1. दिए गए पाठ्य-सामग्री (Lucent General Knowledge) के आधार पर ‘आनुवंशिकी’ (Genetics) की संपूर्ण जानकारी को सरल, स्पष्ट और सुव्यवस्थित रूप में नीचे प्रस्तुत किया गया है:

    आनुवंशिकी (Genetics)

    • आनुवंशिक लक्षण: वे लक्षण जो माता-पिता से पीढ़ी दर पीढ़ी संचरित (transfer) होते हैं, आनुवंशिक लक्षण कहलाते हैं।

    • परिभाषा: आनुवंशिक लक्षणों के पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचरण की विधियों और कारणों के अध्ययन को आनुवंशिकी (Genetics) कहते हैं।

    महत्वपूर्ण खोज एवं वैज्ञानिक नामकरण:

    • ग्रिगर जोहान मेंडल (1822–1884 ई०): आनुवंशिकता के बारे में सर्वप्रथम जानकारी देने के कारण इन्हें ‘आनुवंशिकता का पिता’ (Father of Genetics) कहा जाता है।

    • डब्ल्यू वाटसन (1905 ई०): इन्होंने सर्वप्रथम ‘जेनेटिक्स’ (Genetics) नाम का उपयोग किया।

    • जोहान्सेन (1909 ई०): इन्होंने सर्वप्रथम ‘जीन’ (Gene) शब्द का प्रयोग किया।

    • एस० बेंजर (1956 ई०): इन्होंने जीन की आधुनिक विचारधारा दी, जिसके अनुसार जीन को तीन इकाइयों में बाँटा गया:

      1. सिस्ट्रॉन (Cistron): कार्य की इकाई।

      2. म्यूटॉन (Muton): उत्परिवर्तन (Mutation) की इकाई।

      3. रेकॉन (Recon): पुनः संयोजन (Recombination) की इकाई।

    • आर्थर कोर्नबर्ग (1962 ई०): इन्होंने ‘डी०एन०ए० पॉलीमरेज’ (DNA Polymerase) नामक एंजाइम की खोज की, जो $\text{DNA}$ संश्लेषण में सहायक है।

    1. प्रमुख आनुवंशिक शब्दावली

    • फीनोटाइप (Phenotype): जीवधारी के वे लक्षण जो बाहर से प्रत्यक्ष रूप से दिखाई पड़ते हैं (जैसे— लम्बाई, रंग)।

    • जीनोटाइप (Genotype): जीवधारी का आंतरिक आनुवंशिक संगठन जो कि कारकों (जीन) का बना होता है।

    • युग्म विकल्पी (Alleles): एक ही लक्षण/गुण के विभिन्न विपरीत रूपों को प्रकट करने वाले जीन कारकों को एक-दूसरे का ‘एलील’ या युग्म विकल्पी कहते हैं।

    2. मेंडल के प्रयोग एवं संकरण (Cross)

    मेंडल ने अपने आनुवंशिकी संबंधी प्रयोगों के लिए मटर के पौधे का चुनाव किया था। उन्होंने दो प्रकार के संकरण का अध्ययन किया:

    (A) एकसंकरीय क्रॉस (Monohybrid Cross)

    जब एक जोड़ी विपरीत गुणों (जैसे— लम्बा और बौना) वाले पौधों के बीच क्रॉस कराया जाता है।

    मेंडल ने शुद्ध लम्बे ($\text{TT}$) और शुद्ध बौने ($\text{tt}$) पौधों के बीच क्रॉस कराया, तो प्रथम पीढ़ी ($\text{F}_1$) में सभी पौधे संकर लम्बे ($\text{Tt}$) प्राप्त हुए। जब $\text{F}_1$ पीढ़ी के पौधों में स्व-परागण (Self-pollination) कराया गया, तो द्वितीय पीढ़ी ($\text{F}_2$) में निम्नलिखित अनुपात प्राप्त हुआ:

    • फीनोटाइप अनुपात (बाहरी दिखावट): $3:1$ ($75\%$ लम्बे और $25\%$ बौने)

    • जीनोटाइप अनुपात (आंतरिक संरचना): $1:2:1$ ($25\%$ शुद्ध लम्बे $\text{TT}$, $50\%$ संकर लम्बे $\text{Tt}$, $25\%$ शुद्ध बौने $\text{tt}$)

    (B) द्विसंकरीय क्रॉस (Dihybrid Cross)

    जब दो जोड़े विपरीत गुणों वाले पौधों के बीच क्रॉस कराया जाता है।

    मेंडल ने गोल तथा पीले बीज ($\text{RRYY}$) वाले पौधे का क्रॉस हरे तथा झुर्रीदार बीज ($\text{rryy}$) वाले पौधे से कराया। इसमें गोल और पीला रंग ‘प्रभावी गुण’ हैं। $\text{F}_1$ पीढ़ी में सभी बीज संकर गोल और पीले ($\text{RrYy}$) प्राप्त हुए। इनके स्व-परागण से $\text{F}_2$ पीढ़ी में निम्न अनुपात मिला:

    • फीनोटाइप अनुपात: $9:3:3:1$

      (9 गोल-पीले : 3 गोल-हरे : 3 झुर्रीदार-पीले : 1 झुर्रीदार-हरा)

    • जीनोटाइप अनुपात: $1:2:1:2:4:2:1:2:1$

    3. मेंडल के आनुवंशिकता के नियम

    उपर्युक्त प्रयोगों के आधार पर मेंडल ने तीन नियम प्रतिपादित किए:

    1. प्रभाविता का नियम (Law of Dominance): जब एक जोड़ा विपरीत गुणों वाले शुद्ध माता-पिता में संकरण कराया जाता है, तो प्रथम पीढ़ी ($\text{F}_1$) में केवल प्रभावी गुण ही दिखाई देता है और अप्रभावी गुण छिप जाता है (लेकिन उपस्थित रहता है जो दूसरी पीढ़ी में प्रकट होता है)।

    2. पृथक्करण का नियम या युग्मकों की शुद्धता का नियम (Law of Segregation): युग्मक (Gamete) बनते समय जीन जोड़ों के दोनों कारक एक-दूसरे से पृथक हो जाते हैं और प्रत्येक युग्मक में केवल एक ही कारक पहुँचता है।

    3. स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment): यह द्विसंकरीय क्रॉस पर आधारित है। जब दो जोड़ी विपरीत लक्षणों वाले पौधों में संकरण कराया जाता है, तो दोनों लक्षणों का पृथक्करण स्वतंत्र रूप से होता है। एक लक्षण की वंशानुगति दूसरे लक्षण को प्रभावित नहीं करती।

    4. सहलग्नता (Linkage)

    • परिभाषा: एक ही गुणसूत्र (Chromosome) पर स्थित जीनों में एक साथ अगली पीढ़ी में वंशगत होने की जो प्रवृत्ति पाई जाती है, उसे सहलग्नता कहते हैं। एक साथ वंशगत होने वाले जीनों को सहलग्न जीन (Linked Genes) कहते हैं।

    • लिंग सहलग्न जीन (Sex-Linked Genes): $\text{X}$ गुणसूत्र पर स्थित जीन ही लिंग सहलग्न जीन कहे जाते हैं, क्योंकि इनका प्रभाव नर और मादा दोनों पर पड़ता है।

    • व्याख्या: लिंग सहलग्नता की सर्वप्रथम विस्तृत व्याख्या मॉर्गन ने 1910 ई० में की थी।

    • मनुष्य में लिंग सहलग्न रोग/गुण: रंग वर्णान्धता (Color Blindness), गंजापन, हीमोफीलिया, मायोपिया, हाइपरट्राइकोसिस आदि। ये गुण स्त्रियों की तुलना में पुरुषों में अधिक प्रकट होते हैं

    5. मानव-आनुवंशिकी (Human Genetics)

    • गुणसूत्र (Chromosomes): इनका नामकरण डब्ल्यु वाल्डेयर ने 1888 ई० में किया था।

    • जीनोम (Genome): गुणसूत्रों में पाए जाने वाले संपूर्ण आनुवंशिक पदार्थ को जीनोम कहते हैं। जीन इन्हीं गुणसूत्रों पर रैखिक क्रम में पाए जाते हैं।

    • प्लाज्माजीन (Plasmagene): यदि जीन गुणसूत्रों के बाहर कोशिका द्रव्य (Cytoplasm) के कोशिकांगों में पाए जाते हैं, तो उन्हें प्लाज्माजीन कहते हैं।

    • अमीनो एसिड: मानव शरीर में 20 आवश्यक अमीनो एसिड पाए जाते हैं।

    6. विभिन्न जीवों में गुणसूत्रों (Chromosomes) की संख्या

    जीव / जाति गुणसूत्रों की संख्या जीव / जाति गुणसूत्रों की संख्या
    एस्कैरिस 2 मेढ़क 26
    मच्छर 6 बिल्ली 38
    घरेलू मक्खी 12 चूहा 40
    मटर 14 गेहूँ 42
    प्याज 16 खरगोश 44
    नींबू 18 या 36 मनुष्य 46 (23 जोड़ी)
    मक्का 20 आलू / चिम्पैंजी / तम्बाकू 48
    टमाटर 24 घोड़ा 64
    कुत्ता 78 कबूतर 80
    टेरिडोफाइट्स 1300 से 1600

    7. मनुष्य में लिंग निर्धारण (Sex Determination)

    मनुष्य में कुल 46 गुणसूत्र (23 जोड़ी) होते हैं। संतान को प्रत्येक जोड़ी का एक गुणसूत्र माता के अंडाणु से तथा दूसरा पिता के शुक्राणु से मिलता है।

    • पुरुष (Male): शुक्रजनन (Spermatogenesis) के अर्धसूत्री विभाजन द्वारा दो प्रकार के शुक्राणु बनते हैं— आधे $\text{X}$ गुणसूत्र वाले $(22 + \text{X})$ और आधे $\text{Y}$ गुणसूत्र वाले $(22 + \text{Y})$

    • स्त्री (Female): नारियों में केवल एक ही समान प्रकार के अंडाणु पाए जाते हैं, जो $\text{X}$ गुणसूत्र वाले होते हैं $(22 + \text{X})$

    लिंग निर्धारण की प्रक्रिया:

    1. लड़की (Female child): निषेचन के समय जब माता का अंडाणु ($\text{X}$), पिता के $\text{X}$ गुणसूत्र वाले शुक्राणु से मिलता है, तो युग्मनज (Zygote) में $\text{XX}$ जोड़ी बनती है, जिससे लड़की का जन्म होता है।

    2. लड़का (Male child): जब माता का अंडाणु ($\text{X}$), पिता के $\text{Y}$ गुणसूत्र वाले शुक्राणु से मिलता है, तो युग्मनज में $\text{XY}$ जोड़ी बनती है, जिससे लड़के का जन्म होता है।

    निष्कर्ष: संतान में लिंग निर्धारण के लिए पूरी तरह से पुरुष का गुणसूत्र ($\text{X}$ या $\text{Y}$) उत्तरदायी होता है।

    विशेष नोट: परखनली शिशु (Test Tube Baby) के मामले में निषेचन (Fertilization) माता के शरीर के बाहर परखनली के अंदर संपन्न कराया जाता है।

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