क्रम मूल अधिकार संबंधित अनुच्छेद
1 समता या समानता का अधिकार अनुच्छेद 14 से 18
2 स्वतंत्रता का अधिकार (संभावित) अनुच्छेद 19 से 22
3 शोषण के विरुद्ध अधिकार अनुच्छेद 23 से 24
4 धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार अनुच्छेद 25 से 28
5 संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार अनुच्छेद 29 से 30
6 संवैधानिक उपचारों का अधिकार अनुच्छेद 32

भारतीय संविधान के अंतर्गत मौलिक अधिकारों (Fundamental Rights) से संबंधित जानकारी का व्यवस्थित विवरण नीचे दिया गया है:

1. संवैधानिक पृष्ठभूमि

  • स्रोत: संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान।

  • वर्णन: संविधान के भाग-3 (अनुच्छेद 12 से 35) में।

  • महत्व: इसे भारत का ‘अधिकार पत्र’ (Magna Carta) और मूल अधिकारों का ‘जन्मदाता’ कहा जाता है।

  • ऐतिहासिक संदर्भ: 1931 के कराँची अधिवेशन (अध्यक्ष: सरदार वल्लभभाई पटेल) में कांग्रेस ने मूल अधिकारों की मांग की थी, जिसका प्रारूप जवाहरलाल नेहरू ने तैयार किया था।

2. महत्वपूर्ण बिंदु

  • संशोधन एवं निलंबन: मौलिक अधिकारों में संशोधन संभव है। राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352) के दौरान अनुच्छेद 20 और 21 (जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता) को छोड़कर अन्य सभी अधिकार स्थगित किए जा सकते हैं।

  • सम्पत्ति का अधिकार: मूल संविधान में 7 मौलिक अधिकार थे। 44वें संशोधन (1979) के द्वारा ‘सम्पत्ति के अधिकार’ (अनुच्छेद 31 एवं 19क) को मौलिक अधिकारों की सूची से हटाकर अनुच्छेद 300(a) के अंतर्गत ‘कानूनी अधिकार’ बना दिया गया है।

3. समता का अधिकार (अनुच्छेद 14 से 18)

अनुच्छेद विषय विवरण
अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समता राज्य सभी व्यक्तियों के लिए एक समान कानून बनाएगा और उन्हें समान रूप से लागू करेगा।
अनुच्छेद 15 भेदभाव का निषेध धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म-स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा।
अनुच्छेद 16 अवसर की समानता लोक नियोजन (सरकारी नौकरी) के विषयों में सभी नागरिकों को समान अवसर मिलेगा। (अपवाद: SC, ST एवं पिछड़ा वर्ग)।
अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का अंत छुआछूत का उन्मूलन किया गया है और इसे दंडनीय अपराध माना गया है।
अनुच्छेद 18 उपाधियों का अंत सेना या विद्या संबंधी सम्मान को छोड़कर राज्य अन्य कोई उपाधि प्रदान नहीं करेगा। विदेशी उपाधि स्वीकार करने हेतु राष्ट्रपति की अनुमति अनिवार्य है।

भारतीय संविधान के अंतर्गत स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19 से 22) से संबंधित प्रावधानों का व्यवस्थित विवरण नीचे दिया गया है:

1. अनुच्छेद 19: स्वतंत्रता का अधिकार

मूल संविधान में 7 स्वतंत्रताएं थीं, वर्तमान में 6 हैं (सम्पत्ति का अधिकार 19(f) को 44वें संशोधन, 1979 द्वारा हटा दिया गया है):

  • 19(a): बोलने की स्वतंत्रता (प्रेस की स्वतंत्रता भी इसी में निहित है)।

  • 19(b): शांतिपूर्वक बिना हथियारों के एकत्रित होने और सभा करने की स्वतंत्रता।

  • 19(c): संघ बनाने की स्वतंत्रता।

  • 19(d): देश के किसी भी क्षेत्र में आवागमन की स्वतंत्रता।

  • 19(e): देश के किसी भी क्षेत्र में निवास करने और बसने की स्वतंत्रता।

  • 19(g): कोई भी व्यापार एवं जीविका चलाने की स्वतंत्रता।

2. अनुच्छेद 20: अपराधों के लिए दोष-सिद्धि के संबंध में संरक्षण

  • एक अपराध के लिए एक सजा: किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक से अधिक बार सजा नहीं मिलेगी।

  • तत्कालीन कानून: अपराध के समय जो कानून है, उसी के तहत सजा मिलेगी, बाद के या पहले के कानून के तहत नहीं।

  • स्वयं के विरुद्ध गवाही: किसी भी व्यक्ति को अपने विरुद्ध न्यायालय में गवाही देने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा।

3. अनुच्छेद 21 एवं 21(क): प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता

  • अनुच्छेद 21: विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त किसी भी व्यक्ति को जीवन और वैयक्तिक स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता।

  • अनुच्छेद 21(क): 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा (86वां संशोधन, 2002)।

4. अनुच्छेद 22: गिरफ्तारी और निरोध में संरक्षण

मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए व्यक्ति को 3 अधिकार प्राप्त हैं:

  1. हिरासत में लेने का कारण बताना।

  2. 24 घंटे के भीतर (आने-जाने के समय को छोड़कर) दंडाधिकारी के समक्ष पेश करना।

  3. अपने पसंद के वकील से सलाह लेने का अधिकार।

निवारक निरोध (Preventive Detention)

इसका उद्देश्य दंड देना नहीं, बल्कि अपराध करने से रोकना है (राज्य की सुरक्षा, लोक व्यवस्था हेतु)।

  • नियम: सरकार किसी व्यक्ति को केवल 3 माह तक निरुद्ध रख सकती है; इससे अधिक अवधि के लिए सलाहकार बोर्ड का प्रतिवेदन अनिवार्य है।

  • अधिकार: निरुद्ध व्यक्ति को निरोध का आधार सूचित करना अनिवार्य है (लोकहित के विरुद्ध तथ्यों को छोड़कर) और उन्हें अभ्यावेदन का अवसर देना आवश्यक है।

निवारक निरोध से संबंधित प्रमुख कानून

  1. निवारक निरोध अधिनियम, 1950: पहला अधिनियम; 31 दिसम्बर 1971 को समाप्त।

  2. MISA (1971): 44वें संशोधन के प्रतिकूल होने के कारण अप्रैल 1979 में समाप्त।

  3. विदेशी मुद्रा संरक्षण व तस्करी निरोध अधिनियम, 1974: नजरबंदी की अवधि 1 वर्ष से बढ़ाकर 2 वर्ष (1984)।

  4. राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, 1980: जम्मू-कश्मीर के अतिरिक्त पूरे भारत में लागू।

  5. टाडा (TADA): सबसे कठोर कानून; 23 मई 1995 को समाप्त।

  6. पोटो/पोटा (2001-2004): पोटो (2001) का अधिनियमित रूप ‘पोटा’ बना; 21 सितम्बर 2004 को अध्यादेश द्वारा समाप्त। इसमें आतंकवादियों और सूचना छिपाने वालों के लिए दंड का प्रावधान था।

3. शोषण के विरुद्ध अधिकार :

अनुच्छेद 23 : मानव के दुर्व्यापार और बलात् श्रम का प्रतिषेध: इसके द्वारा किसी व्यक्ति की खरीद-बिक्री, बेगारी तथा इसी प्रकार का अन्य जबरदस्ती लिया हुआ श्रम निषिद्ध ठहराया गया है, जिसका उल्लंघन विधि के अनुसार दंडनीय अपराध है
नोट: जरूरत पड़ने पर राष्ट्रीय सेवा करने के लिए बाध्य किया जा सकता है।
अनुच्छेद 24 बारकों के नियोजन का प्रतिषेध: 14 वर्ष से कम आयु वाले किसी बच्चे को कारखानों, खानों या अन्य किसी जोखिम भरे काम पर नियुक्त नहीं किया जा सकता है।

 

1. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25-28)

  • अनुच्छेद 25: अंतःकरण की स्वतंत्रता और किसी भी धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने का अधिकार।

  • अनुच्छेद 26: अपने धर्म के लिए संस्थाओं की स्थापना, पोषण, संपत्ति के अर्जन, स्वामित्व और प्रशासन का अधिकार।

  • अनुच्छेद 27: किसी व्यक्ति को किसी विशेष धर्म की उन्नति या पोषण हेतु कर (tax) देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

  • अनुच्छेद 28: राज्य-पोषित शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी। साथ ही, किसी भी विद्यार्थी को धार्मिक अनुष्ठान या धर्मोपदेश सुनने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

2. संस्कृति एवं शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29-30)

  • अनुच्छेद 29 (अल्पसंख्यक हितों का संरक्षण): अल्पसंख्यक वर्ग अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति को सुरक्षित रख सकते हैं। किसी भी सरकारी शिक्षण संस्थान में केवल भाषा, जाति, धर्म या संस्कृति के आधार पर प्रवेश से वंचित नहीं किया जाएगा।

  • अनुच्छेद 30: अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी पसंद की शिक्षण संस्थाएं स्थापित करने और उनका प्रशासन करने का अधिकार है। सरकार अनुदान देते समय कोई भेदभाव नहीं करेगी।

3. संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)

डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने इसे ‘संविधान की आत्मा’ कहा है। इसके तहत मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए उच्चतम न्यायालय में आवेदन करने का अधिकार है। सर्वोच्च न्यायालय पाँच प्रकार की रिट (Writ) जारी कर सकता है:

  1. बन्दी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus): यदि किसी व्यक्ति को अवैध रूप से बंदी बनाया गया हो, तो न्यायालय उसे निश्चित समय के भीतर उपस्थित करने का आदेश देता है।

  2. परमादेश (Mandamus): जब कोई पदाधिकारी अपने सार्वजनिक कर्तव्य का पालन नहीं करता, तब न्यायालय उसे कर्तव्य पालन का आदेश देता है।

  3. प्रतिषेध-लेख (Prohibition): सर्वोच्च/उच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालयों को उनके अधिकार क्षेत्र के बाहर कार्य करने से रोकने हेतु जारी किया जाता है।

  4. उत्प्रेषण (Certiorari): अधीनस्थ न्यायालयों को लंबित मुकदमों को वरिष्ठ न्यायालय में भेजने का निर्देश दिया जाता है।

  5. अधिकार पृच्छा-लेख (Quo-Warranto): यदि कोई व्यक्ति अवैध रूप से किसी सार्वजनिक पद को धारण कर लेता है, तो न्यायालय उससे पूछता है कि वह किस अधिकार से उस पद पर कार्य कर रहा है।

भारतीय संविधान के अंतर्गत मौलिक अधिकारों में संशोधन से संबंधित न्यायिक निर्णयों और संवैधानिक विकास का व्यवस्थित विवरण नीचे दिया गया है:

1. प्रारंभिक स्थिति (1967 से पूर्व)

  • न्यायालय के पूर्व निर्णयों के अनुसार, संसद को अनुच्छेद 368 के तहत संविधान के किसी भी भाग (मूल अधिकारों सहित) में संशोधन करने की शक्ति प्राप्त थी।

2. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967 ई०)

  • सर्वोच्च न्यायालय ने इस निर्णय में संसद की शक्ति पर रोक लगा दी। न्यायालय ने निर्धारित किया कि संसद मूल अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती है।

3. 24वां संविधान संशोधन (1971 ई०)

  • गोलकनाथ निर्णय के प्रभाव को समाप्त करने के लिए संसद ने अनुच्छेद 13 और 368 में संशोधन किया। इसके माध्यम से यह स्पष्ट किया गया कि संसद अनुच्छेद 368 की प्रक्रिया का पालन करके मूल अधिकारों में संशोधन करने में सक्षम है।

4. केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य (1973 ई०)

  • इस ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने संसद की संशोधन शक्ति को मान्यता प्रदान की और गोलकनाथ मामले के निर्णय को निरस्त कर दिया।

5. 42वां संविधान संशोधन (1976 ई०)

  • इस संशोधन द्वारा अनुच्छेद 368 में खंड 4 और 5 जोड़े गए। इसमें यह प्रावधान किया गया कि संसद द्वारा किए गए संविधान संशोधनों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।

6. मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980 ई०)

  • सर्वोच्च न्यायालय ने इस निर्णय में स्पष्ट किया कि संविधान के ‘आधारभूत लक्षणों’ (Basic Structure) की रक्षा करना न्यायालय का अधिकार है।

  • न्यायालय को किसी भी संशोधन का पुनरावलोकन (Judicial Review) करने का अधिकार प्राप्त है।

  • इस निर्णय के द्वारा 42वें संशोधन में की गई उस व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया, जो संशोधनों को न्यायिक चुनौती से बचाती थी।

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