता है। यह प्रक्रिया जीवों में गहराई पर स्थित ऊतकों में, अंकुरित बीजों और फलों में थोड़े समय के लिए होती है, परन्तु यीस्ट व जीवाणुओं में प्रायः पाई जाती है।

B. ऑक्सी श्वसन (Aerobic Respiration)

  • यह श्वसन ऑक्सीजन की उपस्थिति में होता है।

  • इसमें श्वसनी पदार्थ का पूरा ऑक्सीकरण होता है, जिसके फलस्वरूप $\text{CO}_2$ एवं $\text{H}_2\text{O}$ बनते हैं तथा अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है।

$$\text{C}_6\text{H}_{12}\text{O}_6 + 6\text{O}_2 \rightarrow 6\text{CO}_2 + 6\text{H}_2\text{O} + 2830 \text{ KJ ऊर्जा}$$

6. कोशिकीय श्वसन की जटिल प्रक्रिया के भाग

कोशिकीय श्वसन के संपूर्ण प्रक्रम को दो मुख्य भागों में बाँटा गया है:

(a) ग्लाइकोलिसिस (Glycolysis)

  • इसका अध्ययन सर्वप्रथम एम्बडेन, मेयरहाफ और पारसन ने किया था, इसलिए इसे EMP पथ भी कहते हैं।

  • इसे अनॉक्सी श्वसन या शर्करा किण्वन भी कहा जाता है। इसमें ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं होती, अतः यह ऑक्सी एवं अनॉक्सी दोनों श्वसन में एक समान रूप से उपस्थित रहता है।

  • परिणाम: एक ग्लूकोज अणु के टूटने से पाइरुविक अम्ल के दो अणु बनते हैं।

  • ऊर्जा लाभ: इस प्रक्रिया को शुरू करने में $2\text{ ATP}$ अणु खर्च होते हैं, और अंत में $4\text{ ATP}$ अणु प्राप्त होते हैं। अतः शुद्ध रूप से $2\text{ ATP}$ अणु (अर्थात 16000 कैलोरी) ऊर्जा का लाभ होता है।

  • इसमें हाइड्रोजन के 4 परमाणु बनते हैं, जो $\text{NAD}$ को $2\text{NADH}_2$ में बदलने में काम आते हैं।

(b) क्रेब्स चक्र (Kreb’s Cycle)

  • इसका वर्णन हैन्स क्रेब ने सन् 1937 ई० में किया था। इसे साइट्रिक अम्ल चक्र या ट्राइकार्बोक्सिलिक चक्र भी कहा जाता है।

  • यह प्रक्रिया माइटोकॉन्ड्रिया के अन्दर विशेष एन्जाइमों की उपस्थिति में सम्पन्न होती है।

  • हमारे तंत्र में अधिकतम ATP अणुओं का निर्माण क्रेब्स चक्र के दौरान ही होता है।

  • पूरे चक्र में ग्लूकोज के टूटने से बने दोनों पाइरुविक अम्ल अणुओं का उपयोग होता है, जिससे अंततः $\text{CO}_2$ के 6 अणु बनते हैं।

7. ऊर्जा का कुल उत्पादन (Production of Energy / ATP गणना)

ग्लूकोज के एक अणु के पूर्ण ऑक्सीकरण (श्वसन) से ऊर्जा उत्पादन की गणना निम्नलिखित है:

  • पाइरुविक अम्ल के एक अणु के ऑक्सीकरण से:

    • $\text{ATP}$ का $1$ अणु सीधा बनता है।

    • $\text{NADH}$ के $5$ अणु बनते हैं (चूँकि $1\text{ NADH} = 3\text{ ATP}$, अतः $5 \times 3 = 15\text{ ATP}$)।

    • $\text{FADH}_2$ का $1$ अणु बनता है (चूँकि $1\text{ FADH}_2 = 2\text{ ATP}$, अतः $1 \times 2 = 2\text{ ATP}$)।

    • कुल: $1 + 15 + 2 = 18\text{ ATP}$ अणु (पाइरुविक अम्ल के एक अणु से)।

  • संपूर्ण ग्लूकोज अणु की गणना:

    • चूँकि एक ग्लूकोज अणु से दो पाइरुविक अम्ल बनते हैं, इसलिए क्रेब्स चक्र चक्र के दौरान कुल: $18 \times 2 = 36\text{ ATP}$ अणु प्राप्त होते हैं।

    • ग्लाइकोलिसिस प्रक्रिया के दौरान शुद्ध लाभ = $2\text{ ATP}$ अणु।

$$\text{कुल ऊर्जा लाभ} = 2\text{ ATP (ग्लाइकोलिसिस)} + 36\text{ ATP (क्रेब्स चक्र)} = 38\text{ ATP अणु}$$

8. महत्वपूर्ण तथ्य (Important Notes)

  • श्वसनी पदार्थ: शरीर में ऊर्जा के लिए सबसे पहले कार्बोहाइड्रेट का श्वसन होता है, इसके बाद वसा का, और इन दोनों का भंडार समाप्त होने के बाद ही अंत में प्रोटीन का श्वसन होता है।

  • अपचयी क्रिया (Catabolic Process): श्वसन एक अपचयी (तोड़ने वाली) क्रिया है, जिसके कारण शरीर के भार में कमी आती है।

Scroll to Top