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दिए गए पाठ्य-सामग्री (Lucent General Knowledge) के आधार पर ‘वनस्पति विज्ञान’ (Botany) की संपूर्ण जानकारी को वर्गीकृत, क्रमबद्ध और सुव्यवस्थित रूप में नीचे प्रस्तुत किया गया है:
वनस्पति विज्ञान (Botany)
परिभाषा: विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों तथा उनके क्रियाकलापों के अध्ययन को वनस्पति विज्ञान (Botany) कहते हैं।
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जनक (Father of Botany): थियोफ्रेस्ट्स (Theophrastus) को वनस्पति विज्ञान का जनक कहा जाता है।
1. पादपों का वर्गीकरण (Classification of Plants)
वैज्ञानिक एइचलर (Eichler) ने 1883 ई० में वनस्पति जगत को निम्न रूप से वर्गीकृत किया:
पादप जगत (Plant Kingdom) │ ┌────────────────────────────────┴────────────────────────────────┐ ▼ ▼ अपुष्पोद्भिद् (Cryptogamae) पुष्पोद्भिद् (Phanerogamae) (पुष्प और बीज रहित) (पूर्ण विकसित: फूल, फल और बीज युक्त) │ │ ┌───────┼──────────────┐ ┌───────┴───────┐ ▼ ▼ ▼ ▼ ▼ थैलोफाइटा ब्रायोफाइटा टेरिडोफाइटा नग्नबीजी आवृत्तबीजी │ (Gymnosperm) (Angiosperm) ├───────────────┬───────────────┐ │ ▼ ▼ ▼ ┌───────┴───────┐ शैवाल (Algae) कवक (Fungi) जीवाणु (Bacteria) ▼ ▼ एकबीजपत्री द्विबीजपत्री (Monocot) (Dicot)2. अपुष्पोद्भिद् पौधे (Cryptogamae)
इस वर्ग के पौधों में पुष्प तथा बीज नहीं होते। इन्हें तीन समूहों में बाँटा गया है:
(A) थैलोफाइटा (Thalophyta)
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यह वनस्पति जगत का सबसे बड़ा समूह है।
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इनका शरीर सुकाय (Thallus) होता है, अर्थात् पौधे जड़, तना एवं पत्ती आदि में विभक्त नहीं होते। इनमें संवहन ऊतक (Vessels/Xylem-Phloem) नहीं होता।
1. शैवाल (Algae)
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अध्ययन: शैवालों के अध्ययन को फाइकोलॉजी (Phycology) कहते हैं।
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लक्षण: पर्णहरित युक्त (Chlorophyllous), संवहन ऊतक रहित और आत्मपोषी (Autotrophic) होते हैं।
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आर्थिक महत्त्व:
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भोजन के रूप में: पोरफाइरा, अल्बा, सरगासन, लेमिनेरिया, नॉस्टॉक आदि।
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आयोडीन बनाने में: लेमिनेरिया, फ्यूकस, एकलोनिया आदि।
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खाद के रूप में: नॉस्टॉक, एनाबीना, केल्प आदि।
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औषधि बनाने में: क्लोरेला से ‘क्लोरेलिन’ नामक प्रतिजैविक (Antibiotic) और लेमिनेरिया से टिंचर आयोडीन बनाई जाती है।
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अनुसंधान कार्यों में: क्लोरेला, एसीटेबुलेरिया, बेलोनिया आदि।
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विशेष नोट: क्लोरेला (Chlorella) नामक शैवाल को अंतरिक्ष यान के केबिन के हौज में उगाकर अंतरिक्ष यात्री को प्रोटीनयुक्त भोजन, जल और ऑक्सीजन प्राप्त हो सकते हैं।
2. कवक (Fungi)
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अध्ययन: कवक के अध्ययन को कवक विज्ञान (Mycology) कहा जाता है।
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लक्षण: पर्णहरित रहित (Non-chlorophyllous), संकेन्द्रीय और संवहन ऊतक रहित थैलोफाइट हैं। इनकी कोशिकाभित्ति काइटिन (Chitin) की बनी होती है। संचित भोजन ग्लाइकोजन के रूप में रहता है।
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हानि: कवक पौधों और मनुष्यों में गंभीर रोग उत्पन्न करते हैं। पौधों को सबसे अधिक हानि रस्ट (Rust) और स्मट (Smut) से होती है।
मनुष्य में कवक जनित रोग:
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दमा (Asthma): ऐस्परजिलस फ्यूमिगेटस
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एथलीट फुट: टीनिया पेडिस
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खाज (Scabies): एकेरस स्केबीज
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गंजापन (Baldness): टीनिया केपिटिस
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दाद (Ringworm): ट्राइकोफायटान लेसूकोसम
पौधों में कवक जनित मुख्य रोग:
सरसों का सफेद रस्ट, गेहूँ का ढीला स्मट, गेहूँ का किट्टू रोग (Rust of wheat), आलू की अंगमारी (Blight) व पछेला अंगमारी (Late blight), गन्ने का लाल अपक्षय (Red rot), मूँगफली का टिक्का रोग, आलू का मस्सा (Wart) रोग, धान की भूरी अर्ज चित्ति (Brown leaf spot)।
3. जीवाणु (Bacteria)
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खोज: 1683 ई० में हॉलैंड के एण्टोनीवान ल्यूवेनहॉक ने की। इन्हें ‘जीवाणु विज्ञान का पिता’ कहा जाता है।
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नामकरण: एहरेनवर्ग (Ehrenberg) ने 1829 ई० में इन्हें ‘जीवाणु’ नाम दिया।
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प्रमुख खोजें: रॉबर्ट कोच ने कालरा तथा तपेदिक (TB) के जीवाणुओं की खोज की व ‘रोग का जर्म सिद्धान्त’ दिया। लुई पाश्चर ने रेबीज का टीका और दूध के पाश्चुराइजेशन की खोज की।
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आकृति के प्रकार: छड़ाकार/बैसिलस (Bacillus), गोलाकार/कोकस (Coccus – सबसे छोटे), कोमा-आकार/विब्रियों (Vibrio, जैसे- विब्रियों कॉलेरी) तथा सर्पिलाकार (Spirillum)।
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नाइट्रोजन स्थिरीकरण (N2 Fixation):
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मिट्टी में स्वतंत्र रूप से रहने वाले जीवाणु: ऐजोटोबैक्टर, एजोसपाइरिलम तथा क्लोस्ट्रीडियम।
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सायनोबैक्टीरिया: एनाबीना तथा नॉस्टॉक।
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दलहनी फसलों (मटर कुल) की जड़ों में रहने वाले: राइजोबियम तथा ब्रेडीराइजोबियम।
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दूध का पाश्चुरीकरण (Pasteurization): इसकी दो विधियाँ हैं:
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Low Temperature Holding Method (LTH): दूध को $62.8^\circ\text{C}$ पर 30 मिनट तक गरम करते हैं।
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High Temperature Short Time Method (HTST): दूध को $71.7^\circ\text{C}$ पर 15 सेकेण्ड तक गरम करते हैं।
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अन्य तथ्य: चर्म उद्योग में चमड़े से बालों और वसा को हटाना चमड़ा कमाना (Tanning) कहलाता है, जो जीवाणुओं द्वारा होता है। आचार/मुरब्बे को गाढ़ी चाशनी या अधिक नमक में रखने पर जीवाणुओं का जीवद्रव्यकुंचन (Plasmolysis) हो जाता है जिससे वे नष्ट हो जाते हैं। कोल्ड स्टोरेज में न्यूनतम तापमान $-10^\circ\text{C}$ से $-18^\circ\text{C}$ पर सामग्री संचित होती है।
(B) ब्रायोफाइटा (Bryophyta)
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यह सबसे सरल स्थलीय पौधों का समूह है (लगभग 25,000 जातियाँ)।
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इसमें संवहन ऊतक (जाइलम एवं फ्लोएम) का पूर्णतः अभाव होता है।
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इस समुदाय को वनस्पति जगत का एम्फीबिया वर्ग (Amphibia Class) कहा जाता है। ये मृदा अपरदन (Soil erosion) रोकने में सहायक हैं।
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स्फेगनम (Sphagnum) मॉस: यह अपने स्वयं के भार से 18 गुना अधिक पानी सोख सकता है। इसलिए माली पौधों को सूखने से बचाने के लिए इसका उपयोग करते हैं। इसका प्रयोग ईंधन और ऐन्टिसेप्टिक (Antiseptic) के रूप में भी होता है।
(C) टेरिडोफाइटा (Pteridophyta)
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ये पौधे नमी, छायादार स्थानों, जंगलों एवं पहाड़ों पर पाए जाते हैं।
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पौधे का शरीर जड़, तना, शाखा एवं पत्तियों में विभेदित रहता है। तना साधारणतः राइजोम के रूप में होता है। जनन बीजाणुओं (Spores) द्वारा होता है।
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इनमें संवहन ऊतक पूर्ण विकसित होते हैं, परन्तु जाइलम में वेसेल्स (Vessels) एवं फ्लोएम में सहकोशाएँ (Companion cells) नहीं होती हैं।
3. पुष्पोद्भिद् या फूल वाले पौधे (Phanerogamae)
यह वर्ग पूर्ण विकसित होता है। इनमें फूल, फल तथा बीज सब पाए जाते हैं। इन्हें दो उपसमूहों में बाँटा गया है:
(A) नग्नबीजी या अनावृत्तबीजी (Gymnosperm)
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ये पौधे काष्ठीय, बहुवर्षी, मरुद्भिद (Xerophytic) और लम्बे वृक्ष या झाड़ी होते हैं। इनमें मूसला जड़ें पूर्ण विकसित होती हैं और परागण वायु द्वारा होता है। इनके बीज फल के बाहर (नग्न) होते हैं।
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महत्वपूर्ण उदाहरण व तथ्य:
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सिकोया सेम्परविरेंस: वनस्पति जगत का सबसे ऊँचा पौधा (120 मीटर), इसे कोस्ट रेडवुड ऑफ कैलीफोर्निया कहते हैं।
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जैमिया पिग्मिया: सबसे छोटा अनावृत्तबीजी पौधा।
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साइकस, जिंगो बाइलोवा, मेटासिकोया: जीवित जीवाश्म (Living fossils)। जिंगो बाइलोवा को ‘मेडन हेयर ट्री’ भी कहते हैं।
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साइकस: इसके बीजाण्ड (Ovules) एवं नरयुग्मक पादप-जगत में सबसे बड़े होते हैं। इसके तने से मंड निकालकर साबूदाना (Sago) बनाया जाता है, इसलिए इसे ‘सागो पाम’ कहते हैं।
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पाइनस: इसके परागकणों की अधिकता के कारण आसमान में पीले बादल (Sulphur showers) बन जाते हैं।
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आर्थिक महत्त्व: चीड़, सिकोया, देवदार से फर्नीचर की लकड़ी; चीड़ से तारपीन का तेल, देवदार से सेड्रस तेल मिलता है। टेनिन का प्रयोग चमड़ा व स्याही बनाने में तथा रेजिन का प्रयोग वार्निश, पॉलिश और पेंट में होता है।
(B) आवृत्तबीजी (Angiosperm)
이 उपसमूह के पौधों में बीज फल के अन्दर होते हैं। जड़, पत्ती, फूल, फल पूर्ण विकसित होते हैं। बीजों में उपस्थित बीजपत्रों की संख्या के आधार पर इन्हें दो वर्गों में बाँटा गया है:
1. एकबीजपत्री पौधे (Monocotyledonous)
जिनके बीजों में सिर्फ एक बीजपत्र होता है।
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लिलिएसी कुल: लहसुन, प्याज।
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पाल्मी कुल: सुपारी, ताड़, नारियल, खजूर।
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ग्रेमिनेसी कुल: गेहूँ, मक्का, बाँस, गन्ना, चावल, ज्वार, बाजरा, जौ, जई आदि।
2. द्विबीजपत्री पौधे (Dicotyledonous)
जिनके बीजों में दो बीजपत्र होते हैं।
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क्रूसीफेरी कुल: मूली, शलजम, सरसों।
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मालवेसी कुल: कपास, भिण्डी, गुड़हल।
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लेग्यूमिनोसी कुल: बबूल, छुईमुई, कत्था, गुलमोहर, अशोक, कचनार, इमली तथा सभी दलहन (दालें)।
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कम्पोजिटी कुल: सूरजमुखी, भृंगराज, गेंदा, कुसुम, सलाद, डहेलिया।
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रुटेसी कुल: नींबू, चकोत्तरा, सन्तरा, मुसम्मी, बेल, कैथा, कामिनी।
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कुकुरबिटेसी कुल: तरबूज, खरबूजा, टिण्डा, कद्दू, लौकी, खीरा, ककड़ी, परवल, करेला।
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सोलेनेसी कुल: आलू, मिर्च, बैंगन, मकोय, धतूरा, बैलाडोना, टमाटर।
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रोजेसी कुल: स्ट्रॉबेरी, सेब, बादाम, नाशपाती।
4. पादप आकारिकी (Plant Morphology)
विभिन्न पादप भागों जैसे—जड़, तना, पत्ती, पुष्प, फल आदि के रूपों तथा गुणों के अध्ययन को आकारिकी कहते हैं।
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जड़ (Root): पौधों का अवरोही (Downward) भाग जो मूलांकुर (Radicle) से विकसित होता है। यह प्रकाश से दूर भूमि में वृद्धि करती है।
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मूसला जड़ों का रूपान्तरण: शंकु आकार (गाजर), कुम्भी रूप (शलजम, चुकंदर), तर्क रूपी (मूली)।
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तना (Stem): यह पौधे का वह भाग है जो प्रकाश की ओर वृद्धि करता है तथा प्रांकुर (Plumule) से विकसित होता है।
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भूमिगत तनों का रूपान्तरण: कन्द (आलू), धनकन्द (बण्डा, केसर), शल्ककन्द (प्याज), प्रकन्द (हल्दी, अदरक)।
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पत्ती (Leaf): यह हरे रंग की होती है, इसका मुख्य कार्य प्रकाश-संश्लेषण द्वारा भोजन बनाना है।
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पुष्प (Flower): यह पौधे का जनन अंग है। इसमें बाह्य दलपुंज (Calyx), दलपुंज (Corolla), पुमंग (Androecium – नर जननांग) और जायांग (Gynoecium – मादा जननांग) पाए जाते हैं। पुमंग में पुंकेसर और परागकण होते हैं। जायांग के तीन भाग होते हैं— अण्डाशय (Ovary), वर्तिका (Style) एवं वर्तिकाग्र (Stigma)।
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परागण (Pollination): परागकोष से निकलकर वर्तिकाग्र पर परागकणों के पहुँचने की क्रिया। यह दो प्रकार का होता है: स्व-परागण (Self-pollination) तथा पर-परागण (Cross-pollination)।
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निषेचन (Fertilization): नर युग्मक का अण्डकोशिका से संयोजन निषेचन कहलाता है। निषेचित अण्ड युग्मनज (Zygote) कहलाता है। आवृत्तबीजी में त्रिक संलयन (Triple fusion) तथा अन्य पौधों में द्विसंलयन होता है।
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अनिषेक फलन (Parthenocarpy): बिना निषेचन के ही अण्डाशय से फल का विकास होना। ये फल बीजरहित होते हैं; जैसे— केला, पपीता, नारंगी, अंगूर, अनन्नास।
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फल का निर्माण: फल का निर्माण अण्डाशय (Ovary) से होता है।
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फल के प्रकार: सरल फल (अमरूद, केला), पुंज फल (स्ट्रॉबेरी, रसभरी), संग्रथित फल (कटहल, शहतूत)।
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असत्य फल (False Fruit): जिनके निर्माण में अण्डाशय के अतिरिक्त बाह्य दलपुंज, दलपुंज या पुष्पासन भाग लेते हैं; जैसे— सेब, कटहल।
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प्रमुख फल एवं उनके खाने योग्य भाग:
फल खाने योग्य भाग फल खाने योग्य भाग सेब / नाशपाती पुष्पासन गेंहूँ भ्रूणपोष एवं भ्रूण आम / पपीता मध्य फलभित्ति काजू पुष्पवृन्त, बीजपत्र अमरूद / अंगूर / टमाटर फलभित्ति एवं बीजाण्डसन लीची एरिल (Aril) नारियल भ्रूणपोष चना / मूँगफली बीजपत्र एवं भ्रूण केला मध्य एवं अन्तः भित्ति शहतूत / अनन्नास रसीले परिदलपुंज कटहल परिदल पुंज एवं बीज नारंगी जूसी हेयर 5. पादप ऊतक (Plant Tissue)
समान उत्पत्ति, संरचना एवं कार्यों वाली कोशिकाओं के समूह को ऊतक कहते हैं। पादप ऊतक दो प्रकार के होते हैं:
1. विभज्योतकी ऊतक (Meristematic Tissue)
पौधे के वर्धी क्षेत्रों (Growing regions) को विभज्योतक कहते हैं। कोशिकाएँ पतली भित्ति वाली, सघन जीवद्रव्य युक्त और अन्तरकोशिकीय स्थान रहित होती हैं। इसके तीन प्रकार हैं:
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शीर्षस्थ विभज्योतक (Apical): जड़ों/तनों के शीर्ष पर। यह पौधे की लम्बाई (प्राथमिक वृद्धि) के लिए उत्तरदायी है।
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पार्श्व विभज्योतक (Lateral): विभाजन से जड़ और तने के घेरे/मोटाई (द्वितीयक वृद्धि) में वृद्धि होती है।
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अन्तर्वेशी विभज्योतक (Intercalary): यह शीर्षस्थ विभज्योतक का अवशेष है जो स्थायी ऊतकों के बीच पाया जाता है। (जैसे—घास का शीर्षाग्र शाकाहारी पशुओं द्वारा खा लिए जाने पर इसी ऊतक से वृद्धि होती है)।
2. स्थायी ऊतक (Permanent Tissue)
विभाजन की क्षमता खो चुकी परिपक्व कोशिकाएँ। यदि ये एक ही प्रकार की कोशिकाओं से बनी हों तो सरल ऊतक (मृदूतक, स्थूलकोण ऊतक, दृढ़ ऊतक) और यदि एक से अधिक प्रकार की कोशिकाओं से बनी हों तो जटिल ऊतक कहलाती हैं। इसके दो मुख्य भाग हैं:
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जाइलम (Xylem / काष्ठ): यह संवहन ऊतक है। इसके दो कार्य हैं— जल एवं खनिजों का ऊर्ध्व संवहन तथा पौधे को यांत्रिक दृढ़ता देना।
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वार्षिक वलय (Annual Rings): पौधे की आयु की गणना जाइलम के वार्षिक वलयों को गिनकर की जाती है। इस विधि को डेंड्रोक्रोनोलॉजी (Dendrochronology) कहते हैं।
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फ्लोएम (Phloem): पत्तियों द्वारा प्रकाश-संश्लेषण से बनाए गए भोजन को पौधे के अन्य भागों तक पहुँचाना।
6. प्रकाश-संश्लेषण (Photosynthesis)
पौधों में जल, प्रकाश, पर्णहरित (क्लोरोफिल) तथा $\text{CO}_2$ की उपस्थिति में कार्बोहाइड्रेट के निर्माण को प्रकाश-संश्लेषण कहते हैं।
$$6\text{CO}_2 + 12\text{H}_2\text{O} \xrightarrow{\text{प्रकाश / क्लोरोफिल}} \text{C}_6\text{H}_{12}\text{O}_6 + 6\text{H}_2\text{O} + 6\text{O}_2$$-
अवशोषण: स्थलीय पौधे वायुमंडल से विसरण द्वारा $\text{CO}_2$ लेते हैं और जलीय पौधे जल में घुली $\text{CO}_2$ लेते हैं। जल जड़ों द्वारा अवशोषित होता है। प्रकाश-संश्लेषण में निकलने वाली $\text{O}_2$ इसी जल के अपघटन से प्राप्त होती है।
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क्लोरोफिल (Parnharit): इसके चार घटक हैं— क्लोरोफिल-ए, क्लोरोफिल-बी (दोनों हरे रंग के, ऊर्जा स्थानांतरित करते हैं), कैरोटीन तथा जैंथोफिल। क्लोरोफिल के केन्द्र में मैग्नीशियम ($\text{Mg}$) का एक परमाणु होता है।
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प्रकाश का प्रभाव: क्लोरोफिल प्रकाश में बैंगनी, नीला तथा लाल रंग को ग्रहण करता है। प्रकाश-संश्लेषण की दर लाल रंग में सबसे अधिक तथा बैंगनी रंग में सबसे कम होती है। यह एक उपचयन-अपचयन (Oxidation-Reduction) अभिक्रिया है।
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अवस्थाएँ:
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प्रकाश रासायनिक क्रिया (Hill Reaction): क्लोरोफिल के ग्रेना (Grana) भाग में होती है। जल का अपघटन होकर $\text{ATP}$ और $\text{NADPH}$ निकलते हैं।
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रासायनिक प्रकाशहीन क्रिया (Dark Reaction): क्लोरोफिल के स्ट्रोमा (Stroma) में होती है। इसमें $\text{CO}_2$ का अपचयन होकर शर्करा/स्टार्च बनता है।
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7. पादप हार्मोन (Plant Hormones)
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ऑक्सिन्स (Auxins): खोज डार्विन ने (1880) की। पौधे की वृद्धि को नियंत्रित करता है। यह पत्तियों का विलगन रोकता है, खरपतवार नष्ट करता है तथा फसलों को गिरने से बचाता है।
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जिबरेलिन्स (Gibberellins): खोज कुरोसावा ने (1926) की। बौने पौधों को लम्बा करता है, फूल बनने में मदद करता है तथा बीजों की प्रसुप्ति (Dormancy) भंग करता है।
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साइटोकाइनिन (Cytokinins): खोज मिलर ने (1955) की, नामकरण लिथाम ने किया। ऑक्सिन की उपस्थिति में कोशिका विभाजन और विकास में मदद करता है तथा जीर्णता (Aging) रोकता है।
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एबसिसिक एसिड (ABA): खोज कार्न्स, एडिकोट व वेयरिंग ने की। यह एक वृद्धिरोधक (Growth inhibitor) हार्मोन है। बीजों को सुषुप्तावस्था में रखता है और पुष्पन में बाधक है।
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एथिलीन (Ethylene): एकमात्र ऐसा हार्मोन जो गैसीय रूप में पाया जाता है (प्रमाणित बर्ग ने 1962 में किया)। यह फलों को पकाने में सहायता करता है।
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फ्लोरिजेन्स (Florigens): पत्तियों में बनते हैं तथा फूलों के खिलने में मदद करते हैं (फूल खिलाने वाले हार्मोन)।
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ट्राउमैटिन (Traumatin): यह एक डाइकार्बोक्सिलिक अम्ल है। इसका निर्माण घायल कोशिकाओं में होता है जिससे पौधे के जख्म भरते हैं।
8. पादप रोग (Plant Diseases)
(A) विषाणुजनित रोग (Viral Diseases)
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तम्बाकू का मोजेक रोग: पत्तियाँ सिकुड़ व छोटी हो जाती हैं, क्लोरोफिल नष्ट हो जाता है। कारक: TMV (Tobacco Mosaic Virus)।
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पोटेटो मोजेक: पोटेटो वायरस द्वारा; पत्तियों में चितकबरापन तथा बौनापन।
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बंकी टॉप ऑफ बनाना: बनाना वायरस-7 द्वारा; पौधे बौने और पत्तियाँ शिखा पर गुलाबवत् जमा हो जाती हैं।
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रंग परिवर्तन (Colour Change): हरिमाहीनता (Chlorosis) में पत्तियाँ पीली/सफेद हो जाती हैं।
(B) जीवाणुजनित रोग (Bacterial Diseases)
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आलू का शैथिल रोग (Wilt disease): इसे ‘रिंग रोग’ भी कहते हैं (जाइलम पर भूरा रिंग बनना)। कारक: स्यूडोमोनास सोलेनेसियेरम जीवाणु।
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ब्लैक आर्म ऑफ काटन: कारक: जैन्थोमोनास जीवाणु; पत्तियों पर भूरी जलाद्र संरचना।
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धान का अंगमारी रोग (Bacterial Blight): कारक: जैन्थोमोनास ओराइजी; पत्तियों पर पीला-हरा स्पॉट।
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साइट्रस कैंकर: कारक: जेन्थोमोनास सिट्री जीवाणु। नींबू की पत्ती, शाखा, फल प्रभावित होते हैं (उत्पत्ति चीन में हुई)।
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गेहूँ का टून्डू रोग (Tundu disease): कारक: कोरीनोबैक्टीरियम ट्रिटिकी जीवाणु तथा एन्जूइना ट्रिटिकी नेमैटोड।
(C) तत्वों की कमी से उत्पन्न रोग
रोग / लक्षण कमी का कारण (तत्व) रोग / लक्षण कमी का कारण (तत्व) आम एवं बैंगन में लिटिल लीफ जस्ता ($\text{Zn}$) लीची में पत्ती जलना पोटेशियम ($\text{K}$) नींबू में डाईबैक / लिटिल लीफ ताँबा ($\text{Cu}$) आँवले में निक्रोसिस बोरोन ($\text{B}$) फूलगोभी में ब्राउनिंग बोरोन ($\text{B}$) शलजम में वाटर कोर मैंगनीज ($\text{Mn}$) मटर में मार्श रोग मैंगनीज ($\text{Mn}$) चुकंदर में हट रॉट बोरोन ($\text{B}$) आलू का ब्लैक हार्ट रोग भंडारण में $\text{O}_2$ की कमी धान में खैरा रोग जस्ता ($\text{Zn}$) गाजर में कोटर स्पॉट कैल्शियम ($\text{Ca}$) मक्का में White Bud जस्ता ($\text{Zn}$) 9. वनस्पति शास्त्र से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य
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सबसे बड़ा आवृत्तबीजी वृक्ष: यूकेलिप्टस।
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संसार का सबसे लम्बा वृक्ष: सिकोया (नग्नबीजी, 120 मीटर, कोस्ट रेड वुड ऑफ कैलीफोर्निया)।
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सबसे छोटा आवृत्तबीजी पौधा: लेम्ना (जलीय)।
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सबसे बड़ी पत्ती वाला पौधा: विक्टोरिया रीजिया (बंगाल में पाया जाने वाला जलीय पादप)।
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सबसे बड़ा फल: लोडोसिया (डबल कोकोनट – केरल)।
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सबसे छोटा पुष्प / सबसे बड़ा पुष्प: वुल्फिया (0.1 मिमी) / रैफ्लेशिया ओरनोल्डाई (व्यास 1 मीटर, भार 8 किग्रा, वाइटिश की जड़ पर परजीवी)।
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जीवित जीवाश्म / सबसे बड़ा नरयुग्मक व बीजाण्ड: साइकस।
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सबसे ज्यादा गुणसूत्र वाला पौधा: औफियोग्लोसम (फर्न – $1266$ गुणसूत्र)।
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सबसे कम गुणसूत्र वाला पादप: हेप्लोपोपस ग्रेसिलिस।
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सबसे हल्की काष्ठ (लकड़ी) / सबसे भारी काष्ठ: ओक्रोमा लेगोपस / हार्डविचिया बाइनेका।
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सबसे छोटी कोशिका: माइकोप्लाज्मा गेलिसेप्टिकम।
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जंगल की आग: ढाक (पलाश)।
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व्यावसायिक उत्पाद:
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कॉफी: कोफिया अरेबिका के बीजों से (इसमें कैफीन होती है)।
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कोको: थियोब्रोमा केकओ से (इसमें थिओब्रोमीन व कैफीन होती है)।
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अफीम: पोपी (पेपावर सोमेनिफेरम) से (इसमें मोर्फीन होती है)।
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लौंग: यह फूल की कली से प्राप्त होती है।
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केसर: पौधे के वर्तिकाग्र (Stigma) भाग से बनाया जाता है।
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हेरोइन: यह अफीम पोस्ता से प्राप्त होती है।
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