मुगल वंश
मुगल वंश का संस्थापक बाबर था। बाबर एवं उत्तरवर्त्ती मुगल शासक तुर्क एवं सुन्नी मुसलमान थे। बाबर ने मुगल वंश की स्थापना के साथ ही पद – पादशाही की स्थापना की, जिसके तहत शासक को बादशाह कहा जाता था।
बाबर (1526-1530 ई०)
बाबर का जन्म 24 फरवरी, 1483 ई० में हुआ था। इसके पिता उमरशेख मिर्जा फरगाना नामक छोटे राज्य के शासक थे। बाबर फरगाना की गद्दी पर 8 जून, 1494 ई० में बैठा। बाबर ने 1507 ई० में बादशाह की उपाधि धारण की। बाबर के चार पुत्र थे- हुमायूँ, कामरान, असकरी तथा हिंदाल। बाबर ने भारत पर पाँच बार आक्रमण किया। बाबर का भारत के विरुद्ध किया गया प्रथम अभियान 1519 ई० में युसूफ जाई जाति के विरुद्ध था। इस अभियान में बाबर ने बाजौर और भेरा को अपने अधिकार में कर लिया। बाबर को भारत पर आक्रमण करने का निमंत्रण पंजाब के शासक दौलत खाँ लोदी एवं मेवाड़ के शासक राणा साँगा ने दिया था। उस्ताद अली एवं मुस्तफा बाबर के दो प्रसिद्ध निशानेबाज थे, जिसने पानीपत के प्रथम युद्ध में भाग लिया था । बाबर को अपनी उदारता के लिए कलन्दर की उपाधि दी गयी । करीब 48 वर्ष की आयु में 26 दिसम्बर, 1530 ई० को आगरा में बाबर की मृत्यु हो गयी। प्रारंभ में बाबर के शव को आगरा के आरामबाग में दफनाया गया, बाद में काबुल में उसके द्वारा चुने गए स्थान पर दफनाया गया। बाबर ने अपनी आत्मकथा बाबरनामा की रचना की, जिसका अनुवाद बाद में फारसी भाषा में अब्दुल रहीम खानखाना ने किया। बाबर को मुबईयान नामक पद्यशैली का भी जन्मदाता माना जाता है। बाबर प्रसिद्ध नक्शबन्दी सूफी ख्वाजा उबैदुल्ला अहरार का अनुयायी था। बाबर का उत्तराधिकारी हुमायूँ हुआ।
बाबर द्वारा लड़े गए प्रमुख युद्ध
| युद्ध | वर्ष | पक्ष | परिणाम |
| पानीपत का प्रथम युद्ध | 21/04/1526 | इब्राहिम लोदी एवं बाबर | बाबर विजयी (पानीपत के प्रथम युद्ध में बाबर ने पहली बार तुगलमा युद्ध नीति एवं तोपखाने का प्रयोग किया था) इब्राहिम लोदी मध्यकाल का प्रथम शासक था जो युद्धस्थल में मारा गया । इसके साथ उसका मित्र ग्वालियर के राजा विक्रमजीत भी युद्धस्थल में मारा गया । |
| खानवा का युद्ध | 17/03/1527 | राणा साँगा एवं बाबर | बाबर विजयी (खानवा युद्ध में विजय के बाद बाबर ने ‘गाजी’ की उपाधि धारण की थी।) 30 जनवरी, 1528 को जहर दे देने के कारण राणा साँगा की मृत्यु हो गई। |
| चन्देरी का युद्ध | 29/01/1528 | मेदनी राय एवं बाबर | बाबर विजयी |
| घाघरा का युद्ध | 06/05 1529 | अफगानों एवं बाबर | बाबर विजयी |
नोट : हुमायूँ ने कोहिनूर हीरा ग्वालियर के दिवंगत राजा विक्रमजीत के परिवार से प्राप्त किया था ।
हुमायूँ (1530 – 1540 ई० तथा 1555-1556 ई0)
इसका पूरा नाम नसीरुद्दीन हुमायूँ था। यह 29 दिसम्बर, 1530 ई० को आगरा में 23 वर्ष की अवस्था में सिंहासन पर बैठा। गद्दी पर बैठने से पहले हुमायूँ बदख्शाँ का सूबेदार था। अपने पिता की इच्छा पर हुमायूँ ने अपने राज्य का बँटवारा अपने भाइयों में इस प्रकार किया-
| कामरान | काबुल और कंधार |
| मिर्जा असकरी | संभल |
| मिर्जा हिंदाल | अलवर एवं मेवाड़ |
| चचेरे भाई सुलेमान मिर्जा | बदख्शाँ प्रदेश |
1533 ई0 में हुमायूँ ने दीनपनाह नामक नए नगर की स्थापना की थी। शेर खाँ एवं हुमायूँ के बीच चौसा का युद्ध 25 जून, 1539 ई० में हुआ। इस युद्ध में शेर खाँ विजयी रहा। इसी युद्ध के बाद शेर खाँ ने शेरशाह की पदवी ग्रहण कर ली। 17 मई, 1540 ई० में शेर खाँ एवं हुमायूँ के बीच बिलग्राम या कन्नौज युद्ध हुआ। इसमें भी हुमायूँ हार गया। शेर खाँ ने आसानी से आगरा एवं दिल्ली पर कब्जा कर लिया। बिलग्राम युद्ध के बाद हुमायूँ सिन्ध चला गया, वहाँ हुमायूँ ने 15 वर्षों तक घुमक्कड़ों जैसा जीवन व्यतीत किया। निर्वासन के दौरान हमीदा बानू बेगम से 29 अगस्त, 1541 ई० को निकाह कर लिया। हमीदा हिन्दाल के आध्यात्मिक गुरु फारसवासी शिया मीर बाबा दोस्त उर्फ मीर अली अकबर जामी की पुत्री थी। हमीदा से ही अकबर का जन्म हुआ। 1555 में हुमायूँ ने पंजाब के शूरी शासक सिकन्दर को पराजित कर पुनः दिल्ली की गद्दी पर बैठा। हुमायूँ की मृत्यु 1 जनवरी, 1556 ई० को दीन पनाह भवन में स्थित पुस्तकालय की सीढ़ियों से गिरने के कारण हो गयी। हुमायूँनामा की रचना गुलबदन बेगम ने की थी। हुमायूँ ज्योतिष में विश्वास करता था, इसलिए इसने सप्ताह के सातों दिन सात रंग के कपड़े पहनने के नियम बनाए। हुमायूँ द्वारा लड़े गए चार प्रमुख युद्धों का क्रम है :
| युद्ध स्थल | युद्ध काल | शासक | विजयी |
| देवरा | (1531 ई०) | हुमायूँ और महमूद लोदी | हुमायूँ |
| चौसा | (1539) | हुमायूँ और शेर खाँ | शेर खाँ |
| बिलग्राम | (1540) | हुमायूँ और शेर खाँ | शेर खाँ |
| सरहिन्द | (1555 ई०) | हुमायूँ और सिकन्दर शाह सूरी | हुमायूँ |
शेरशाह (1540- 1545 ई०)
अफगान वंशीय शेरशाह सूरी ने सूर साम्राज्य का संस्थापना की। इसका जन्म 1472 ई० में बजवाड़ा (होशियारपुर) में हुआ था। शेरशाह सूरी के बचपन का नाम फरीद खाँ था। शेरशाह सूरी के पिता हसन खाँ जौनपुर राज्य के अन्तर्गत सासाराम के जमींदार थे। फरीद ने एक शेर को तलवार से मार दिया था। इससे खुश होकर बिहार के अफगान शासक सुल्तान मुहम्मद बहार खाँ लोहानी ने उसे शेर खाँ की उपाधि प्रदान की। शेरशाह बिलग्राम युद्ध (1540 ई०) के बाद दिल्ली की गद्दी पर बैठा। मलिक मुहम्मद जायसी शेरशाह के समकालीन थे। शेरशाह की मृत्यु कालिंजर के किले को जीतने के क्रम में 22 मई, 1545 ई० को हो गयी। उस समय कालिंजर का शासक कीरत सिंह था। मृत्यु के समय शेरशाह उक्का नामक आग्नेयास्त्र चला रहा था। शेरशाह का मकबरा सासाराम में झील के बीच ऊंचे टीले पर निर्मित किया गया है। शेरशाह का उत्तराधिकारी उसका पुत्र इस्लाम शाह था।
शेरशाह द्वारा किए गए कार्य
- रोहतासगढ़ किला, किला-ए-कुहना (दिल्ली) नामक मस्जिद का निर्माण
- रोहतासगढ़ के दुर्ग एवं कन्नीज के स्थान पर शेरसूर नामक नगर
- 1541 ई० में पाटलिपुत्र की पटना नाम से पुनः स्थापना
- भूमि की माप के लिए 32 अंकवाला सिकन्दरी गज एवं सन की डंडी का प्रयोग
- 178 ग्रेन चाँदी का रुपया एवं 380 ग्रेन ताँबे के दाम चलवाया।
- पैदावार का लगभग 1/3 भाग सरकार लगान के रूप में वसूल
- कबूलियत एवं पट्टा प्रथा की शुरुआत
- ग्रैंड ट्रक रोड की मरम्मत
- डाक प्रथा का प्रचलन
अकबर (1542 – 1605 ई०)
15 अक्टूबर 1542 ई० को अकबर का जन्म अमरकोट के राणा वीर साल के महल में हुआ। अकबर की माता का नाम हमीदा बानू वेगम के था। 14 फरवरी, 1556 ई० को अकबर का राज्याभिषेक पंजाब के कलानौर नामक स्थान पर हुआ। ईरानी विद्वान अब्दुल लतीफ अकबर का गुरु था। अकबर जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर बादशाही गाजी की उपाधि धारण कर सिहासन पर बैठा। 1556 से 1560 ई० तक अकबर का संरक्षक बैरम खाँ रहा। मक्का की तीर्थ यात्रा के दौरान पाटन नामक स्थान पर मुबारक खाँ नामक युवक ने बेरम खाँ की हत्या कर दी । अकबर दीन-ए-इलाही धर्म का प्रधान पुरोहित था। गुजरात विजय के दौरान अकबर सर्वप्रथम पुर्तगालियों से मिला और यहीं उसने सर्वप्रथम समुद्र को देखा। अकबर की शासन प्रणाली की प्रमुख विशेषता मनसबदारी प्रथा थी। मुगल सम्राट् अकबर ने ‘अनुवाद विभाग’ की स्थापना की। चार बाग बनाने की परंपरा अकबर के समय शुरु हुई। अकबर के काल को हिन्दी साहित्य का स्वर्णकाल कहा जाता है। अकबर की मृत्यु 16 अक्टूबर, 1605 ई० को हुई । इसे आगरा के निकट सिकन्दरा में दफनाया गया ।
अकबर द्वारा जीते गए प्रदेश –
| प्रदेश | वर्ष | शासक | मुगल सेनापति |
| मालवा | 1561 | बाजबहादुर | आधम खाँ, पीरमुहम्मद |
| चुनार | 1562 | अफगानों का शासन | अब्दुल्ला खाँ |
| गोंडवाना | 1564 | वीरनारायण एवं दुर्गावती | आसफ खाँ स्वयं अधीनता |
| आमेर | 1562 | भारमल | स्वीकार किया |
| मेड़ता | 1562 | जयमल | सरफुद्दीन |
| मेवाड़ | 1568 1576 |
उदय सिंह एवं राणा प्रताप | स्वयं अकबर मानसिंह एवं आसफ खाँ |
| रणथम्भौर | 1569 | सुरजनहाडा | भगवान दास एवं अकबर |
| कालिंजर | 1569 | रामचन्द्र | मजनू खाँ काकशाह |
| मारबाइ | 1570 | राव चन्द्रसेन | स्वेच्छा से अधीनता स्वीकारी |
| जैसलमेर | 1570 | रावल हरिराय | स्वेच्छा से अधीनता स्वीकारी |
| बीकानेर | 1570 | कल्याणमल | स्वेच्छा से अधीनता स्वीकारी |
| गुजरात | 1571 | मुजफ्फर खाँ-III | खाने आजम सम्राट अकबर |
| बिहार एवं बंगाल | 1574-76 | दाऊद खाँ | मुनीम खाँ खानखाना |
| काबुल | 1581 | हकीम मिर्जा | मानसिंह एवं अकबर |
| कश्मीर | 1586 | युसुफ याकूब खाँ | भगवान दास एवं कासिम खाँ |
| उड़ीसा | 1592 | निसार खाँ | मान सिंह |
| सिन्ध | 1593 | जानीवेग | अब्दुर्रहीम खानखाना |
| बलूचिस्तान | 1595 | पन्नी अफगान | मीर मासूम |
| कन्धार | 1595 | मुजफ्फर हुसैन | शाहबेग |
| खानदेश | 1591 | अली खाँ | स्वेच्छा से अधीनता स्वीकारी |
| दौलताबाद | 1599 | चाँद बीबी | मुराद, अब्दुर्रहीम खानखाना |
| अहमदनगर | 1600 | बहादुर शाह चाँद बीबी | अबुल फजल, अकबर |
| असीरगढ़ | 1601 | मीरन बहादुर | अकबर (यह अकबर का अंतिम अभियान था |
अकबर द्वारा लड़े गए महत्वपूर्ण युद्ध
| युद्ध | समय | शासक | विजयी |
| पानीपत की दूसरी लड़ाई | 5 नवम्बर, 1556 ई० | अकबर और हेमू | अकबर |
| हल्दीघाटी का युद्ध | 18 जून, 1576 ई० | महाराणा प्रताप एवं अकबर | अकबर (इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व मान सिंह एवं आसफ खाँ ने किया था। महाराणा प्रताप की मृत्यु 57 वर्ष की उम्र में 19 जनवरी, 1597 ई० में हो गयी। |
अकबर के दरबार के नवरत्न
| अब्दुल रहीम खान-ए-खाना | कवि और विद्वान | ‘तुजुक ए बाबरी’ का फारसी अनुवाद |
| राजा मान सिंह | सेनापति | |
| राजा टोडरमल | वित्त मंत्री | ज़ब्त प्रणाली और 1580 ई० में दहसाल बन्दोवस्त की शुरुआत |
| बीरबल (महेश दास) | सलाहकार | अकबर ने ‘कविप्रिय’ की उपाधि प्रदान की। दीन-ए-इलाही धर्म स्वीकार करने वाला प्रथम एवं अन्तिम हिन्दू शासक। युसुफजाइयों के विद्रोह को दबाने के दौरान बीरबल की हत्या हो गयी। |
| अबुल फजल | विद्वान | अकबरनामा की रचना, दीन-ए-इलाही धर्म का मुख्य पुरोहित, ‘अनवर-ए-सादात’ नाम से पंचतंत्र का फारसी भाषा में अनुवाद। 1602 ई० में सलीम (जहाँगीर) के निर्देश पर दक्षिण से आगरा की ओर आ रहे अबुल फजल को रास्ते में वीर सिंह बुन्देला नामक सरदार ने हत्या कर दी। |
| फैजी | कवि और शिक्षक (मलिक-उश-शुआरा) | अबुल फजल का बड़ा भाई, लीलावती का फारसी में अनुवाद, नल दमयन्ती (सूरदास द्वारा रचित) कथा का फारसी में अनुवाद कर उसका नाम ‘सहेली’ रखा। |
| तानसेन (संगीत सम्राट्) | संगीतकार | जन्म ग्वालियर में। कृतियाँ – मियाँ की टोड़ी, मियाँ का मल्हार, मियाँ का सारंग आदि। अकबर ने तानसेन को कण्ठाभरण वाणीविलास की उपाधि दी थी। अकबर के दरबार में आने से पूर्व रीवाँ के राजा रामचन्द्र के राजाश्रय में। |
| फकीर अज़ीओ-दीन | सूफी संत | |
| मुल्ला दो-पियाजा | विद्वान |
स्थापत्यकला के क्षेत्र में अकबरकालीन महत्त्वपूर्ण कृतियाँ –
| कृतियाँ | समय |
| दिल्ली में हुमायूँ का मकबरा | |
| आगरा का लालकिला | |
| फतेहपुर सिकरी में शाहीमहल | |
| दीवाने खास | |
| पंचमहल | |
| जोधाबाई का महल | |
| इबादत खाना | |
| बुलंद दरवाजा | गुजरात विजय के उपलक्ष्य में |
| इलाहाबाद का किला | |
| लाहौर का किला |
अकबर के समकालीन
| नाम | विशेष |
| स्वामी हरिदास (संगीतज्ञ) | ये वृन्दावन में रहकर भगवान की उपासना करते थे । एक मत के अनुसार हरिदास तानसेन के गुरु थे जबकि कुछ विद्वान हरिदास एवं तानसेन दोनों को मानसिंह तोमर का शिष्य बताते हैं । यह भी प्रचलित है कि हरिदास का गाना सुनने के लिए अकबर को इनकी कुटिया पर जाना पड़ा क्योंकि इन्होने अकबर के दरबार में जाने से मना कर दिया था । इनका कहना था कि वे केवल अपने भगवान के लिए ही गाते हैं, दरबार से उनका कोई सरोकार नहीं । |
| मौलाना हुसैन फैज | यार-ए-दानिश नाम से पंचतंत्र का फारसी भाषा में अनुवाद |
| नकीब खाँ, अब्दुल कादिर बदायूंनी, शेख सुल्तान | रामायण एवं महाभारत का फारसी अनुवाद, महाभारत का नाम ‘रज्मनामा’ (युद्धों की पुस्तक) |
| हाजी इब्राहिम सरहदी | अथर्ववेद का फारसी अनुवाद |
| मुल्लाशाह मोहम्मद | राजतरंगिणी का फारसी अनुवाद |
| भगवान दास (आमेर के राजा भारमल के पुत्र) | अकबर ने अमीर- ऊल-ऊमरा की उपाधि दी। |
| जैनाचार्य हरिविजय सूरि | अकबर ने जगतगुरु की उपाधि प्रदान की |
| शेख सलीम चिश्ती | प्रसिद्ध सूफी सन्त |
| नरहरि | अकबर ने महापात्र की उपाधि प्रदान की |
| अब्दुससमद |
अकबर ने शीरी कलम की उपाधि |
| मुहम्मद हुसैन कश्मीरी | अकबर ने जड़ी कलम की उपाधि |
अकबर के कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य
| कार्य | समय |
| दासप्रथा का अन्त | 1562 |
| अकबर को हरमदल से मुक्ति | मई 1562 |
| तीर्थयात्रा कर समाप्त | 1563 |
| जजिया कर समाप्त | 1564 |
| फतेहपुर सिकरी की स्थापना | 1571 |
| राजधानी आगरा से फतेहपुर सिकरी | 1571 |
| इबादतखाने की स्थापना | 1575 |
| इबादतखाने में सबको प्रवेश की अनुमति | 1578 |
| मजहर की घोषणा | 1579 |
| दीन-ए-इलाही की स्थापना | 1582 |
| इलाही संवत् की शुरुआत | 1583 |
| राजधानी लाहौर स्थानांतरित | 1585 |
जहाँगीर (1605 – 1627 ई०)
अकबर ने अपने पुत्र का नाम सलीम रखा। यह नाम सूफी संत शेख सलीम चिश्ती के नाम पर था। सलीम का जन्म 30 अगस्त, 1569 ई० में हुआ था। सलीम 24 अक्टूबर, 1605 ई० को ‘नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर’ बादशाही गाजी की उपाधि से गद्दी पर बैठा। जहाँगीर शाहबुर्ज एवं यमुना तट पर स्थित पत्थर के खम्भे में सोने से बनी एक न्याय की जंजीर लगवाई थी। जहाँगीर को न्याय की जंजीर के लिए याद किया जाता है। जहाँगीर की आत्मकथा ‘तुजुके-ए-जहाँगीरी’ को श्रेय मौतविंद खाँ ने पूरा किया। 1606 ई० में जहाँगीर के सबसे बड़े पुत्र खुसरो ने जहाँगीर के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। खुसरो और जहाँगीर की सेना के बीच युद्ध जालंधर के निकट भैरावल नामक मैदान में हुआ । जहाँगीर ने खुसरो कैद कर लिया। सिक्खों के 5वें गुरु अर्जुनदेव ने खुसरो की मदद की थी जिसके कारण जहाँगीर ने गुरु अर्जुनदेव को फाँसी दिलवा दी। खुसरो गुरु अर्जुनदेव से गोइंदवाल में मिला था। अहमदनगर के वजीर मलिक अम्बर के विरुद्ध सफलता से खुश होकर जहाँगीर ने खुर्रम को शाहजहाँ की उपाधि प्रदान की। 1622 ई० में शाह अब्बास ने कंधार पर अधिकार कर लिया। जहाँगीर ने गियास वेग को शाही दीवान नियुक्त किया। जहाँगीर ने गियास वेग को इतमाद-उद-दौला की उपाधि दी।जहाँगीर ने संस्कृत के कवि जगन्नाथ को ‘पंडितराज’ की उपाधि दी। अशोक के कौशाम्बी स्तम्भ (वर्तमान में प्रयाग) पर समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति तथा जहाँगीर का लेख उत्कीर्ण है। जहाँगीर के काल में कैप्टन हॉकिन्स, सर टॉमस रो, विलियम फिंच एवं एडवर्ड टैरी जैसे यूरोपीय यात्री भारत आए थे।
जहाँगीर की पत्नी नूरजहाँ
नूरजहाँ का वास्तविक नाम मेहरुन्निसा था। यह ईरान निवासी मिर्जा गयास बेग की पुत्री थी। नूरजहाँ का प्रथम विवाह 1594 ई० में अलीकुली बेग के साथ हुआ। एक शेर मारने के कारण अली कुली वेग को जहाँगीर द्वारा ‘शेर अफगान’ की उपाधि दी गई। 1607 ई० में शेर अफगान की मृत्यु हो गई। मेहरुन्निसा अकबर की विधवा सलीमा बेगम की सेवा में नियुक्त हुई। जहाँगीर ने मई, 1611 में मेहरुन्निसा से विवाह कर लिया। जहाँगीर ने मेहरुन्निसा को नूरमहल एवं नूरजहाँ की उपाधि प्रदान की। नूरजहाँ के सम्मान में जहाँगीर ने चाँदी के सिक्के जारी किए। नूरजहाँ की माँ अस्मत बेगम ने गुलाब से इत्र निकालने की विधि खोजी थी। नूरजहाँ बेगम ने 1626 ई० में ‘इतमाद-उद-दौला’ का मकबरा बनवाया। मुगलकालीन वास्तुकला के अन्तर्गत निर्मित यह प्रथम ऐसी इमारत है, जो पूर्णरूप से बेदाग सफेद संगमरमर से निर्मित है। इसी इमारत में सर्वप्रथम ‘पित्रदुरा’ नामक जड़ाऊ काम किया गया।
जहाँगीर के पुत्र
जहाँगीर के पाँच पुत्र थे-
- खुसरो,
- परवेज,
- खुर्रम,
- शहरयार, (शेर अफगान एवं मेहरुन्निसा की पुत्री ‘लाडली बेगम’ के साथ जहाँगीर के पुत्र शहरयार की शादी हुई)
- जहाँदार।
जहाँगीर के समय मुगल चित्रकला
जहाँगीर के समय को चित्रकला का स्वर्णकाल कहा जाता है। जहाँगीर ने आगा रजा के नेतृत्व में आगरा में एक चित्रणशाला की स्थापना की। दरबार के प्रमुख चित्रकार थे – आगा रजा, अबुल हसन, मुहम्मद नासिर, मुहम्मद मुराद, उस्ताद मंसूर, विशनदास, मनोहर एवं गोवर्धन, फारुख बैग, दौलत। जहाँगीर ने उस्ताद मंसूर को ‘नादिर-अल- उस’ एवं अबुल हसन को ‘नादिरुज्जमा’ की उपाधि दी। जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा में लिखा कि कोई भी चित्र चाहे वह किसी मृतक व्यक्ति या जीवित व्यक्ति द्वारा बनाया गया हो, मैं देखते ही तुरन्त बता सकता हूँ कि यह किस चित्रकार की कृति है। यदि किसी चेहरे पर आँख किसी एक चित्रकार ने भौंह किसी और ने बनाई हो, तो भी यह जान लेता हूँ कि आँख किसने और भौंह किसने बनायी है।
महावत खाँ ने झेलम नदी के तट पर 1626 ई० में जहाँगीर, नूरजहाँ एवं उसके भाई आसफ खाँ को बन्दी बना लिया था। 28 अक्टूबर, 1627 ई० को भीमवार नामक स्थान पर जहाँगीर की मृत्यु हो गयी। उसे शहादरा (लाहौर) में रावी नदी के किनारे दफनाया गया। जहाँगीर का मकबरा नूरजहाँ ने बनवाया था।
शाहजहाँ (1627- 1657 ई०)
शाहजहाँ का वास्तविक नाम खुर्रम था। खुर्रम का जन्म 5 जनवरी, 1592 ई० को हुआ। खुर्रम की माँ जोधपुर के शासक मोटा राजा उदय सिंह की पुत्री जगत गोसाई थी। 4 फरवरी, 1628 ई० को खुर्रम (शाहजहाँ) सिंहासन पर बैठा। शाहजहाँ आगरे में अबुल मुजफ्फर शहाबुद्दीन मुहम्मद साहिब किरन-ए-सानी की उपाधि प्राप्तकर सिंहासन पर बैठा। खुर्रम का विवाह 1612 ई० में आसफ खाँ की पुत्री ‘अरजुमन्द बानो बेगम’ से हुआ। शाहजहाँ ने अरजुमन्द बानो बेगम को ‘मलिका-ए-जमानी’ की उपाधि दी। 7 जून, 1631 ई० में प्रसव पीड़ा के कारण अरजुमन्द बानो बेगम की मृत्यु हो गयी। शाहजहाँ ने आसफ खाँ को वजीर की उपाधि दी। शाहजहाँ ने महावत खाँ को ‘खान खाना’ की उपाधि दी। शाहजहाँ ने नूरजहाँ को दो लाख रु० प्रतिवर्ष की पेंशन देकर लाहौर जाने दिया, जहाँ 1645 ई० में उसकी मृत्यु हो गयी। शाहजहाँ ने 1638 ई० में अपनी राजधानी को आगरा से दिल्ली लाने के लिए यमुना नदी के दाहिने तट पर शाहजहाँनाबाद की नींव डाली।
शाहजहाँ के शासनकाल में स्थापत्यकला
शाहजहाँ के शासनकाल को स्थापत्यकला का स्वर्णयुग कहा जाता है। शाहजहाँ ने दिल्ली में एक कॉलेज का निर्माण एवं दारुल बका नामक कॉलेज की मरम्मत करायी। शाहजहाँ द्वारा बनवायी गयी प्रमुख इमारतें हैं-
| लालकिला | दिल्ली | ||
| दीवाने आम | दिल्ली | ||
| दीवाने खास | दिल्ली | ||
| मयूर सिंहासन | दिल्ली | इसका मुख्य कलाकार बे बादल खाँ था। | |
| जामा मस्जिद | दिल्ली | ||
| मोती मस्जिद | आगरा | ||
| ताजमहल | आगरा | बेगम मुमताज महल की याद में, स्थापत्य कलाकार उस्ताद अहमद लाहौरी | |
| जामा मस्जिद | आगरा | निर्माण शाहजहाँ की पुत्री जहाँआरा ने | |
शाहजहाँ के दरबार खास व्यक्तित्व
| मुहम्मद फकीर | चित्रकार | |
| मीर हासिम | चित्रकार | |
| लाल खाँ | संगीतज्ञ | शाहजहाँ ने ‘गुण समन्दर’ की उपाधि दी। |
| दाराशिकोह | विद्वान | शाहजहाँ के पुत्रों में दाराशिकोह सर्वाधिक विद्वान था। इसने भगवद्गीता, योगवशिष्ठ, उपनिषद् एवं रामायण का अनुवाद फारसी में करवाया। इसने सर्र-ए-अकबर (महान रहस्य) नाम से उपनिषदों का अनुवाद करवाया था। दारा शिकोह कादिरी सिलसिले के मुल्ला शाह बदख्सी का शिष्य था। शाह बुलंद इकबाल (king of Lofty fortune ) के रूप में दारा शिकोह जाना जाता है। |
सितम्बर, 1657 ई० में शाहजहाँ के गंभीर रूप से बीमार हो गया। उसके पुत्रों के बीच उत्तराधिकार का युद्ध प्रारंभ हुआ। उस समय का पुत्र शूजा बंगाल में, मुराद गुजरात में और औरंगजेब दक्कन में था।
उत्तराधिकार का युद्ध
| धरमट का युद्ध | 15 अप्रैल, 1658 ई० में | दारा एवं औरंगजेब के बीच हुआ। इस युद्ध में दारा की पराजय हुई। |
| सामूगढ़ का युद्ध | 29 मई, 1658 ई० | दारा एवं औरंगजेब के बीच हुआ। इस युद्ध में दारा की पराजय हुई। |
| देवराई घाटी में | मार्च, 1659 ई० | इस युद्ध में दारा के पराजित होने पर उसे इस्लाम धर्म की अवहेलना करने के अपराध में 30 अगस्त, 1659 ई० को हत्या कर दी गई। |
औरंगजेब ने 8 जून, 1658 ई० को शाहजहाँ को बंदी बना लिया। आगरे के किले में अपने कैदी जीवन के आठवें वर्ष अर्थात् 22 जनवरी, 1666 ई० को 74 वर्ष की अवस्था में शाहजहाँ की मृत्यु हो गयी।
औरंगजेब (1658 1707 ई०)
24 अक्टूबर, 1618 ई० को औरंगजेब का जन्म दौहाद (गुजरात) में हुआ। औरंगजेब का निकाह 18 मई, 1637 ई० को फारस के राजघराने की ‘दिलरास बानो बेगम’ के साथ हुआ। 31 जुलाई, 1658 को आगरा में औरंगजेब ने अपना पहला राज्याभिषेक ‘अबुल मुजफ्फर मुहउद्दीन मुजफ्फर औरंगजेब बहादुर आलमगीर’ की उपाधि से करवाया। देवराई के युद्ध में सफल होने के बाद 15 मई, 1659 को औरंगजेब ने दिल्ली में प्रवेश किया। 5 जून, 1659 को शाहजहाँ के शानदार महल में दूसरी बार राज्याभिषेक करवाया। औरंगजेब स्वयं वीणा बजाने में दक्ष था। औरंगजेब ने 1679 ई० में जाजिया कर को पुनः लागू किया। औरंगजेब के समय में हिन्दू मनसबदारों की संख्या लगभग 337 थी, जो अन्य मुगल सम्राटों की तुलना में अधिक थी। औरंगजेब के समय सूबों की संख्या 20 थी। औरगजेब के शासन काल में मुगल सेना में सर्वाधिक हिन्दू सेनापति थे। औरंगजेब ने दरबार में संगीत पर पाबन्दी लगा दी तथा सरकारी संगीतज्ञों को अवकाश दे दिया गया। भारतीय शास्त्रीय संगीत पर फारसी में सबसे अधिक पुस्तकें औरंगजेब के ही शासनकाल में लिखी गयी। औरंगजेब ने 1665 ई० में हिन्दू मंदिरों को तोड़ने का आदेश दिया। इसके शासनकाल में तोड़े गए मंदिरों में सोमनाथ का मंदिर, बनारस का विश्वनाथ मंदिर एवं वीर सिंह देव द्वारा जहाँगीर काल में मथुरा में निर्मित केशव राय मंदिर थे। 1679 ई० में औरंगाबाद (महाराष्ट्र) में बीबी का मकबरा बनवाया।
औरंगजेब के समय धार्मिक व्यवस्था
औरंगजेब सुन्नी धर्म को मानता था। औरंगजेब को जिन्दा पीर कहा जाता था। मीर मुहम्मद हकीम औरंगजेब के गुरु थे। औरंगजेब ने कुरान को अपने शासन का आधार बनाया। इसने सिक्के पर कलमा खुदवाना, नवरोज का त्योहार मनाना, भाँग की खेती करना, गाना-बजाना, झरोखा दर्शन, तुलादान प्रथा (इस प्रथा में सम्राट को उसके जन्म दिन पर सोने, चाँदी तथा अन्य वस्तुओं से तौलने की प्रथा थी। यह अकबर के जमाने में प्रारंभ हुई थी) आदि पर प्रतिबंध लगा दिया। औरंगजेब दारुल हर्ब (काफिरों का देश) को दारुल इस्लाम (इस्लाम का देश) में परिवर्तित करने को अपना महत्त्वपूर्ण लक्ष्य मानता था।
औरंगजेब के समय संधि, युद्ध और विद्रोह
| पुरन्दर की संधि | 22 जून, 1665 ई० | जय सिंह एवं शिवाजी के बीच। मई, 1666 ई० को आगरे के किले के दीवाने आम में औरंगजेब के समक्ष शिवाजी उपस्थित हुए। यहाँ शिवाजी को कैद कर जयपुर भवन में रखा गया। |
| 9वें गुरु तेगबहादुर की हत्या | 1675 में | इस्लाम नहीं स्वीकार करने के कारण दिल्ली में |
| बीजापुर | 1686 ई० में | |
| गोलकुण्डा | 1697 में | मदन्ना एवं अकन्ना नामक ब्राह्मणों का संबंध गोलकुण्डा के शासक अबुल हसन से था । |
| जाट विद्रोह | 1670ई0 में | नेतृत्व गोकुला एवं राजाराम ने किया। तिलपत की लड़ाई में जाट परास्त हुए । गोकुल को मौत के घाट उतार दिया गया । |
| जाट विद्रोह | 1685 ई० में | राजाराम के नेतृत्व में। जाटों ने सिकन्दरा में स्थित अकबर के मकबरे को भी लूटा। भरतपुर राजवंश की नींव औरंगजेब के शासनकाल में जाट नेता एवं राजाराम के भतीजा चूरामन ने डाली । |
| अकबर | औरंगजेब का पुत्र अकबर ने दुर्गादास के बहकावे में आकर अपने पिता के खिलाफ विद्रोह किया । |
औरंगजेब की मृत्यु 20 फरवरी, 1707 ई० को हुई। इसे खुलदाबाद (Khuldabad) जो अब रोजा (Roza) कहलाता है में दफनाया गया।