1. जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil)

  • क्षेत्रफल: भारत के लगभग 22% भू-भाग पर विस्तृत।

  • निर्माण: नदियों द्वारा लायी गई मिट्टी।

  • रासायनिक संरचना: पोटाश की बहुलता; नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं ह्यूमस की कमी।

  • प्रकार:

    • बांगर (पुरानी जलोढ़): पुरानी मिट्टी।

    • खादर (नई जलोढ़): नई मिट्टी।

  • उपयोगिता: अत्यंत उर्वर। प्रमुख फसलें: धान, गेहूँ, मक्का, तिलहन, दलहन, आलू।

2. काली मिट्टी (Black Soil)

  • निर्माण: बेसाल्ट चट्टानों के टूटने-फूटने से।

  • विशेषता: काला रंग ‘टिटेनीफेरस मैग्नेटाइट’ एवं जीवांश (Humus) के कारण। इसमें आयरन, चूना, एल्युमीनियम एवं मैग्नेशियम की बहुलता होती है।

  • अन्य नाम: ‘रेगुर मिट्टी’ या ‘काली कपास मिट्टी’।

  • उपयोगिता: कपास की खेती के लिए सर्वश्रेष्ठ। अन्य फसलें: गेहूँ, ज्वार, बाजरा।

  • प्रमुख क्षेत्र: गुजरात, महाराष्ट्र, म.प्र. (पश्चिमी), ओडिशा (दक्षिणी), कर्नाटक (उत्तरी), आंध्र प्रदेश (तटीय), तमिलनाडु (सलेम, कोयंबटूर आदि), राजस्थान (बूंदी, टोंक)।

3. लाल मिट्टी (Red Soil)

  • निर्माण: रवेदार एवं कायांतरित शैलों के विघटन से।

  • विशेषता: लौह ऑक्साइड की उपस्थिति से लाल रंग; जलयोजित होने पर पीली दिखाई देती है। सिलिका एवं आयरन की बहुलता; नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं ह्यूमस की कमी। यह अम्लीय होती है।

  • उर्वरता: सामान्यतः उर्वरता-विहीन बंजर। चूना मिलाकर उर्वरता बढ़ाई जा सकती है।

  • प्रमुख फसलें: कपास, गेहूँ, दालें, मोटे अनाज।

  • प्रमुख क्षेत्र: आंध्र प्रदेश, म.प्र. (पूर्वी), छोटानागपुर पठार, प. बंगाल, मेघालय (गारो, खासी, जयंतिया), नागालैंड, राजस्थान (अरावली पूर्वी), महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक।

4. लेटेराइट मिट्टी (Laterite Soil)

  • निर्माण: मानसूनी जलवायु की आर्द्रता एवं शुष्कता के क्रमिक परिवर्तन से।

  • रासायनिक संरचना: आयरन एवं सिलिका की बहुलता।

  • वर्गीकरण:

    • गहरी लाल लेटेराइट: लौह ऑक्साइड और पोटाश की अधिकता; उर्वरता कम।

    • सफेद लेटेराइट: केओलिन के कारण रंग सफेद; उर्वरता सबसे कम।

    • भूमिगत जलवायी लेटेराइट: काफी उपजाऊ।

  • उपयोगिता: चाय की खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त।

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