मैं और मेरा देश (प्रश्न-उत्तर)
मेरे उत्तर मेरे तर्क
1. “एक दिन आनंद की इस दीवार में दरार पड़ गई”, इस पंक्ति में रेखांकित शब्द ‘दरार’ किस ओर संकेत करता है?
(क) पूर्णता के भाव की तुष्टि
(ख) पारस्परिक संबंध टूटने की स्थिति
(ग) पूर्णता के भाव पर प्रहार
(घ) सुख-सुविधाओं का अभाव
सही उत्तर – (ग) पूर्णता के भाव पर प्रहार
तर्क: लेखक पहले अपने घर, पड़ोस और नगर की सीमाओं में स्वयं को एक ‘पूर्ण मनुष्य’ समझकर संतुष्ट था। लेकिन लाला लाजपत राय के इस अनुभव ने कि विदेशों में भारत की गुलामी के कारण उन्हें लज्जा का सामना करना पड़ा, लेखक की इस पूर्णता के भाव को अपूर्णता की कसक से भर दिया, जो उनकी वैचारिक दीवार में एक ‘दरार’ या प्रहार के समान था।
2. निबंध में कहा गया है कि “ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने में एक अपूर्व आनंद आता है।” लेखक को किस तरह के प्रश्नों का उत्तर देने में आनंद की अनुभूति होती है?
(क) बात को विस्तार देने वाले प्रश्नों का
(ख) बात का निष्कर्ष प्रस्तुत करने वाले प्रश्नों का
(ग) बिना किसी संदर्भ के पूछे गए प्रश्नों का
(घ) किसी की समझ का आकलन करने वाले प्रश्नों का
सही उत्तर – (क) बात को विस्तार देने वाले प्रश्नों का
तर्क: लेखक के अनुसार, ऐसे प्रश्न महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि ये बात को खींच लेने का और आगे बढ़ने का अवसर देते हैं। ये प्रश्न विचारों में उत्तेजना पैदा करते हैं और चर्चा को अधिक व्यापक बनाने में सहायक होते हैं।
3. “अपने महान राष्ट्र की पराधीनता के दीन दिनों में जिन लोगों ने अपने रक्त से गौरव के दीपक जलाए”, इस वाक्य में पराधीनता के दिनों को दीन कहा गया है क्योंकि पराधीन भारत में—
(क) भोजन, आवास और वस्त्र जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव था।
(ख) लोगों के आत्मसम्मान और गौरव की भावना का दमन होता था।
(ग) महत्वपूर्ण निर्णय लेने की स्वतंत्रता थी।
(घ) धार्मिक रीति-रिवाजों को मानने पर रोक लगाई जाती थी।
सही उत्तर – (ख) लोगों के आत्मसम्मान और गौरव की भावना का दमन होता था।
तर्क: गुलामी के दिनों में भारतीय नागरिकों को अपमानित होना पड़ता था और उनके माथे पर पराधीनता की लज्जा का कलंक लगा रहता था। ऐसे समय में व्यक्ति के पास चाहे स्वर्ग के भी साधन क्यों न हों, यदि उसका देश गुलाम है, तो उसे वास्तविक गौरव नहीं मिल सकता।
4. निबंध के अनुसार मनुष्य साधन-संपन्न होते हुए भी गौरव का अनुभव नहीं कर सकते यदि—
(क) उन्हें विदेश भ्रमण के अवसर न मिलें।
(ख) उनका देश किसी दूसरे देश के अधीन हो।
(ग) उनके नगर की शासन प्रणाली कमजोर हो।
(घ) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन होता हो।
सही उत्तर – (ख) उनका देश किसी दूसरे देश के अधीन हो।
तर्क: लेखक का मानना है कि व्यक्ति की पहचान उसके राष्ट्र से जुड़ी होती है। यदि देश गुलाम या किसी रूप में नीच (पराधीन) है, तो व्यक्ति के निजी सुख-साधन और उपहार उसे गौरव प्रदान नहीं कर सकते क्योंकि उसके राष्ट्र का सम्मान सुरक्षित नहीं होता।
5. “पर उन दो घटनाओं में वह गाँठ इतनी साफ है”, इस वाक्य में रेखांकित शब्द ‘गाँठ’ किन दो बातों को साथ बाँधती है?
(क) देश और नागरिक
(ख) देश और संविधान
(ग) देश और विदेश
(घ) व्यवसाय और आजीविका
सही उत्तर – (क) देश और नागरिक
तर्क: लेखक ने जापानी युवक और विदेशी छात्र की दो घटनाओं के माध्यम से यह समझाया है कि प्रत्येक नागरिक अपने देश के साथ गहराई से बँधा हुआ है। नागरिक का एक अच्छा कार्य देश का सिर ऊँचा करता है और एक गलत कार्य पूरे राष्ट्र के मस्तक पर कलंक का टीका लगा देता है।
6. प्रस्तुत निबंध में मुख्यतः कौन-सा भाव व्यक्त हुआ है?
(क) लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था
(ख) पारिवारिक संबंधों का महत्त्व
(ग) व्यक्ति और देश का अंतर्संबंध
(घ) देश का महत्त्व और व्यक्ति की उपेक्षा
सही उत्तर – (ग) व्यक्ति और देश का अंतर्संबंध
तर्क: यह निबंध मुख्य रूप से व्यक्ति और राष्ट्र के अविभाज्य संबंध को स्थापित करता है। लेखक का यह निष्कर्ष है कि देश का सम्मान और नागरिक का सम्मान एक-दूसरे से अटूट रूप से जुड़े हुए हैं और ‘मैं और मेरा देश’ दो अलग चीजें नहीं हैं।
मेरी समझ मेरे विचार
प्रश्न 1: स्वामी रामतीर्थ फल देने वाले युवक का उत्तर सुनकर मुग्ध क्यों हो गए?
उत्तर: स्वामी रामतीर्थ जापान में रेल यात्रा कर रहे थे और उन्हें खाने के लिए फल नहीं मिल पा रहे थे, जो कि उनका मुख्य भोजन था। जब उन्होंने निराशा में कहा कि “जापान में शायद अच्छे फल नहीं मिलते”, तो एक जापानी युवक ने इसे सुनकर तुरंत ताजे फलों की टोकरी लाकर उन्हें भेंट कर दी। जब स्वामी जी ने फलों का मूल्य देना चाहा, तो युवक ने पैसे लेने से इनकार कर दिया और केवल यह माँगा कि स्वामी जी अपने देश जाकर यह न कहें कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते। युवक का यह उत्तर सुनकर स्वामी जी मुग्ध हो गए क्योंकि उस युवक ने अपने एक छोटे से कार्य से अपने देश के गौरव और सम्मान की रक्षा की थी। युवक के लिए व्यक्तिगत लाभ से बड़ा उसके देश का सम्मान था।
प्रश्न 2: जापान के युवक ने स्वामी रामतीर्थ को दिए गए फलों के मूल्य के रूप में क्या माँगा? आपके मन में उस युवक के व्यक्तित्व की कौन-सी छवि उभरती है, यह भी लिखिए।
उत्तर: जापानी युवक ने फलों के मूल्य के रूप में स्वामी रामतीर्थ से यह वचन माँगा— “आप अपने देश में जाकर किसी से यह न कहिएगा कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते”। इस घटना से उस युवक के व्यक्तित्व की निम्नलिखित छवि उभरती है:
प्रगाढ़ राष्ट्रप्रेम: वह युवक अपने देश की छवि के प्रति अत्यंत संवेदनशील और जागरूक था।
निःस्वार्थ सेवा: उसने स्वामी जी की मदद किसी धन के लालच में नहीं, बल्कि अतिथि सत्कार और देश की प्रतिष्ठा बचाने के लिए की थी।
कर्तव्यनिष्ठ नागरिक: वह मानता था कि एक नागरिक का आचरण ही उसके देश का मस्तक ऊँचा या नीचा करता है। वह एक ऐसा सजग नागरिक था जो अपने देश के ‘शक्ति-बोध’ और ‘सौंदर्य-बोध’ को सशक्त करना जानता था।
प्रश्न 3: “बात यह है कि मैं और मेरा देश दो अलग चीज़ तो हैं ही नहीं।” स्वयं को देश से अलग न मानने के पीछे क्या तर्क हो सकते हैं, उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: लेखक का तर्क है कि व्यक्ति और राष्ट्र के बीच एक अविभाज्य संबंध होता है। व्यक्ति की पूर्णता केवल उसकी निजता में नहीं, बल्कि उसके परिवार, क्षेत्र और राष्ट्र की पहचान से जुड़ी होती है। इसके पीछे मुख्य तर्क निम्नलिखित हैं:
साझा सम्मान: यदि देश पराधीन या अपमानित है, तो व्यक्ति के पास स्वर्ग के साधन होने पर भी वह गौरव का अनुभव नहीं कर सकता। नागरिक का सम्मान और देश का सम्मान एक-दूसरे से अटूट रूप से जुड़े हैं।
आचरण का प्रभाव: नागरिक का हर छोटा-बड़ा कार्य देश की छवि पर प्रभाव डालता है।
उदाहरण: पाठ में दो विपरीत उदाहरण दिए गए हैं। एक ओर वह जापानी युवक है जिसने स्वामी जी को फल देकर अपने देश का सिर ऊँचा किया। दूसरी ओर एक अन्य विदेशी छात्र का उदाहरण है जिसने पुस्तकालय से दुर्लभ चित्र चुराए, जिसके कारण न केवल उसे देश से निकाला गया, बल्कि पुस्तकालय के बाहर बोर्ड लगा दिया गया कि उस देश का कोई भी निवासी वहाँ प्रवेश नहीं कर सकता। यह स्पष्ट करता है कि नागरिक का व्यक्तिगत आचरण पूरे राष्ट्र की प्रतिष्ठा निर्धारित करता है, इसलिए व्यक्ति और देश अलग नहीं हैं।
मेरे अनुभव मेरे विचार
प्रश्न 1: “देश की नीचता और गौरव का ही फल उसे नहीं मिलता, उसकी नीचता और गौरव का फल भी उसके देश को मिलता है”, अपने आस-पास के विभिन्न उदाहरणों के द्वारा इस पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इस पंक्ति का भाव यह है कि एक नागरिक का व्यक्तिगत आचरण और उसके देश की प्रतिष्ठा एक-दूसरे से अटूट रूप से जुड़े हुए हैं। पाठ में लेखक ने दो विपरीत उदाहरणों से इसे स्पष्ट किया है:
सकारात्मक उदाहरण: एक जापानी युवक ने स्वामी रामतीर्थ को ताजे फल भेंट किए और बदले में केवल यह माँगा कि स्वामी जी अपने देश जाकर जापान की बुराई न करें। इस छोटे से कार्य से उसने अपने देश का गौरव बढ़ाया।
नकारात्मक उदाहरण: एक अन्य विदेशी विद्यार्थी ने पुस्तकालय से दुर्लभ चित्र चुराए, जिसके कारण न केवल उसे देश से निकाला गया, बल्कि उसके पूरे देश के निवासियों पर उस पुस्तकालय में प्रवेश की रोक लगा दी गई। अतः हमारे छोटे-छोटे कार्य भी देश की वैश्विक छवि को ऊँचा या नीचा कर सकते हैं।
प्रश्न 2: “मुझे बहुतों की अपने लिए ज़रूरत पड़ती थी। मैं भी बहुतों की ज़रूरत का उनके लिए जवाब था।”
(क) प्रातःकाल से लेकर रात्रि तक आप अपने किन-किन कार्यों में किन-किनका क्या सहयोग लेते हैं और आप दूसरों को किस तरह का सहयोग देते हैं? अपने अनुभव लिखिए।
(ख) उपर्युक्त वाक्य में रेखांकित शब्द ‘बहुतों’ में कौन-कौन सम्मिलित होंगे, अनुमान के आधार पर लिखिए।
(ग) रचनाकार को स्वयं के लिए दूसरे लोगों से किस प्रकार के सहयोग की आवश्यकता पड़ती होगी और वह दूसरों को किस प्रकार का सहयोग देता होगा, अनुमान के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
(क) मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और वह समाज के सहयोग के बिना पूर्ण नहीं हो सकता। लेखक के अनुसार, उन्होंने अपने पड़ोसियों का ममता-दुलार पाया, नगर के विशाल समाज का संपर्क और संचित ज्ञान-भंडार का उपयोग किया। दैनिक जीवन में हम किसानों से अन्न, अध्यापकों से ज्ञान और सफाईकर्मियों से स्वच्छता का सहयोग लेते हैं, जबकि स्वयं अपनी सेवाओं द्वारा समाज की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं।
(ख) ‘बहुतों’ शब्द में परिवार, पड़ोसी, नगर के निवासी, विभिन्न पेशेवर लोग (जैसे डॉक्टर, किसान, वैज्ञानिक, कलाकार) और वे सभी लोग सम्मिलित हैं जो समाज की व्यवस्था को चलाने में योगदान देते हैं।
(ग) रचनाकार (लेखक) को अपने विचारों के प्रसार के लिए पाठकों, प्रकाशकों और आलोचकों के सहयोग की आवश्यकता होती है। बदले में वह अपने साहित्य के माध्यम से समाज को नई दिशा, विचारोत्तेजक प्रश्न और प्रेरणा प्रदान करता है।
प्रश्न 3: “सुना नहीं आपने कि जीवन एक युद्ध है और युद्ध में लड़ना ही तो काम नहीं होता।”
(क) उपर्युक्त वाक्य के रेखांकित अंश “युद्ध में लड़ना ही तो काम नहीं होता” के आधार पर लिखिए कि देश की प्रगति, विकास एवं सुरक्षा के प्रति हम सभी के क्या-क्या दायित्व हैं?
(ख) अपने पास-पड़ोस में विचरने वाले पशु-पक्षियों की जीवनचर्या का अवलोकन कीजिए और आप उनके संघर्षों को किस रूप में देखते हैं?
(ग) इस निबंध में जीवन को युद्ध क्यों कहा गया है?
(घ) देश की भौगोलिक सीमाओं की रक्षा सैनिक करते हैं। इसी तरह हमारे आस-पास हमारे जीवन को बेहतर बनाने के लिए अनेक लोग कार्यरत हैं। ये कौन-कौन लोग हैं और उनके लिए आप क्या-क्या कर सकते हैं?
उत्तर:
(क) देश की प्रगति के लिए केवल सीमा पर लड़ना ही पर्याप्त नहीं है; युद्ध में रसद (भोजन-सामग्री) पहुँचाने वाले किसानों और उत्साह बढ़ाने वाले नागरिकों (जैसे खेल में तालियाँ बजाने वाले दर्शक) का भी बहुत महत्व है। हमारा दायित्व है कि हम देश के ‘शक्ति-बोध’ और ‘सौंदर्य-बोध’ को सशक्त करें और कोई ऐसा कार्य न करें जिससे देश की गरिमा को ठेस पहुँचे।
(ख) पशु-पक्षियों के संदर्भ में उनका संघर्ष भोजन की तलाश और अस्तित्व की रक्षा तक सीमित है, जबकि मनुष्य का संघर्ष राष्ट्र के गौरव और आत्म-सम्मान से भी जुड़ा होता है।
(ग) जीवन को युद्ध इसलिए कहा गया है क्योंकि इसमें निरंतर पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है। आत्मनिर्भरता प्राप्त करना और पर-निर्भरता (गुलामी) का त्याग करना एक सतत संघर्ष है।
(घ) हमारे जीवन को बेहतर बनाने के लिए अध्यापक, किसान, श्रमिक, कलाकार, वैज्ञानिक और अभियंता (इंजीनियर) दिन-रात कार्य करते हैं। हम उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कर सकते हैं और नागरिक के रूप में अपने कर्तव्यों का सही ढंग से पालन कर उनकी सहायता कर सकते हैं।
प्रश्न 4: “अपने पड़ोस में खेलकर, पड़ोसियों की ममता-दुलार पा, बड़ा हुआ था।” (क) उपर्युक्त पंक्ति के आधार पर लिखिए कि पास-पड़ोस के लोगों में किस तरह के पारस्परिक संबंध रहे होंगे? (ख) वर्तमान समय में ऐसे संबंधों में किस तरह के परिवर्तन आए हैं और इसके क्या कारण हो सकते हैं? लिखिए।
उत्तर:
(क) लेखक के वर्णन से स्पष्ट है कि उस समय पड़ोस के लोगों में अत्यंत घनिष्ठ, आत्मीय और सहयोगपूर्ण संबंध थे। पड़ोसी एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी होते थे और बच्चों को पूरे समाज का ‘ममता-दुलार’ प्राप्त होता था।
(ख) वर्तमान समय में शहरीकरण और अत्यधिक व्यस्तता के कारण पड़ोसियों के बीच आत्मीयता कम हुई है। लोग प्रायः अपने निजी जीवन तक सीमित रहते हैं, जिससे सामूहिक ‘ज्ञान-भंडार’ और ‘ममता’ का वह पुराना स्वरूप बदल रहा है।
प्रश्न 5: “क्या कुरुचि और सौंदर्य को आपके किसी काम से ठेस लगती है?” अपने घर/विद्यालय के आस-पास, सार्वजनिक संसाधनों और ऐतिहासिक महत्व के स्थानों की स्वच्छता एवं सौंदर्य को बनाए रखने के लिए आप और आपके सहपाठी, संबंधी क्या-क्या करते हैं?
उत्तर: लेखक के अनुसार, सौंदर्य-बोध की कमी देश की संस्कृति को गहरी चोट पहुँचाती है। हम स्वच्छता बनाए रखने के लिए निम्नलिखित प्रयास कर सकते हैं:
रास्ते में केले के छिलके या घर का कूड़ा बाहर न फेंकना।
सार्वजनिक स्थानों और कोनों में न थूकना।
ऐतिहासिक स्थानों पर अपना नाम न लिखना और वहाँ की स्वच्छता का ध्यान रखना।
शिष्ठ भाषा का प्रयोग करना और कुरुचिपूर्ण आचरण से बचना।
प्रश्न 6: “मैं कोई ऐसा काम न करूँ जिससे मेरे देश की स्वतंत्रता को, दूसरे शब्दों में, उसके सम्मान को धक्का पहुँचे।” देश के सम्मान को धक्का न पहुँचे, इसके लिए क्या करें और क्या नहीं करें?
उत्तर: देश के सम्मान की रक्षा के लिए पाठ में निम्नलिखित सुझाव दिए गए हैं:
क्या करें: चुनाव में सही और योग्य व्यक्ति को अपना मत दें ताकि देश का नेतृत्व कुशल हाथों में रहे। हर छोटे कार्य को अच्छी भावना के साथ पूर्ण करें।
क्या न करें: दूसरों के सामने अपने देश की तुलना करके उसे हीन सिद्ध करने का प्रयास न करें, क्योंकि इससे देश के सामूहिक मानसिक बल का ह्रास होता है। भ्रष्टाचार, चोरी या कुरुचिपूर्ण आचरण (जैसे छिलके फेंकना या गंदगी फैलाना) न करें, क्योंकि ये कार्य पूरे राष्ट्र के मस्तक पर ‘कलंक का टीका’ लगा देते हैं।
मेरे प्रश्न
“यह सोचना एकदम निराधार है कि केवल संपन्न व्यक्ति ही देश की प्रगति और विकास में योगदान दे सकते हैं। देश की सुरक्षा का विषय हो अथवा ऐश्वर्य व संपन्नता का, सभी नागरिकों का अपनी ही तरह से योगदान होता है। हम सब नागरिक अपने देश का प्रतिनिधित्व करते हैं। हम यदि कुछ भी गलत करते हैं तो उससे अपनी छवि ही धूमिल नहीं होती अपितु अपने देश की छवि पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।”
इस सामग्री के आधार पर निर्मित तीन प्रश्न:
प्रश्न 1: क्या देश की प्रगति और विकास केवल साधन-संपन्न या अमीर व्यक्तियों के योगदान पर ही निर्भर है?
प्रश्न 2: देश की सुरक्षा और ऐश्वर्य के क्षेत्र में सामान्य नागरिकों की क्या भूमिका होती है?
प्रश्न 3: लेखक के अनुसार किसी नागरिक द्वारा किए गए गलत कार्य का उसके राष्ट्र की वैश्विक छवि पर क्या प्रभाव पड़ता है?
व्याकरण की बात
1. संदर्भ में शब्द
प्रश्न: अब अपनी पाठ्यपुस्तक में से ऐसे अन्य शब्द छाँटकर लिखिए जो संदर्भ के अनुसार भिन्न-भिन्न अर्थ देते हों।
उत्तर: पाठ में ‘दरार’, ‘गाँठ’ और ‘पानी’ जैसे शब्दों के उदाहरण देकर यह समझाया गया है कि संदर्भ बदलने पर शब्द का अर्थ बदल जाता है। इसी आधार पर पाठ से चुने गए कुछ अन्य शब्द और उनके भिन्न अर्थ निम्नलिखित हैं:
शक्ति:
संदर्भ 1 (देश का सामर्थ्य): “उनकी शक्तियों में किसी प्रकार की कमी आए”। यहाँ अर्थ है देश की सैन्य या आर्थिक ताकत।
संदर्भ 2 (मानसिक बल): “शक्ति-बोध को भयंकर चोट पहुँचा रहे हैं”। यहाँ अर्थ है मानसिक दृढ़ता या आत्मविश्वास।
मान:
संदर्भ 1 (सम्मान): “मैं अपने लाभ और सम्मान के लिए हर छोटी-छोटी बात पर ध्यान देता हूँ”। यहाँ अर्थ है आदर या प्रतिष्ठा।
संदर्भ 2 (मूल्य/नाप): “ऊँचाई और नीचता को माप-तोल सकें”। यहाँ ‘मान’ का अर्थ मापदंड या पैमाना है।
फल:
संदर्भ 1 (खाद्य वस्तु): “जापान में शायद अच्छे फल नहीं मिलते!”। यहाँ अर्थ है खाने वाला फल।
संदर्भ 2 (परिणाम): “नीचता और गौरव का फल भी उसके देश को मिलता है”। यहाँ अर्थ है कर्मों का परिणाम या नतीजा।
2. मिलते-जुलते भाव वाले ‘शब्द-युग्म’
प्रश्न: आप इस निबंध में से मिलते-जुलते अर्थ वाले और पुनरुक्त (एक ही शब्द को फिर से कहना) शब्द-युग्म छाँटकर लिखिए।
उत्तर: पाठ में प्रयुक्त ‘ममता-दुलार’ और ‘भरा-पूरा’ जैसे शब्द-युग्मों के आधार पर अन्य उदाहरण निम्नलिखित हैं:
मिलते-जुलते अर्थ वाले शब्द-युग्म (समानार्थी युग्म):
प्रगति और विकास: “देश की प्रगति और विकास में योगदान दे सकते हैं”।
अध्ययन और अनुभव: “जो कुछ जीवन में अध्ययन और अनुभव से सीखा है”।
ऐश्वर्य व संपन्नता: “सुरक्षा का विषय हो अथवा ऐश्वर्य व संपन्नता का”।
लाभ और सम्मान: “अपने लाभ और सम्मान के लिए हर छोटी-छोटी बात पर ध्यान देता हूँ”।
उपहार और साधन: “स्वर्ग के भी सब उपहार और साधन हों”।
पुनरुक्त शब्द-युग्म (एक ही शब्द की आवृत्ति):
छोटी-छोटी: “छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दूँ”।
बड़ी-बड़ी: “जाना दो बड़ी-बड़ी बातें”।
पूरा-पूरा: “सम्मान का पूरा-पूरा भाग मुझे मिले”।
खील-खील: “भाड़ खील-खील ही नहीं हो गया”।
3. शब्दों की कड़ियाँ/शृंखला (उपसर्ग और प्रत्यय)
प्रश्न: नीचे दिए गए शब्दों में उपसर्ग और प्रत्यय शब्द पहचानकर लिखिए— अलौकिक, निराकारता, सम्मानित, अनावश्यक, अपमानित, अभिमानी।
उत्तर: पाठ में दिए गए उदाहरण ‘अपूर्णता’ (अ + पूर्ण + ता) के अनुसार, इन शब्दों का विश्लेषण इस प्रकार है:
| शब्द | उपसर्ग | मूल शब्द | प्रत्यय |
|---|---|---|---|
| अलौकिक | अ | लोक | इक |
| निराकारता | निर् | आकार | ता |
| सम्मानित | सम् | मान | इत |
| अनावश्यक | अन् | आवश्यक | – |
| अपमानित | अप | मान | इत |
| अभिमानी | अभि | मान | ई |
नोट: ‘अनावश्यक’ शब्द में ‘अन्’ उपसर्ग है, लेकिन इसमें प्रत्यय का प्रयोग नहीं हुआ है। शेष शब्दों में उपसर्ग और प्रत्यय दोनों या किसी एक का प्रयोग संदर्भानुसार किया गया है।