दो बैलों की कथा
प्रश्न-उत्तर
‘मेरे उत्तर मेरे तर्क’
प्रश्न 1. कहानी में हीरा और मोती का आपसी संबंध किस गुण को मुख्य रूप से दर्शाता है?
(क) प्रतिस्पर्धा और प्रतिद्वंद्विता
(ख) एकता और सहयोग
(ग) गर्व और दंभ
(घ) विद्रोह और क्रोध
सही उत्तर: (ख) एकता और सहयोग
तर्क: हीरा और मोती में गहरा भाईचारा था। वे मूक-भाषा में एक-दूसरे के मन की बात समझ लेते थे और हल चलाते समय भी प्रत्येक की यही चेष्टा रहती थी कि ज्यादा बोझ उसकी अपनी गर्दन पर रहे।
प्रश्न 2. हीरा-मोती ने नया स्थान स्वीकार क्यों नहीं किया?
(क) उन्हें भरपेट भोजन दिया गया।
(ख) उन्हें बहुत मोटी रस्सी से बाँधा गया।
(ग) मालिक ने बेचा, यह सोचकर उन्हें अपमान लगा।
(घ) उन्हें अलग-अलग बाँधा गया।
सही उत्तर: (ग) मालिक ने बेचा, यह सोचकर उन्हें अपमान लगा
तर्क: जब झूरी ने उन्हें अपने साले गया के साथ भेजा, तो बैलों को लगा कि उनके मालिक ने उन्हें बेच दिया है। उन्हें लगा कि इतनी सेवा करने के बावजूद उन्हें बेचकर उनका अपमान किया गया है, इसलिए उनका मन भारी हो गया था।
प्रश्न 3. बैलों ने रस्सी तोड़कर घर लौटने का निर्णय क्यों लिया?
(क) कष्टों से बचने के लिए
(ख) स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए
(ग) अभिमान की रक्षा के लिए
(घ) अपनापन पाने के लिए
सही उत्तर: (ख) स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए
तर्क: यद्यपि वे अपने घर (झूरी के पास) लौटना चाहते थे, लेकिन मूल रूप से यह निर्णय गया के यहाँ की पराधीनता और बंधनों से मुक्त होने के लिए था। पाठ की भूमिका में भी स्पष्ट किया गया है कि यह कहानी स्वतंत्रता आंदोलन की भावना से जुड़ी है।
प्रश्न 4. गया द्वारा डंडे से मारने पर मोती का आक्रोश किस मानवीय मनोवृत्ति का द्योतक है?
(क) स्वाभिमान
(ख) अहिंसा
(ग) पराधीनता
(घ) अन्याय की रक्षा
सही उत्तर: (क) स्वाभिमान
तर्क: जब गया ने हीरा की नाक पर डंडे मारे, तो मोती का गुस्सा बेकाबू हो गया और वह हल लेकर भाग निकला। यह अन्याय के प्रति विद्रोह और अपने साथी के प्रति संवेदना के साथ-साथ उनके स्वाभिमान को दर्शाता है।
प्रश्न 5. कहानी में बैलों की ‘मूक-भाषा’ का प्रयोग लेखक ने किस लिए किया?
(क) कहानी को रोचक बनाने के लिए
(ख) मनुष्य जैसी चेतना दिखाने के लिए
(ग) संवादों को छोटा रखने के लिए
(घ) कथा में हास्य उत्पन्न करने के लिए
सही उत्तर: (ख) मनुष्य जैसी चेतना दिखाने के लिए
तर्क: लेखक ने मूक-भाषा के माध्यम से यह दिखाया है कि पशुओं में भी गहरी समझ, विचार-विमर्श और मानवीय भावनाएँ होती हैं। उनमें ऐसी ‘गुप्त शक्ति’ थी जिससे श्रेष्ठता का दावा करने वाला मनुष्य भी वंचित है।
प्रश्न 6.‘दो बैलों की कथा’ को यदि स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ें, तो हीरा और मोती किसके प्रतीक हो सकते हैं?
(क) भारत पर अंग्रेजों के क्रूर और अन्यायपूर्ण शासन के
(ख) स्वतंत्रता संग्राम में पशुओं के योगदान के
(ग) सत्याग्रह और अहिंसा के आंदोलन के
(घ) स्वतंत्रता के लिए भारतीय जनता के संघर्ष के
सही उत्तर: (घ) स्वतंत्रता के लिए भारतीय जनता के संघर्ष के
तर्क: पाठ के अनुसार, यह कहानी परोक्ष रूप से स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी है। हीरा और मोती का बार-बार बंधनों को तोड़ना, काँजीहौस जैसी जेल से भागना और अंततः अपने घर पहुँचना, विदेशी शासन के विरुद्ध भारतीय जनता के निरंतर संघर्ष और अदम्य साहस का प्रतीक है।
मेरी समझ मेरे विचार
प्रश्न 1: “दूसरे दिन गया ने बैलों को हल में जोता, पर इन दोनों ने जैसे पाँव न उठाने की कसमे खा ली थी।” जब बैल नए मालिक के यहाँ गए, तो उन्होंने काम करने से इनकार क्यों कर दिया था?
उत्तर: हीरा और मोती को लगा कि उनके मालिक झूरी ने उन्हें बेच दिया है, जिससे उन्हें बहुत ठेस पहुँची और अपमान महसूस हुआ। नए स्थान (गया के घर) पर उन्हें अपनापन नहीं मिला; वहाँ उन्हें रूखा-सूखा भूसा दिया गया और गया उन्हें निर्दयता से डंडों से मारता था। झूरी के यहाँ वे प्यार और पुचकार के साथ काम करने के आदी थे, इसलिए गया के यहाँ उन्होंने विरोध स्वरूप पाँव न उठाने की कसम खा ली थी।
प्रश्न 2: “गाँव के इतिहास में यह घटना अभूतपूर्व न होने पर भी महत्त्वपूर्ण थी।” बैलों का घर लौट आना कोई साधारण घटना नहीं है। कैसे?
उत्तर: यह घटना साधारण इसलिए नहीं थी क्योंकि यह मूक पशुओं के अपने घर और मालिक के प्रति अगाध प्रेम और स्वाधीनता की चेतना को दर्शाती थी। बैलों ने अपनी रस्सियाँ तोड़कर और मिलों की दूरी तय कर घर वापसी की थी। उनकी इस वफादारी को देखकर गाँव के बच्चे मंत्रमुग्ध हो गए, उन्हें ‘पशु-वीर’ की उपाधि दी गई और उनका स्वागत तालियों व रोटियों से किया गया। एक बालक ने तो यहाँ तक कहा कि वे बैल नहीं, उस जन्म के आदमी हैं।
प्रश्न 3: “मोती ने मूक-भाषा में कहा— अब तो नहीं सहा जाता, हीरा!” ‘कभी-कभी संघर्ष करना आवश्यक हो जाता है’ इस कथन को कहानी के उदाहरणों से सिद्ध कीजिए।
उत्तर: कहानी में हीरा-मोती के माध्यम से लेखक ने दिखाया है कि बिना संघर्ष के स्वतंत्रता नहीं मिलती। इसके प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं:
- गया के अत्याचार के विरुद्ध उन्होंने हल, जुआ और रस्सियाँ तोड़कर विरोध जताया।
- रास्ते में मिले खूँखार साँड़ से अपनी जान बचाने के लिए उन्होंने संगठित होकर संघर्ष किया और उसे पराजित किया।
- काँजीहौस की जेल में अपनी और अन्य पशुओं की आज़ादी के लिए उन्होंने कच्ची दीवार तोड़ डाली।
- अंत में दढ़ियल कसाई से अपना जीवन बचाने के लिए उन्होंने उसे खदेड़कर संघर्ष का परिचय दिया।
प्रश्न 4: “जब पेट भर गया और दोनों ने आज़ादी का अनुभव किया…” हीरा एवं मोती ‘स्वतंत्रता’ और ‘अपनापन’ दोनों में से किस भावना से अधिक प्रेरित थे? कारण सहित लिखिए।
उत्तर: हीरा और मोती ‘अपनापन’ की भावना से अधिक प्रेरित थे। हालाँकि उन्होंने स्वतंत्रता के लिए कड़ा संघर्ष किया, लेकिन उनका अंतिम लक्ष्य झूरी का घर और उसका स्नेह पाना ही था। उनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ झूरी के पास सुरक्षित पहुँचना था। जब वे अंततः अपने पुराने ‘थान’ पर पहुँचे और झूरी ने उन्हें गले लगाया, तो उनकी आँखों से आनंद के आँसू बहने लगे, जो उनके अटूट लगाव और अपनेपन को सिद्ध करता है।
प्रश्न 5: “बैलों ने जैसे पाँव न उठाने की कसमे खा ली थी।” ‘अत्याचार सहना भी अन्याय में भागीदारी है’— क्या आप इस कथन से सहमत हैं? अपने उत्तर के कारण भी बताइए।
उत्तर: हाँ, मैं इस कथन से पूर्णतः सहमत हूँ। लेखक ने गधे के उदाहरण से स्पष्ट किया है कि सीधापन और अत्यधिक सहनशीलता अक्सर ‘बेवकूफी’ मान ली जाती है, जो अन्याय को बढ़ावा देती है। कहानी में यदि हीरा और मोती गया के डंडे चुपचाप सहते रहते, तो वे जीवनभर दास बने रहते। उनके द्वारा किए गए विरोध ने ही उन्हें अंततः आज़ादी दिलाई। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के संदर्भ में भी लेखक यही संदेश देना चाहते हैं कि अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना ज़रूरी है।
प्रश्न 6: “बहुत दिनों साथ रहते-रहते दोनों में भाईचारा हो गया था।” हीरा और मोती अभिन्न मित्र थे। कहानी की किन-किन घटनाओं के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है? कम से कम तीन बिंदु लिखिए।
उत्तर: हीरा और मोती की प्रगाढ़ मित्रता इन घटनाओं से स्पष्ट होती है:
- मूक संवाद और सहयोग: दोनों बिना बोले एक-दूसरे के मन की बात समझ लेते थे और हल चलाते समय प्रत्येक की चेष्टा रहती थी कि बोझ उसकी गर्दन पर अधिक रहे।
- विपत्ति में साथ न छोड़ना: जब मटर के खेत में मोती पकड़ा गया, तो हीरा उसे अकेला छोड़कर नहीं भागा और स्वयं भी पकड़ाई में आ गया।
- काँजीहौस का त्याग: जब काँजीहौस की दीवार टूटी, तो मोती चाहता तो भाग सकता था, लेकिन हीरा को रस्सी में बँधा देखकर वह वहीं रुक गया और मार खाना स्वीकार किया।
प्रश्न 7: “उसी समय मालकिन ने आकर दोनों के माथे चूम लिए।” कहानी में मालकिन और छोटी लड़की, दोनों के व्यवहार की तुलना कीजिए।
उत्तर: मालकिन और छोटी लड़की के व्यवहार में गहरा अंतर और अंत में समानता दिखाई देती है:
- छोटी लड़की: वह निस्वार्थ प्रेम और करुणा की प्रतिमूर्ति थी। वह स्वयं अपनी सौतेली माँ के व्यवहार से दुखी थी, इसलिए बैलों के दर्द को समझती थी और उन्हें रोज़ छुपकर रोटियाँ खिलाती थी। उसने ही उनकी रस्सियाँ खोलकर उन्हें आज़ाद किया था।
- मालकिन: झूरी की पत्नी शुरुआत में बैलों के भागने पर बहुत क्रोधित हुई थी और उन्हें ‘नमक-हराम’ कहा था। उसने उन्हें सूखा भूसा खिलाने का निर्देश दिया था।
- तुलना: लड़की का प्रेम सहानुभूति पर आधारित था, जबकि मालकिन का व्यवहार परिस्थिति के अनुसार बदला। अंत में बैलों की वफादारी और संघर्ष देखकर मालकिन का हृदय पिघल गया और उन्होंने ममता के साथ उनके माथे चूम लिए।
मेरी कल्पना मेरे अनुमान
प्रश्न 1: “उसने उनके माथे सहलाए और बोली– खोले देती हूँ। चुपके से भाग जाओ…” यदि आप वह छोटी लड़की होते, तो बैलों की मदद किस प्रकार करते?
उत्तर: यदि मैं वह छोटी लड़की होता, तो बैलों की मदद अत्यंत संवेदनशीलता और सावधानी के साथ करता। पाठ के अनुसार, वह लड़की स्वयं अनाथ थी और सौतेली माँ के व्यवहार से दुखी थी, इसलिए वह बैलों के दर्द को अपनी आत्मीयता से जोड़कर देख पाती थी। मेरी मदद के तरीके निम्नलिखित होते:
- मैं न केवल उनकी रस्सियाँ खोलता, बल्कि उन्हें रास्ते के लिए कुछ अतिरिक्त भोजन भी उपलब्ध कराने की कोशिश करता ताकि भूख के कारण वे फिर से मुसीबत में न पड़ें।
- मैं उन्हें चुपचाप घर के पिछले रास्ते से बाहर निकालता ताकि गया या घर के अन्य लोगों को उनके भागने का तुरंत पता न चले।
प्रश्न 2: “दोनों गधे अभी तक ज्यों-के-त्यों खड़े थे।” भय और संकोच इंसान को अवसर मिलने पर भी जकड़े रखता है। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? इस वाक्य के संबंध में कहानी और अपने अनुभवों से उदाहरण लेते हुए अपने विचार लिखिए।
उत्तर: हाँ, मैं इस कथन से पूरी तरह सहमत हूँ कि भय और संकोच किसी भी प्राणी को प्राप्त अवसर का लाभ उठाने से रोक देते हैं। कहानी और अनुभवों के आधार पर इसके तर्क निम्नलिखित हैं:
- कहानी का उदाहरण: काँजीहौस में जब मोती ने दीवार तोड़ दी और घोड़ियाँ, बकरियाँ व भैंसें भाग निकलीं, तब भी गधे वहीं खड़े रहे। जब हीरा ने उनसे भागने को कहा, तो उन्होंने संकोचवश उत्तर दिया कि “कहीं फिर पकड़ लिए जाएँ तो क्या होगा?”। यह अज्ञात भविष्य का भय ही था जिसने उन्हें आज़ादी के द्वार खुलने पर भी गुलामी में बने रहने पर मजबूर किया।
- मानवीय स्वभाव: ठीक इसी तरह, कई बार मनुष्य भी अपनी समस्याओं से बाहर निकलने का अवसर मिलने पर भी केवल इसलिए कदम नहीं उठाता क्योंकि वह बदलाव से डरता है या पुराने बंधनों में रहने का आदी हो जाता है।
- निष्कर्ष: गधों की यह स्थिति उनकी ‘निरापद सहिष्णुता’ और अत्यधिक सीधेपन को भी दर्शाती है, जिसे समाज अक्सर ‘बेवकूफी’ का नाम दे देता है। इसके विपरीत, हीरा और मोती हमें सिखाते हैं कि स्वतंत्रता पाने के लिए भय का त्याग कर बार-बार संघर्ष करना आवश्यक है।
‘हमारी धरोहर और संस्कृति’
प्रश्न 1: “वह अपना धर्म छोड़ दे लेकिन हमें अपना धर्म क्यों छोड़ें!” कहानी के अनुसार हीरा और मोती सदैव ध्यान रखते थे कि कौन-से कार्य करने योग्य हैं और कौन-से नहीं। वे कौन-कौन से कार्य कभी नहीं करते थे?
उत्तर: हीरा और मोती पशु होते हुए भी उच्च मानवीय और नैतिक मूल्यों का पालन करते थे। पाठ के आधार पर वे निम्नलिखित कार्य कभी नहीं करते थे:
- गिरे हुए शत्रु पर वार न करना: जब उन्होंने संगठित होकर खूँखार साँड़ को पराजित कर दिया और वह बेदम होकर गिर पड़ा, तब मोती उसे मार डालना चाहता था, लेकिन हीरा ने उसे यह कहकर रोक दिया कि “गिरे हुए बैरी पर सींग न चलाना चाहिए”.
- स्त्री पर हाथ (सींग) न उठाना: जब मोती गया की पत्नी (मालकिन) को सींग मारकर फेंक देने की बात करता है, तो हीरा उसे याद दिलाता है कि “औरत जात पर सींग चलाना मना है”. वे अपनी मर्यादा का कभी उल्लंघन नहीं करते थे.
- मित्र को विपत्ति में अकेला न छोड़ना: हीरा और मोती ने कभी एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ा। जब मटर के खेत में मोती पकड़ा गया, तो हीरा भाग सकता था, पर वह अपने मित्र के लिए खुद भी पकड़ाई में आ गया. इसी तरह काँजीहौस में मोती ने रस्सी से बँधे हीरा को छोड़कर भागने से इनकार कर दिया.
- अपने ‘धर्म’ का त्याग न करना: वे मृत्यु के भय से भी अपने सिद्धांतों से पीछे नहीं हटते थे। हीरा का मानना था कि चाहे कोई अपना धर्म छोड़ दे, पर हमें अपना श्रेष्ठ आचरण नहीं छोड़ना चाहिए.
प्रश्न 2: “गिरे हुए बैरी पर सींग न चलाना चाहिए।” “लेकिन औरत जात पर सींग चलाना मना है, यह भूले जाते हो।” हीरा के ये कथन किन भारतीय मूल्यों की ओर संकेत करते हैं?
उत्तर: हीरा के ये कथन गहरे भारतीय सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों की ओर संकेत करते हैं:
- नारी के प्रति सम्मान: “स्त्री जाति पर सींग चलाना मना है” का विचार भारतीय समाज के उस पुरातन मूल्य को दर्शाता है जहाँ नारी को सम्माननीय और अबध्य (वध न करने योग्य) माना गया है. यह पशुओं के माध्यम से मनुष्यों को दी गई एक नैतिक शिक्षा है।
- युद्ध की नैतिकता और क्षमादान: “गिरे हुए बैरी पर सींग न चलाना” प्राचीन भारतीय युद्ध-नीति का हिस्सा रहा है, जिसके अनुसार शरण में आए हुए या असहाय शत्रु पर प्रहार करना कायरता माना जाता है. यह वीरता के साथ दया और क्षमा के संतुलन को दर्शाता है।
- नैतिक दृढ़ता: ये कथन स्पष्ट करते हैं कि विपरीत परिस्थितियों में भी व्यक्ति को अपने आदर्शों और मर्यादाओं का त्याग नहीं करना चाहिए. ये मूल्य ही मनुष्य को अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ और ‘सभ्य’ बनाते हैं.
प्रश्न 3: “दूसरे दिन गया ने बैलों को हल में जोता” (क) खेतों में जुताई के लिए बैल और हल कृषि के पारंपरिक उपकरण हैं। कृषि के अन्य पारंपरिक और आधुनिक उपकरणों तथा उनके उपयोग के विषय में पता लगाइए और लिखिए। (ख) भारत में बैल केवल पशु नहीं बल्कि कृषि संस्कृति का अभिन्न अंग हैं। लिखिए कि भारतीय गाँवों एवं शहरों में भी बैल किस-किस काम में सहायक होते हैं?
उत्तर: (क) कृषि उपकरण:
- पारंपरिक उपकरण (पाठ के अनुसार): हल (जुताई के लिए), जुआ (बैलों के कंधों पर रखने के लिए), जोत (रस्सियाँ), और कुएँ से पानी निकालने के लिए ‘पुर’.
- आधुनिक उपकरण (स्रोत से बाहर की जानकारी): वर्तमान में खेती के लिए ट्रैक्टर, कंबाइन हार्वेस्टर (फसल कटाई के लिए), और बिजली के पंपों का उपयोग किया जाता है (कृपया इसे स्वतंत्र रूप से सत्यापित करें क्योंकि यह मूल स्रोतों में नहीं है)।
(ख) बैलों की उपयोगिता: भारत में बैल कृषि संस्कृति के आधार रहे हैं:
- गाँवों में: वे मुख्य रूप से खेत जोतने, गाड़ी खींचने (बोझा ढोने) और कुएँ से सिंचाई के लिए ‘पुर’ चलाने के काम आते हैं. वे खाद के लिए गोबर भी उपलब्ध कराते हैं।
- शहरों में: पुराने समय में और आज भी कुछ क्षेत्रों में बैलगाड़ियों का उपयोग भारी माल ढोने और मंडियों तक अनाज पहुँचाने के लिए किया जाता है.
- सांस्कृतिक महत्व: बैल केवल श्रम का साधन नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य की तरह होते हैं, जिनका स्वागत त्योहारों पर रोटियों और स्नेह के साथ किया जाता है।
अलग-अलग और साथ-साथ
प्रश्न 1: कहानी के आधार पर हीरा और मोती की विशेषताएँ लिखिए। (संकेत– धैर्यवान, गुस्सैल, मेहनती, शांत, सहनशील आदि)
उत्तर: हीरा और मोती दोनों ही पछाहीं जाति के सुंदर, चौकस और डील-डौल में ऊँचे बैल थे, लेकिन उनके स्वभाव में सूक्ष्म अंतर थे।
- हीरा की विशेषताएँ: हीरा स्वभाव से गंभीर, शांत और सहनशील था। वह नैतिक मर्यादाओं का पालन करने वाला था; जैसे शत्रु को क्षमा करना और स्त्रियों पर हमला न करना उसके जीवन के नियम थे।
- मोती की विशेषताएँ: मोती थोड़ा गुस्सैल और विद्रोही स्वभाव का था। वह अन्याय को चुपचाप सहने के बजाय उसका जवाब देने में विश्वास रखता था, जैसा कि उसने गया के यहाँ और दढ़ियल कसाई के सामने दिखाया।
- साझा विशेषताएँ: दोनों ही अत्यंत मेहनती थे और अपने मालिक झूरी के प्रति वफादार थे। उनमें अगाध मित्रता और आत्मीयता थी; वे एक-दूसरे का बोझ अपनी गर्दन पर लेने की कोशिश करते थे और मुसीबत में कभी एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ते थे।
प्रश्न 2: हीरा और मोती की विशेषताएँ कुछ-कुछ समान और कुछ-कुछ अलग हैं, किंतु उनकी भिन्न विशेषताएँ एक-दूसरे को पूरा करती हैं। कैसे?
उत्तर: हीरा और मोती का व्यक्तित्व एक-दूसरे का पूरक था। जहाँ मोती का आवेश और विद्रोह उन्हें बंधनों से मुक्त करने की प्रेरणा देता था, वहीं हीरा का संयम और नीति-ज्ञान उन्हें विनाशकारी परिणामों से बचाता था। उदाहरण के लिए, जब गया ने हीरा पर डंडे बरसाए, तो मोती आक्रोश में हल-जुआ लेकर भाग निकला, लेकिन हीरा ने अपनी सहनशीलता से स्थिति को सँभाला। वहीं, काँजीहौस में मोती की आक्रामक कोशिशों और दीवार तोड़ने के साहस ने ही अंततः उन्हें और अन्य पशुओं को आज़ादी का रास्ता दिखाया। हीरा की दूरदर्शिता और मोती की शक्ति का यह तालमेल ही उनकी हर जीत का आधार बना।
प्रश्न 3: आपकी कक्षा में भी कुछ-कुछ समान और कुछ-कुछ भिन्न विशेषताओं वाले सहपाठी हैं। सबकी आवश्यकताएँ भी थोड़ी समान और थोड़ी भिन्न हैं। बताइए कि आप भिन्न विशेषताओं वाले सहपाठी से अपने लिए कैसा व्यवहार चाहते हैं? उनसे पता कीजिए कि वे आपसे अपने लिए कैसा व्यवहार चाहते हैं? (संकेत– क्या-क्या करें और क्या-क्या न करें, कैसे पढ़ाई खेल आदि में एक-दूसरे की सहायता करें और साथ दें)
उत्तर: हीरा और मोती की तरह ही कक्षा में भी विविध स्वभाव वाले छात्र होते हैं। एक आदर्श सहपाठी से हम सम्मान, सहयोग और सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार की अपेक्षा करते हैं।
- सहयोग: यदि कोई छात्र पढ़ाई में अच्छा है और दूसरा खेल में, तो उन्हें एक-दूसरे की क्षमताओं का लाभ उठाकर आपसी कमियों को पूरा करना चाहिए।
- व्यवहार: हमें एक-दूसरे की व्यक्तिगत भिन्नताओं का मज़ाक नहीं उड़ाना चाहिए बल्कि मुसीबत के समय (जैसे बीमारी या नोट्स की कमी) में हीरा और मोती की तरह डटकर साथ देना चाहिए।
- अपेक्षाएँ: अन्य छात्र भी चाहते हैं कि उनके साथ बिना किसी भेदभाव के मित्रतापूर्ण व्यवहार किया जाए और ग्रुप प्रोजेक्ट्स या खेलों में सबको समान अवसर मिलें।
प्रश्न 4: “दोनों आमने-सामने या आस-पास बैठे हुए एक-दूसरे से मूक-भाषा में विचार-विनिमय करते थे।” कहानी में अनेक स्थानों पर ‘मूक-भाषा’ का उल्लेख किया गया है। आपके विचार से हीरा और मोती किस प्रकार आपस में बातें किया करते होंगे? अनुमान और कल्पना से बताइए।
उत्तर: पाठ के अनुसार, पशुओं में एक ऐसी ‘गुप्त शक्ति’ होती है जिससे वे एक-दूसरे के मन की बात समझ लेते हैं। हीरा और मोती की बातचीत के तरीके कुछ इस प्रकार रहे होंगे:
- शारीरिक चेष्टाएँ: वे एक-दूसरे को चाटकर और सूँघकर अपना प्रेम प्रकट करते थे और कभी-कभी विनोद में सींग भी मिला लेते थे।
- संकेत और दृष्टि: वे आँखों के इशारों (कनखियों) से एक-दूसरे को देखकर सलाह मशविरा करते थे।
- भावनात्मक जुड़ाव: जब कोई खतरा आता था (जैसे साँड़ का हमला), तो वे एक-दूसरे के चेहरे के भावों और मूक संकेतों से तुरंत समझ जाते थे कि अब मिलकर आक्रमण करना है या रक्षा करनी है।
प्रश्न 5: आप भी अनेक अवसरों पर बिना शब्दों का उच्चारण किए संवाद करते हैं। कब-कब? कहाँ-कहाँ? कुछ उदाहरण लिखिए।
उत्तर: मनुष्य भी दैनिक जीवन में कई स्थानों पर सांकेतिक या मूक-भाषा का प्रयोग करता है:
- कक्षा में: जब शिक्षक पढ़ा रहे हों, तब छात्र आपस में इशारों से पेन माँगने या किसी बात पर हँसने के लिए संकेतों का उपयोग करते हैं।
- खेल के मैदान में: क्रिकेट या फुटबॉल जैसे खेलों में खिलाड़ी दूर से ही नज़रें मिलाकर या हाथ के संकेतों से रणनीति बनाते हैं।
- सार्वजनिक स्थानों पर: पुस्तकालय या अस्पताल जैसे शांत क्षेत्रों में हम अक्सर सिर हिलाकर या आँखों के इशारे से ‘हाँ’ या ‘ना’ में उत्तर देते हैं।
- घर पर: कभी-कभी माता-पिता की केवल एक सख्त नज़र ही बच्चों को उनकी गलती का अहसास कराने या उन्हें रोकने के लिए काफी होती है।